ख़ुदा का सबूत
Al-Risala, July 2023, pp. 1–16
By Maulana Wahiduddin Khan
अगर एक इन्सान का वजूद है तो ख़ुदा का वजूद क्यों नहीं? अगर हवा और पानी, दरख़्त और पत्थर, चांद और सितारे मौजूद हैं तो उनको वजूद देने वाले का वजूद संदिग्ध क्यों? हक़ीक़त यह है कि रचना की मौजूदगी रचना-प्रक्रिया का सबूत है।
आसमान पर सितारे जगमगाते हैं आम आदमी समझता है कि वह सितारा को देख रहा है, हालांकि ख़ालिस वैज्ञानिक नज़रिए से यह सही नहीं है। जब हम सितारों को देखते हैं तो हम सितारों को सीधे नहीं देख रहे होते हैं, बल्कि उनके उन प्रभावों को देख रहे होते हैं, जो सितारों से निकल कर करोड़ों साल के बाद हमारी आंखों तक यही तमाम चीज़ों का हाल है। इस दुनिया की हर चीज़ जिसको इन्सान 'देख' रहा है, वह सिर्फ़ अप्रत्यक्ष तौर पर उसे देख रहा है। सीधे तौर पर इन्सान किसी चीज़ को नहीं देखता; और न अपनी मौजूदा सीमाओं के रहते हुए वह उसे देख फिर जब दूसरी तमाम चीज़ों के वजूद को अप्रत्यक्ष दलील की बुनियाद पर माना जाता है तो ख़ुदा के वजूद को अप्रत्यक्ष और बिलवास्ता दलील की बुनियाद पर क्यों न माना जाए? हक़ीक़त यह है कि ख़ुदा उतना ही साबितशुदा है, जितनी इस दुनिया की कोई दूसरी चीज़। इस दुनिया की हर चीज़ अप्रत्यक्ष दलील से साबित होती है। इस दुनिया में हर चीज़ अपने प्रभाव से पहचानी जाती है। ठीक यही हालत ख़ुदा के वजूद की भी है। ख़ुदा यक़ीनन सीधे तौर पर हमारी आंखों को दिखाई नहीं देता, मगर ख़ुदा अपनी निशानियों के ज़रिए यक़ीनन दिखाई देता है। और बेशर ख़ुदा के इल्मी सबूत के लिए यही काफ़ी है।
शख़्स का अल्लाह का पहचान हो जाए, उसका जुबान बालन से थक जाएगा। जिस तरह ख़ाली बर्तन ज़्यादा आवाज़ करता है, और जो बर्तन भरा हुआ हो उसमें आवाज़ कम हो जाती है, कम पानी में पत्थर फेंकें तो बहुत ज़्यादा लहरें पैदा होंगी, मगर समुन्दर में पत्थर फेंकिए तो उसमें पत्थर की वजह से लहरें नहीं उठेंगी। यही मामला इन्सान का है। ख़ाली इन्सान ज़्यादा बोलता है और भरा हुआ इन्सान हमेशा कम बोलता है। अल्लाह की पहचान सबसे बड़ी हक़ीक़त की पहचान है। आदमी जब अल्लाह को उसकी अथाह महानताओं के साथ पाता है, तो अपना वजूद उसको बिल्कुल तुच्छ मालूम होने लगता है। उसको महसूस होने लगता है कि अल्लाह सब कुछ है और उसके मुक़ाबले में मैं कुछ नहीं। यह एहसास उसकी ज़ुबान को बन्द कर देता है। वह हैरानी की हालत में गुम होकर रह जाता है। फिर यह कि अल्लाह की पहचान आदमी के अन्दर ज़िम्मेदारी और जवाबदेही की चेतना को जगाती है। वह महसूस करने लगता है कि हर-हर काम और हर-हर बोल का मुझे उस सर्वशक्तिमान के सामने हिसाब देना है। यह एहसास उसको मजबूर करता है कि वह नापतौल कर बोले। वह कहने से पहले सोचे और अपनी बात को जांच-परख ले। ख़ुदा की पहचान आदमी के अन्दर संजीदगी पैदा करती है और संजीदगी, ठीक अपने स्वभाव के मुताबिक़, आदमी को ख़ामोश कर देती है। ख़ामोश आदमी यह बता रहा होता है कि वह गहरा आदमी है। वह ऊंची हक़ीक़तों
