Al-Risala · March 2023

कुदरत का फ़ैसला

Al-Risala, March 2023, pp. 59–67

By Maulana Wahiduddin Khan

अगर आप अमरीका जाएं और वहां से कनाडा की तरफ़ सफ़र करें तो आप देखेंगे कि अमरीका और कनाडा की सरहद (border) पर दोनों मुल्कों के झंडे एक साथ लहरा रहे हैं। पास ही एक बोर्ड है, जिसके ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है- एक ही मां की औलादेंः Children of a common mother यह बात जो अमरीका और कनाडा की सीमा पर खुले बोर्ड के ऊपर लिखी गई है, यही बात तमाम दूसरे मुल्कों की सरहदों पर 'छुपे हुए बोर्डों' में न दिखाई देने वाले अक्षरों में लिखी हुई है। यह दूसरा बोर्ड वह है जो कुदरत की तरफ़ से लगाया गया है। पहला बोर्ड इंसानी हाथों ने लिखा है, दूसरा बोर्ड ख़ुद ख़ुदा के हाथों ने।

लग बाड पर जो बात लिखा हुई है वह फ़ितरी सच्चाई है वही मामला तमाम क़ामी का है जिसका ऐलान अमरीका और कननाडा ने अपने यहां किया है। जीव वैज्ञानिक सच्चाई का तक़ाज़ा है कि हर क़ौम अपने यहां वही अल्फ़ाज़ लिखे जो अमरीका और कननाडा ने अपने यहां लिख रखा है। यही मौजूदा दुनिया में इन्सान का इम्तिहान है। यहां आदमी को अपने आज़ाद इरादे से वही काम करना है जो कुदरत ने लाज़िमी क़ानून के तहत पहले से तय कर दिया है। जो चीज़ कुदरत ने अपनी छुपी हुई क़लम से लिखी है, उसे इन्सान को अपने हाथ से अपनी ज़िन्दगी के सफ़हे पर लिखना है। कुदरत के अपने मनसूबे के तहत जगत की जो स्कीम (scheme of things) है, उसके मुताज़िब हर इंसान को अपनी स्कीम को ढाल लेना चाहिए। क्यों की कुदरत के नक्शे से तालमेल का नाम तामीर और सृजन है और कुदरत के नक्शे से तालमेल न करने का नाम नाकामी और बर्बादी। एक आदमी को गुलाब का फूल तोड़ना था। वह शौक के तहत तेज़ी से लपक कर उसके पास पहुंचा और झटके के साथ एक फूल तोड़ लिया। फूल तो उसके हाथ में आ गया, लेकिन तेज़ी के नतीजे में कई कांटे उसके हाथ में चुभ चुके थे। उसके साथी ने कहा कि तुमने बड़ी हिमाक़त की, तुमको चाहिए था कि कांटे से बचते हुए एहतियात के साथ फूल तोड़ो। तुमने एहतियात वाला काम बेएहतियाती से किया। इसी का नतीजा है कि तुम्हारा हाथ ज़ख्मी हो गया।

