आह इन्सान
Al-Risala, March 2023, pp. 53–54
By Maulana Wahiduddin Khan
इन्सान ख़ुदा को नाराज़ करने वाले अल्फ़ाज़ बोलता है। वह भूल जाता है कि उसका ख़ुदा उसको देख रहा है। इन्सान जहन्नमी कर्म करता है, हालांकि जहन्नम की एक आंच सहने की ताक़त भी उसके अन्दर नहीं। आह, कितना ज़्यादा कमज़ोर है इन्सान, इसके बावजूद वह कितना ज़्यादा ढीट बना हुआ है! इन्सान के सामने एक सच्चाई आती है, जिसका वह इन्कार न कर सके। इसके बावजूद वह उसको हिक़ारत के साथ नज़र अन्दाज़ कर देता है। इन्सान की ग़लती दिन की रोशनी की तरह उस पर खोल दी जाती है, फिर भी वह अपनी ग़लती को नहीं मानता। इन्सान के पास अपने नासेह (नसीहत करने वाला) की बात को ठुकराने के लिए कोई दलील नहीं होती, लेकिन वह ऐब निकाल कर और इल्ज़ाम लगा कर ज़ाहिर करता है कि नासेह (नसीहत करने वाले) इस क़ाबिल ही नहीं कि उसकी बात मानी जाए। इन्सान ख़ुद ज़ालिम होता है और वह दूसरे के ज़ुल्म का एलान करता है। इन्सान अपने क़दमों के नीचे फ़साद बरपा किए हुए होता है और दूसरों को फ़सादी कह
दुनिया में हक़ीक़त के सिवा कोई चीज़ नहीं, जहा आदमी का ज़िन्दगी का साया इन्सान का यह हाल है कि वह बिल्कुल behक़ीक़त होता है और अपने को हक़ीक़त के रूप में ज़ाहिर करता है। इन्सान अपनी बड़ाई के मीनार को बाक़ी रखने के लिए अपनी सारी ताक़त लगा देता है, हालांकि आख़िरकार जो वाक़िया होने वाला है, वह यह कि वह और उसके बड़ाई का मीनार दोनों एक ही क़ब्रिस्तान में हमेशा के लिए दफ़न हो जाएं। खुदा ने इन्सान को जन्नत में बसने के लिए बनाया था, मगर इन्सान को जहन्नम के रास्तों में दौड़ने के सिवा किसी और चीज़ से कोई दिलचस्पी नहीं।