हो जाए वह ख़ामोश ज़्यादा दिखाई देगा और बालता हुआ कम। पत्थर खिसक गया बनी इसराईल के इतिहास की एक घटना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबियों को सुनाई। सुनने वालों में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि अल्लाहू अन्हु भी थे। वह इस घटना को इस तरह बताते हैं :
तुम से पहले जो लोग गुज़रे हैं उनमें से तीन आदमी एक सफ़र पर निकले। चलते-चलते रात हो गई तो रात बिताने के लिए वे एक गुफ़ा में रुके। पहाड़ों पर अक्सर पत्थर गिरने (land slide) की घटनाएं होती रहती हैं। रात के वक़्त ऊपर से एक बड़ा सा पत्थर लुढ़क कर गिरा और इसकी वजह से गुफ़ा का मुंह बन्द हो गया। उन्होंने कहा कि इस चट्टान को हटाने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है, सिवा इसके के हम अपने नेक कामों का हवाला देकर अल्लाह से दुआ करें। अब एक आदमी दुआ करने बैठा। उसने कहा, "ऐ ख़ुदा, मेरे मां-बाप बहुत बूढ़े हो चुके थे। मेरा नियम था कि रोज़ाना शाम को जब मैं अपने जानवर चरा कर लौटता तो जब तक मैं उन दोनों को दूध न पिला लेता न ख़ुद दूध पीता और न किसी और को पिलाता। एक दिन मैं चारे की तलाश में दूर निकल गया। शाम को वापसी में इतनी देर हुई कि मेरे मां-बाप सो गए। मैंने उन दोनों के लिए दूध निकालकर तैयार किया। जब उनके पास दूध लेकर पहुंचा तो दोनों को सोया हुआ पाया। मुझे यह अच्छा न लगा कि मैं उनको जगाऊं और मुझको यह भी गवारा न था कि मैं उनसे पहले दूध पिऊं और अपने बच्चों को पिलाऊं। मैं उनके पास खड़ा हो गया। मेरे हाथ
अब दूसरे आदमी ने दुआ शुरू की। उसने कहा, "ऐ ख़ुदा, मेरे चाचा का एक लड़का थी। वह मुझे बहुत प्रिय थी। उससे मुझे इतनी ज़्यादा मुहब्बत थी जो मर्दों को औरतों से होती है। मैंने उससे अपनी काम-वासना तृप्त करनी चाही पर वह मना करती रही। कुछ अर्सै बाद अकाल पड़ा और वह मुसीबत में फंस गई। वह मदद के लिए मेरे पास आई। मैंने उसको 120 दीनार इस शर्त पर दिए कि वह मुझको अपने ऊपर क़ाबू दे दे। वह इसके लिए तैयार हो गई। यहां तक कि जब मैं उसके ऊपर पूरी तरह हावी हो गया और उसके दोनों पैरों के बीच बैठ गया तो उसने कहा, 'ख़ुदा से डर और मुहर को उसके हक़ के बिना न तोड़ा।' तो मैंने उसे छोड़ दिया हालांकि वह मुझको तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा प्रिय थी। और जो दीनार मैंने उसको दिए थे वे भी उससे वापस नहीं लिए। ऐ ख़ुदा, अगर मैंने यह काम तेरी खुशी के लिए किया है तो उस मुसीबत से तू हमको निकाल जिसमें हम इस वक़्त फंसे हुए हैं।" तो चट्टान थोड़ी-सी हट गई, पर इतनी नहीं कि वे निकल सकें। अब तीसरे आदमी ने दुआ की। उसने कहा, "ऐ ख़ुदा, मैंने कुछ मज़दूरों से काम कराया। काम के बाद मैंने सबको मज़दूरी दे दी। पर एक मज़दूर अपनी मज़दूरी छोड़ कर चला गया। मैंने उसकी छोड़ी हुई रक्म को कारोबार में लगा दिया। उससे मुझको बहुत ज़्यादा फायदा हुआ। कुछ अर्सै बाद वह आदमी वापस आया और कहा, 'ऐ अल्लाह के बन्दे! मेरी मज़दूरी मुझे दे दो।' मैंने उससे कहा, 'ये ऊंट, ये गायें, ये बकरियां और ये गुलाम जो तुम देख रहे हो, यह सब तुम्हारी मज़दूरी है।' उसने कहा, 'ऐ ख़ुदा के बन्दे! मुझसे मज़ाक़ न कर। मैंने उससे कहा कि मैं तुमसे मज़ाक़ नहीं कर