तुम्हारी कामयाबी इसम ह कि हम सच्चाई का मानत हुए इसस बचन का तदबीर तलाश करें। और वह तदबीर यह है कि कांटों से बच कर फूल को हासिल करें। कांटों में न उलझते हुए फूल तक पहुंचने की कोशिश करें। फूल के साथ कांटे का होना कोई सादा बात नहीं। यह फ़ितरत और कुदरत की जुबान में इन्सान के लिए सबक़ है। यह प्रकृति की भाषा में इन्सानी हक़ीक़त का ऐलान है। यह उस फ़ितरी मनसूबे का परिचय है, जिसके मुताबिक़ ख़ुदा ने मौजूदा दुनिया को बनाया है। इसका मतलब यह कि इस दुनिया में वही क़दम कामयाब होता है जो बच कर चलने के उसूलों के मुताबिक़ हो। जहां बचने की ज़रूरत हो वहां उलझना, जहां तदबीर की ज़रूरत हो वहां एजीटेशन करना सिर्फ़ अपनी नालायक़ी (अयोग्यता) का ऐलान करना है। ख़ुदा ने जिस मौक़े पर बच कर चलने का तरीक़ा इख़्तियार करने का हुक्म दिया हो, वहां उलझने का तरीक़ा इख़्तियार करना ख़ुद अपने आपको मुजरिम बनाना है। चाहे आदमी ने दूसरों को मुजरिम साबित करने के लिए डिक्शनरी के तमाम अल्फाज़ दोहरा डाले हों। ख़ुदा का सबूत अगर एक इन्सान का वजूद है तो ख़ुदा का वजूद क्यों नहीं? अगर हवा और पानी, दरख़्त और पत्थर, चांद और सितारे मौजूद हैं तो उनको वजूद देने वाले का वजूद संदिग्ध क्यों? हक़ीक़त यह है कि रचना की मौजूदगी रचना-प्रक्रिया का सबूत है। और इन्सान को मौजूदगी इस बात का सबूत है कि यहां एक ऐसा सृष्टा मौजूद है, जो देखे और सुने, जो सोचे और घटनाओं को प्रकट रूप दे।

प्रभावो का दख़ रह हत ह, जा सितारा से निकल कर कराड़ा साल के बाद हमारा आंखों तक पहुंचे हैं। यही तमाम चीज़ों का हाल है। इस दुनिया की हर चीज़ जिसको इन्सान ‘देख’ रहा है, वह सिर्फ़ अप्रत्यक्ष तौर पर उसे देख रहा है। सीधे तौर पर इन्सान किसी चीज़ को नहीं देखता; और न अपनी मौजूदा सीमाओं के रहते हुए वह उसे देख सकता है। फिर जब दूसरी तमाम चीज़ों के वजूद को अप्रत्यक्ष दलील की बुनियाद पर माना जाता है तो ख़ुदा के वजूद को अप्रत्यक्ष और बिलवास्ता दलील की बुनियाद पर क्यों न माना जाए? हक़ीक़त यह है कि ख़ुदा उतना ही साबितशुदा है, जितनी इस दुनिया की कोई दूसरी चीज़। इस दुनिया की हर चीज़ अप्रत्यक्ष दलील से साबित होती है। इस दुनिया में हर चीज़ अपने प्रभाव से पहचानी जाती है। ठीक यही हालत ख़ुदा के वजूद की भी है। ख़ुदा यक़ीनन सीधे तौर पर हमारी आंखों को दिखाई नहीं देता, मगर ख़ुदा अपनी निशानियों के ज़रिए यक़ीनन दिखाई देता है। और बेशक ख़ुदा के इल्मी सबूत के लिए यही काफ़ी है। किसी ने कहा है - “इन्तिक़ाम लेने से पहले सोच लो कि इन्तिक़ाम का भी इन्तिक़ाम लिया जाएगा।” यह ज़िन्दगी की निहायत गहरी हक़ीक़त है। और इस हक़ीक़त को समझने के बाद ही कोई शख़्स मौजूदा दुनिया में अपनी ज़िन्दगी को कामयाब बना सकता है।

