Al-Risala · May 2023

سادہ حل

Al-Risala, May 2023, pp. 13–17

By Maulana Wahiduddin Khan

ایک صاحب نے اپنا واقعہ لکھا ہے۔ وہ ایک ریگستانی علاقے میں گئے۔ پر سفر کر رہے تھے۔ اتنے میں آندھی کے آثار دکھائی دیے۔ تانگے والے نے اپنا تانگہ اس نے بتایا کہ اس علاقے میں بڑی خطرناک آندھی آتی ہے، وہ اتنی تیز ہوتی ہے کہ بڑی بڑی چیزوں کو اڑا لے جاتی ہے۔ اور آثار بتا رہے ہیں کہ اس وقت اسی طرح کی آندھی آ رہی ہے۔ اس لیے آپ لوگ تانگے سے اتر کر اپنے بچاؤ کی تدبیر کریں۔

آندھی قریب آ گئی تو ہم لوگ ایک پیڑ کی طرف بڑھے کہ اس کی آڑ میں پناہ تانگے والے نے ہمیں درخت کی طرف جاتے ہوئے دیکھا تو وہ چیخ پڑا۔ کہا کہ پیڑ کے نیچے ہرگز نہ جانا۔ اس آندھی میں بڑے بڑے پیڑ گر جاتے ہیں۔ اس لیے اس موقع پر پیڑ کے نیچے چھپنا بہت خطرناک ہے، اس نے کہا کہ اس آندھی کے مقابلے میں بچاؤ کا ایک ہی طریقہ ہے۔ وہ یہ کہ آپ لوگ کھلی زمین پر اوندھے لیٹ جائیں۔

ہم نے تانگے والے کے کہنے پر عمل کیا اور زمین پر منہ نیچے کر کے لیٹ گئے۔ آندھی آئی اور بہت زور کے ساتھ آئی۔ وہ بہت سے پیڑوں اور ٹیلوں کو اڑا لیکن یہ سارا طوفان ہمارے اوپر سے گزرتا رہا۔ زمین کی سطح پر ہم محفوظ پڑے رہے۔ کچھ دیر کے بعد جب آندھی کا زور ختم ہوا تو ہم اٹھ ہم نے محسوس کیا کہ تانگے والے کی بات بالکل ٹھیک تھی۔

क्या है, इसका सादा तराक़ा यह है कि जब आधी उठ ता वक़्ता तार पर अपना झंडा नीचा कर लो। कोई शख़्स भड़काने वाली बात कहे तो तुम उसकी तरफ़ से अपने कान बंद कर लो। कोई तुम्हारी दीवार पर कीचड़ फेंक दे तो उसके ऊपर पानी बहा कर उसे साफ़ कर दो। कोई तुम्हारे ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करे तो तुम उसके लिए दुआ करने में लग जाओ। तुम बेहतरीन गिरोह हो जिसको लोगों के वास्ते निकाला गया है। तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो (आले- इमरान कुरान की इस आयत में बेहतरीन गिरोह का मतलब सहाबियों का गिरोह है। यानी इस गिरोह को ख़ास तौर से निकाल कर मैदान में लाया गया है। यह उस रेगिस्तानी मन्सूबें की तरफ़ इशारा है, जिसके ज़रिए सहाबियों की वह अनोखी जमाअत तैयार की गई, जिसको प्रोफेसर डी. एस. मार्गोलेथ (1858-1940) ने हीरोज़ों की एक क़ौम (a nation of heroes) का नाम दिया है। रसूल के साथी या सहाबी कौन थे? ये इस्माईल की संतान की नस्ल से ताल्लुक रखते थे। इस नस्ल के पूर्वज इस्माईल बिन इब्राहिम हैं। चार हज़ार साल पहले हज़रत इब्राहिम ने अपने छोटे बेटे इस्माईल और उनकी मां हाजरा को इराक़ से निकाला और उनको ले जाकर अरब के रेगिस्तान में छोड़ दिया। उस वक़्त यह इलाक़ा एक दुर्गम और बंजर इलाक़ा था। वहां कोई इन्सानी आबादी