साबित होता है कि दुआ ऐसी चीज़ है जो पत्थर की चट्टान को भी अपना जगह से खिसका देती है। पर यह वह दुआ नहीं है जो मुंह से सिर्फ शब्दों के रूप में निकलती है और आदमी की वास्तविक ज़िन्दगी से उसका कोई ताल्लुक नहीं उपरोक्त मिसाल बताती है कि दुआ से चट्टान खिसकाना उन लोगों के लिए संभव होता है जो अपने आपको पूरी तरह ख़ुदा के हवाले कर दें, जो पूरी तरह ख़ुदा को अपने ऊपर संरक्षक बना लें। यहां तक कि भूख की मार और बीवी बच्चों की मुहब्बत भी उनको ख़ुदा की पसंदीदा राह से न हटा सके। बेहद नाजुक और भावुक घड़ियों में भी ख़ुदा की याद दिलाना उनको चौंका देने के लिए काफ़ी हो। चिन्ता के क्षणों में भी जब ख़ुदा का नाम लिया जाए तो उनके चलते हुए क़दम रुक जाएं और उनके उठे हुए हाथ अपनी हरकत बन्द कर दें। आख़िरत के हिसाब का अन्देशा उन पर इतना ज़्यादा छाया हो कि एक हक़दार का हक़ चुकाने की ख़ातिर अगर उनको अपनी सारी पूंजी देना पड़े तो इससे भी वे हिचकिचाएं नहीं। एक आदमी अगर अपना हक मांगने के लिए खड़ा हो जाए तो वे फ़ौरन उसको मान लें, चाहे मांग करने वाला कितना ही कमज़ोर हो और उसके मुकाबले में उनको कितनी ही ज़्यादा ताक़त हासिल हो। ख़ुदा के बन्दे वे हैं जो अपनी वासनाओं और इच्छाओं को कुचल कर और अपने फ़ायदों की बलि देकर ख़ुदा को अपनाते हैं। और जो लोग इस तरह ख़ुदा को अपना
আপনার याद दिलाना चाहता हूँ कि बामक़सद हान का मतलब सिफ़्र यह नहाँ है कि एक मक़सदी या एक उद्देशयपूर्ण कल्पना आपके ज़ेहन में पाई जा रही हो। कुछ तक़रीरों को सुन कर या कुछ तहरीरों को देख कर एक मक़सदी नज़रिया किसी के दिमाग़ में पहुंच जाए तो सिर्फ़ इस बिना पर उसको बामक़सद इन्सान नहीं कहा जा सकता। बामक़सद इन्सान तो वही होता है जो अपने पूरे वजूद के साथ बामक़सद बन गया हो, जिसकी ज़िन्दगी उसके मक़सद में इस तरह ढल जाए कि दोनों के बीच कोई दूरी बाक़ी न रहे। आप इस वक़्त एक मस्जिद में बैठे हैं, जिसके ऊपर ऊंचे-ऊंचे मीनार खड़े हैं। अगर हवा के ज़रिए कुछ आम के पत्ते उड़ कर आएं और इन मीनारों पर अटक जाएं तो इससे आप इन मीनारों को आम दरख़्त नहीं कहने लगेंगे। आम का दरख़्त तो वही है, जो अपनी जड़ में भी आम हो, अपने तने में भी आम हो, अपनी शाखों में भी आम हो, अपने पत्तों में भी आम हो और वह आम ही के फल दें। आम का दरख़्त आप उसको कहते हैं, जो इस तरह ऊपर से नीचे तक आम हो। महज़ किसी लम्बी खड़ी हुई चीज़ पर आम जैसी लगने वाली चीज़ों का इत्तिफ़ाक़ से जमा हो जाना उसको हरगिज़ आम नहीं बना देता। इसी तरह आपको भी बामक़सद इन्सान उसी वक़्त कहा जा सकता है जब आप सिर से पांव तक अपने पूरे वजूद में बामक़सद बन गए हों। महज़ कुछ नज़रियातों का कहीं से आकर आपके जेहन में अटक जाना आपको बामक़सद नहीं बना देता। इस्लाम ज़िन्दगी का एक मक़सद है और हम उसी वक़्त