यक़ीनन ऐसा ही होगा। और फिर बुराई का एक चक्कर चल पड़ेगा। आपका एक तकलीफ़ के बाद दूसरी तकलीफ़ सहनी पड़ेगी। इसलिए अक़लमन्दी यह है कि नज़रअन्दाज़ करने का तरीक़ा इख़्तियार करके बात को पहले ही मरहले में ख़त्म कर दिया जाए। मेरी मुलाक़ात एक बार उत्तर प्रदेश के एक शख़्स से हुई। उसने एक नेता की साझेदारी में एक बस ख़रीदी। उस आदमी ने पैसा लगाया और नेता ने लाइसेंस हासिल किया। लाइसेंस क़ानूनी तौर पर नेता के नाम था। मगर फ़ायदे में दोनों बराबर के हिस्सेदार थे। कुछ दिनों के बाद नेता की नियत ख़राब हो गयी। उसने सोचा कि क़ानूनी तौर पर गाड़ी मेरी है, क्योंकि लाइसेंस मेरे नाम है। फिर मैं उसका फ़ायदा दूसरों को क्यों दूं। उसने एकतरफ़ा तौर पर गाड़ी पर क़ब्ज़ा कर लिया। अब आदमी बहुत गुस्सा हुआ। उसके अन्दर इन्तिक्राम की आग भड़क उठी। उसने इरादा किया कि नेता को क़त्ल कर डाले। वह उसके क़त्ल का मन्सूबा बनाने लगा। इस दौरान उसकी मुलाक़ात एक बूढ़े तजुर्बेकार आदमी से हुई। पूरा हाल सुनने के बाद बूढ़े आदमी ने कहा कि अगर तुम अपने मन्सूबे के मुताल्बिक़ नेता को मार डालो तो उसके बाद उसके बच्चे क्या तुम को जिन्दा छोड़ देंगे? यह बात आदमी की समझ में आ गई। उसने नेता के क़त्ल का इरादा छोड़ दिया। इसके बजाय उसने यह किया कि उसके पास जो रक़म अब भी बाक़ी थी उससे छोटे पैमाने पर कारोबार शुरू कर दिया। चन्द साल बाद जब उस आदमी से मेरी

ظاہر ہے کہ دوسرے کا نقصان پہنچانا اپنے آپ میں کوئی مقصد نہیں۔ مقصد جو ہر آدمی اپنے سامنے رکھتا ہے یا اسکو رکھنا چاہیے، وہ اپنے آپکو فائدہ پہنچانا ہے۔ اگر دوسرے کو نقصان پہنچانے کا نتیجہ یہ ہو کہ آخر میں آپکو خود اسسے بڑا نقصان اٹھانا پڑے تو ایسی حالت میں عقلمندی کیا ہے؟ اگر آپ ٹھنڈے دماغ سے سوچیں تو آپ یہ ماننے پر مجبور ہونگے کہ ایسی کاروائی جو آخر میں خود اپنے خلاف پڑنے والی ہو، وہ کسی بھی حال میں سہی نہیں کہی جا سکتی۔ ایسی ہر کاروائی صرف بیوقوفی ہے نہ کہ وہ کام جو ایک عقلمند آدمی کو کرنا چاہیے۔

ہمارے سماج میں جو جھگڑے ہیں اور عدالتوں میں جو مقدموں کی بھرمار ہے وہ سب اسی انتقامی جذبے کا نتیجہ ہے۔ لوگ دوسروں کی طرف سے ہونے والی شکایت یا تکلیف کو بھلا نہیں پاتے۔ وے فوراً प्रतिक्रिया का شکار ہو جاتے ہیں اور جوابی کاروائی کرنا شروع کر دیتے ہیں۔

اس طرح جو جھگڑے اور مقدمے بڑھتے ہیں اسکا نقصان صرف دوسرے آدمی کو نہیں پہنچتا بلکہ اس آدمی کو بھی پہنچتا ہے جسنے جوابی کاروائی کرکے دوسرے کے خلاف بدلہ لینا چاہا تھا۔

ہر آدمی سکون کی زندگی چاہتا ہے۔ ہر آدمی یہ چاہتا ہے کہ اسکا سماج امن اور شान्ति का समाज हो। यह मकसद उसी वक़्त हल हो सकता है जबकि लोगों के अन्दर बदला न लेने का स्वभाव पैदा हो जाए। यही हमारे मसले کا एकमात्र हल है। इसी से हर आदमी को सुकून हासिल हो सकता है। और پورا समाज भी इसी के ज़रिए امن اور شान्ति से रह सकता है।