तर पर चुनता था। आदमी मजबूर था कि लगातार चुनॉतियां का सामना करत हुए वह इस कठिन माहौल में ज़िन्दा रहने की कोशिश करे। सभ्यता की ख़राबियों से दूर इस सादा माहौल में एक नस्ल बनना शुरू हुई। ये ऐसे लोग थे, जिनके हालात ने उन्हें मानवीय औपचारिकताओं से दूर कर रखा था। वे बनावटी नैतिकता से अपरिचित थे। वे एक ही मार्गदर्शन को जानते थे और वह प्रकृति का मार्गदर्शन था। प्रकृति बेशक बेहतरीन शिक्षक है, और रेगिस्तान की यह नस्ल इसी शिक्षक के तहत तैयार हुई। सूरह आले-इमरान की उपरोक्त आयत में बेहतरीन उम्मत की दो विशेषताएं बताई गई हैं। एक यह कि वे ‘मारूफ़’ का हुक्म देने वाले और ‘मुन्कर’ से रोकने वाले हैं। यानी असत्य को बर्दाश्त न करना और सत्य से कम किसी चीज़ पर राज़ी न होना, यह उनका स्थायी स्वभाव है। वे उन लोगों में से नहीं जो अपने आसपास से ग़ैर ज़िम्मेदार रह कर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं या जिनका रवैया केवल निजी स्वार्थ से जुड़ा होता है। बल्कि वे पूर्ण रूप से सत्यवादी और हक़पसन्द हैं। हक़ और नाहक की बहस में न पड़ना, या नाहक से समझौता करके ज़िन्दा रहना उनके लिए उनकी दूसरी विशेषता यह बताई गई है कि वे अल्लाह पर ईमान रखते हैं। दूसरे शब्दों में यह कि उन्होंने ख़ुदा की पहचान या ‘बोध’ को पाया है। वे ऊपरी सतह पर जीने वाले लोग नहीं हैं। उन्होंने सर्वोच्च सच को खोजा है। उनकी चेतना पाए हुए इन्सान की चेतना है। उन्होंने सृष्टि के पीछे सृष्टा का साक्षात्कार किया है। ये दोनों गुण बेहद दुर्लभ गुण हैं। सत्य और बोध को उपलब्ध वही लोग हो सकते हैं

सबस बड़ा अमल सत्य से सामंजस्य स्थापित करना हो और रसूल के सहाबा बेशक उन दुर्लभ इन्सानों में से थे जो इन्सानियत के इस पैमाने पर आख़िरी हद तक खरे उतरे। यह वह पूर्ण इन्सान है, जिसकी इन्सानियत पूरी तरह सुरक्षित होती है, जो अपने रचनात्मक स्वभाव पर क़ायम रहता है। यही वह ज़िन्दा प्रकृति वाला इन्सान है जो अरब के रेगिस्तानी माहौल में ढाई हज़ार साल तक चली प्रक्रिया में तैयार किया गया। और सहाबियों का गिरोह वह चुना हुआ इन्सानी गिरोह है, जिसको इस ख़ास इन्सानी नस्ल से चुन कर निकाला गया। सहाबा वे लोग थे जो दूसरों की भलाई के लिए जिए, जिनकी सारी कोशिश यह थी कि वे लोगों को जहन्नम से बचा कर जन्नत में पहुंचा दें। इसीलिए वे बेहतरीन गिरोह दाई लोगों का ख़ैरख्वाह होता है, चाहे वे सरकशी करें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 20 दिन से ज़्यादा मुद्दत तक तायफ़ का मुहासिला (घेराबंदी) किया। जब मुसलमानों के लिए वह मुश्किल हो गया तो आपने वापसी का हुक्म दिया। एक शख़्स ने आपसे कहाः ऐ ख़ुदा के रसूल, सक़ीफ़ (क़बीले) को बद्दुआ कीजिए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने दोनों हाथ उठाए और कहाः ऐ अल्लाह सक़ीफ़ को हिदायत दे और उनको मुसलमान कर के वापस ला। इसी तरह आप से कहा गया कि क़बीला दौस सरकश और मुन्कर (निरंकुश और इंकार करने वाला) हो गया है। उसके ख़िलाफ़ बददुआ

مومن کا مطلب ہے ایک ایسا شخص جو دنیا کی زندگی میں برائیوں سے بچ کر رہے، "جو کرنے اور نہ کرنے" کے بارے میں خدا کی مقرر کی ہوئی حدوں کی پابندی کرے۔ روزہ اور حج اسی قسم کی با اصول زندگی کی مشق ہے۔

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