का लफ्ज़ देना चाहूंगा। इसका मतलब यह है कि आपका तमाम वचारिक और जेहनी ताकतें आपके मक़सद में पूरी तरह लग जाएं। आपका सोचना, आपका मुहब्बत करना, आपका नफ़रत करना, सब कुछ आपके मक़सद के साथ बावस्ता हो गया हो। आपकी कोई चीज़ दूसरी तरफ़ बिखरी हुई न हो। जूता बनाने वालों के यहां आपने देखा होगा, काम करते-करते उनके पास बहुत-सी कीलें फैल जाती हैं। उस वक़्त वे यह करते हैं कि चुम्बक का एक टुकड़ा लेकर वहां फेरते हैं, जिससे तमाम बिखरी हुई कीलें खिंच खिंच कर उससे चिमट जाती हैं और फिर वे उसे उठा कर ख़ाने में रख लेते हैं। इस मिसाल में अगर चुम्बक की जगह आप अपने मक़सद को रखें और कीलों के बजाए अपनी सोच, खयालात और जज़्बात और एहसासात को रखें तो ज़िन्दगी और मक़सद के बीच ताल्लुक को आप समझ सकते हैं। इसका मतलब यह है कि चुम्बक के आसपास लोहे के टुकड़े जिस तरह एक-एक करके इकट्ठा हो जाते हैं और आसपास का कोई टुकड़ा ऐसा नहीं होता, जो उससे चिमट न गया हो, इसी तरह आदमी के मक़सद के आसपास उसके सारे दिल और सारे दिमाग को इकट्ठा हो जाना चाहिए। यहां एक घटना मुझे याद आती है। एक बार एक साहब मेरे यहां आए। उनको बाज़ार का कुछ काम था। बाज़ार जाकर जब वह लौटे तो उन्होंने एक वाकिया बताया, जिससे मुझे बड़ा सबक़ मिला। वाक़िआ बहुत छोटा-सा है, मगर उसमें हमारे लिए बड़ी नसीहत है। उन्होंने कहा कि मैं एक जगह पहुंचा, जहां सड़क के किनारे बहुत से मोची अपनी-अपनी दुकान लिए बैठे थे। जब मैं उनके पास से गुज़रा तो मैंने देखा
करक या जिसका मरम्मत करक व कुछ पस हासिल कर सकत हो। जैसे इन्सान उनकी नज़र में सिर्फ़ एक 'जूता' है और बस। इसी तरह बामक़सद आदमी अपने मक़सद में गुम रहता है। उसको हर चीज़ में सिर्फ़ अपना मक़सद नज़र आता है। वह हर घटना को, हर मसले को, हर बात को अपने मक़सद की रोशनी में देखता है। यहां तक कि वह अपने मक़सद के खयालों में इतना खो जाता है कि दूसरी चीज़ें उसे भूलने लगती हैं। एक साहब हैं जो बहुत सक्रिय, आदमी हैं जो काम भी करते हैं, उसको पूरी तरह लग कर करते हैं। एक बार मैं एक ऐसे ज़माने में उनसे मिलने गया जब वह अपना नया मकान बनवाने में लगे हुए थे। मैंने देखा कि उनके पायजामे में एक जगह बहुत से लाल- लाल धब्बे पड़े हुए है। पूछा यह क्या है। उन्होंने देख कर कहा, मुझे खुद भी नहीं मालूम। इसके बाद उन्होंने पायजामा उठाया तो मालूम हुआ किसी सख़्त चीज़ से टकराने की वजह से टांग में एक जगह चोट लग गई है। चोट लग कर खून बहा, कपड़े में लगा, फिर अपने आप सूख कर बंद हो गया और उन्हें बिल्कुल पता नहीं चला। जब आदमी के सामने कोई मक़सद हो तो वह इसी तरह उसमें खो जाता है, उस वक़्त वह एक और ही दुनिया में पहुंच जाता है, जहाँ दूसरी चीज़ें उसका साथ छोड़ देती हैं, जहाँ दूसरी चीजें उसे महसूस नहीं होतीं। यहां तक कि खुद अपने जिस्मानी तक़ाज़े भी उसे याद यह वह बात है, जिसको मैंने 'इरतिकाज़' कहा है। बामक़सद आदमी वही है जो