लाकन यहा वक़्त और यहा रक़म किसी पॉज़िटिव चीज़ को हासिल करन में लगा दी जाए तो वह फ़ायदे के साथ आदमी की तरफ़ लौटती है। जैसा कि उपरोक्त आदमी के साथ हुआ। इन्तिक्राम लेने में ताकत को ख़र्च करना ताक़त को खोना है, और एक पोजिटिव काम में ताक़त लगाना, ताक़त को और भी इज़ाफ़े के साथ दोबारा पा लेना है। ऐसी हालत में यह समझना मुश्किल नहीं कि अक़्लमन्द आदमी को दोनों में कौन-सा तरीक़ा इख़्तियार करना चाहिए। मौंत की ख़बर रोज़ाना अख़बारों में जो ख़बरें होती हैं उनमें से एक मुस्तक़िल ख़बर वह है, जिसको मौत का कॉलम (Obituary) कहा जाता है। ये ख़ुशहाल घरानों की मौत की घटनाएं हैं। मरने वाले की तस्वीर के साथ उसकी मौत की ख़बर होती है और फिर बताया जाता है कि फ़लां तारीख़ को फ़लां जगह पर उनकी आख़िरी रस्में अदा होंगी, दोस्त और रिश्तेदार वहां आकर दिवंगत की आख़िरी रस्मों में 15 सितम्बर 1990 के अख़बार से दो मिसालें लीजिए। टाइम्स आफ इंडिया के आख़िरी पेज पर इसी क़िस्म की एक सचित्र ख़बर है। उसके शब्द ये हैं – रमेश गोयल का, जो कि एक बेहतरीन आदमी थे, बिल्कुल जवानी की उम्र में अचानक अमरीका में देहान्त हो गयाः Ramesh Goel, a good man has died suddenly at a very young age in U.S.A.

उसक वारिस या उसक जानन वाला अपना ज़िम्मदारा सिर्फ़ यह समझत ह कि सामाजी रिवाज के मुताबिक़ उसकी आख़िरी रस्में (अंतिम संस्कार) अदा कर दें। हिन्दू अपने रिवाज के अनुसार, और मुसलमान और दूसरी क़ौमें अपने रिवाज के अनुसार। लेकिन सिर्फ़ इतना ही काफ़ी नहीं। हक़ीक़त यह है कि दूसरे आदमी की मौत ख़ुद अपने लिए मौत की ख़बर है। मौत का असली फ़ायदा यह है कि मरने वाले की मौत को देख कर ज़िन्दा रहने वाले अपने मरने को याद करें। वे दूसरे के अंजाम को देख लें। मौत से नसीहत लेना सबसे बड़ा काम है, लेकिन यही वह काम है जिसको करने वाला आज की दुनिया में कोई नहीं। कुरआन में यह ख़बर दी गई है कि अख़िरकार इन्साफ़ का एक दिन आने वाला है जबकि तमाम इन्सानों को जमा करके उनके अमल के मुताबिक़ उनको सज़ा या इनाम दिया जाएगा। यह ख़बर दुनिया की मौजूदा हालत के ठीक मुताबिक़ है। इन्सान की अर्थपूर्ण रचना इस ख़बर में अपनी व्याख्या पा लेती है। इस तरह इन्सान के बोलने और अमल करने की रिकार्डिंग की व्यवस्था जो मौजूदा दुनिया में पाई जाती है वह इस ख़बर के बाद पूरी तरह समझने लायक़ बन जाती है। (तज़किर-उल-कुरान, तशरीह सूरह इंफीतार, नंबर 82)

सम्पादकीय टिप्पणीः बोलने और अमल करने की रिकार्डिंग की

جو لوگ مخلوق کی برائیوں میں اٹکے ہوئے ہوں، وہ خالق کی عظیم تر برائی کا ادراک نہیں کر سکتے۔

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