साहब ह जा। एक देहात में दवा इलाज का काम करत हो। उनके पास काई सनद या डिग्री नहीं है, न वह पढ़े लिखे आदमी हैं। बस लोगों की सोहबत और तजुर्बा की वजह से कुछ बातें जान गए हैं। और उसके मुताबिक काम कर रहे हैं, बल्कि अपनी मेहनत और लगन की वजह से अपने इलाके में मशहूर हो गए हैं। उनके घर पर कुछ खेती बाड़ी का काम होता है। एक बार उन्होंने कहा कि मैं खेती के मोटे काम मसलन खोदना, हल चलाना वग़ैरह अपने हाथ से नहीं करता। आप समझेंगे कि वह शायद कोई शेरवानीपोश आदमी होंगे। और अपनी शेरवानी की इज़्ज़त रखने के लिए ऐसे कामों से बचते होंगे। मगर उनको 'शेरवानी' और 'पतलून' की ज़िन्दगी से कोई दिलचस्पी नहीं। वह बिलकुल सीधे-सादे देहाती हकीम है। खेती के सख़्त कामों से अलग रहने की वजह उन्होंने यह बताई कि अगर मैं इस तरह के काम करूं तो मेरा हाथ सख़्त हो जाएगा। उंगलियों की खाल मोटी हो जाएगी। इसका नतीजा यह होगा कि मरीज की नब्ज़ मैं ठीक तरह से देख न सकूंगा। नब्ज़ की धड़कनें बहुत हल्की होती हैं और उनमें बहुत नाजुक फ़र्क होते हैं। उनको महसूस करने के लिए उंगलियों का नर्म होना बहुत ज़रूरी है। अगर उंगलियां हल और कुदाल पकड़ते-पकड़ते सख़्त हो जाएं, जैसा कि इस तरह का काम करने वालों की होती हैं, तो वे नब्ज़ की धड़कनें महसूस करने के क़ाबिल नहीं रहेंगी। हर मक़सद अपने इख़्तियार करने वाले से इसी का तक़ाज़ा करता है। जो शख़्स भी किसी मक़सद को अपनाए, ज़रूरी है कि वह अपनी अमली ज़िन्दगी और अपनी रोज़ाना की सरगर्मियों का अपने मक़सद के साथ तालमेल रखे, वह दोनों में कोई
ఠాక-ఠాక ఢగ సే ఏక సాదా జిన్దగూ గుజార రహా థా ఔర ఉసా కే సాథ దాన క తక్రాజ భీ పూరే కర రహా థా। ఇసకే బాద ఉసకే యహాఁ ఏక లడకీ ఔర ఏక లడకే కీ శాదీ హుఈ। ఉసకే మక్సద కా తకాజా తో యహ థా కి వహ శాదీ కో ఇస తరహ కోరే కి ఉసకీ వజహ సే ఉసకే ఘర మే జో సామాన్య జిన్దగూ చల రహీ హై, ఉసమే కోఈ ఖలల పైదా న హో। మగర ఉసనే పెహలీ ग़లతీ యహ కీ కి శాదీ కే లియే ఏక ఐసే ఖానదాన కో చునా, జిసకా స్టైండర్డ్ ఉసకే ముకాబలే మే బఢా హువా థా, ఫిర్ శాదీ భీ ఇస తరహ కీ జైసే ఆమ దునియాదార లోగ అపనీ శాదియాఁ కరతే హైఁ। ఇసకా నతీజా యహ హుఆ కి న సిర్ఫ్ ఉసకే ఘర కీ సారీ పూఁజీ శాదీ మే లగ గఈ, బల్కి వహ కాఫీ ग़ర్దార్ భీ హో గయా। ఉసకా సారా కారోబార ఉజడ గయా। అగర సిర్ఫ్ ఇతనా హీ నుక్సాన హుఆ హోతా తబ భీ ग़నీమత థా, క్యోంకి జిస తరహ కఈ తరహ కే వక్తీ హాదిసే ఆదమీ కే ఊపర పడతే హైఁ ఔర ఫిర్ వహ సంభల జాతా హై, ఉసీ తరహ దోబారా సంభల జాతా, మగర శాదీ నే ఉసకో ఏక నఈ ముసీబత మే డాల దియా, జిసకే బారే మే పెహలే ఉసనే సోచా భీ న థా। అపనీ లడకీ కో ఉసనే జో కపడే ఔర సామాన దియే ఔర సుసరాల సే ఉసకే లియే జో కపడే వగైర ఆఏ, ఉసకీ వజహ సే శాదీశుదా లడకీ కా రహన-సహన కా సతర యకాయక బహుత బఢ గయా। ఔర అబ ఘర కీ ఏక లడకీ కా సతర బఢా తో ఉసీ కే సాథ దూసరోఁ కా लिहाज़ करనా ज़रूरी था, फिर इसी के साथ नए-नए फर्नीचर से लदी हुई पूरी ఏక గాడీ భీ ఉసకే ఘర ఉతరీ। ఇన చీజోఁ కే నతీజే మే ఉసకీ గ్హెలూ జిన్దగూ కా సతర బిల్కుల బనావటీ తౌర పర యకాయక బదల గయా। అబ హర చీज़ మే పెహలే సే జ్యాదా ఖరచ హోనే లగా। ఇస తరహ ఏక తరఫ్ పిఛలే ग़र्जोఁ కీ అదాయగూ ఔర దూసరీ తరఫ్ బఢే
जो शख़्स किसी मक़्सद के लिए दुनिया में जाना चाहता हो, उसके लिए ज़रूरी है कि वह होश की ज़िन्दगी गुज़ारे, वह अपनी सरगरमियों पर नज़र रखे। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो इस भौतिक दुनिया में हर वक़्त इस बात की संभावना है कि आदमी ऐसे बन्धनों में अपने आपको फंसा ले जिसके बाद वह ऊपर से ज़िन्दा तो नज़र आता हो, मगर मक़्सद के लिहाज़ से उसने खुदकशी कर ली हो। दुनिया की नुमाइशी चीज़ों में दिलचस्पी, भौतिक साज़ो-सामान की बहुतायत, सतही कामों में पड़ना, ग़ैरज़रूरी आदतों में अपने को डालना, घटिया लिट्रेचर पढ़ना—ये चीज़ें आदमी को मक़्सद से दूर कर देती हैं। उसके वक़्त को ग़ैरज़रूरी चीज़ों में लगा देती हैं। उसके जज़्बात और एहसास को मक़्सद के बारे में कमज़ोर करके दूसरी चीज़ों के बारे में तीव्र कर देती हैं। उसको ऐसे सम्बन्धों और ऐसे तक़ाज़ों में उलझा देती हैं कि वह न चाहने के बावजूद दूसरी तरफ़ खिंचता चला जाता है। यहां तक कि अपने मक़्सद से दूर हो जाता है। अगर आपको इस्लाम से लगाव है और आप इसको अपना मक़्सद बना कर इसी के लिए जीना और इसी के लिए मरना चाहते हैं तो आपके लिए ज़रूरी है कि अपनी अमली ज़िन्दगी, अपने ताल्लुक़ात और अपनी रोज़ाना की मसरूफ़ियतों का इसके साथ तालमेल रखें, आप दोनों में कोई विरोधाभास पैदा न होने दें। इस मामले में आपको उस हकीम की तरह बन जाना चाहिए जो अपनी उंगलियों तक की इस हैसियत से हिफ़ाज़त करता है कि वे ऐसे हालात से दो-चार न हों कि वे नब्ज़ देखने की सलाहियत को खो दें। फिर एक मुलसमान का मक़्सद इससे ज़्यादा नाजुक और
जुड़ा अमल भी कभी बमक्सद होता है। ऊपर से देखने में आदमी मक़सद का सा अमल कर रहा होता है, मगर हक़ीक़त में उसके अमल का मक़सद से कोई ताल्लुक़ एक मिसाल लीजिए। हमारे यहां जो मज़हबी फ़िरके हैं उनकी शुरुआत भी अस्ल में एक मक़सदी गिरोह की हैसियत से हुई थी। वे एक ख़ास मिशन लेकर उठे थे, मगर हर शख़्स जानता है कि आज वे अपनी मक़सदी हैसियत को खो चुके हैं। वह एक तहरीक के बजाए एक ठोस क़िस्म की रिवायती अंजुमन बन कर रह गए है। इसका मतलब यह नहीं कि उनकी मक़सदी धारणा उनके ज़ेहन से निकल गई और न ऐसा है कि मक़सद के लिए काम करना उन्होंने छोड़ दिया है। ये सब चीजें आज भी किसी न किसी शक्ल में उनके अन्दर पाई जाती हैं। मगर उनमें अब वह स्पिरिट बाक़ी न रही, जो एक मिशन के अलमबरदार के अन्दर होती है। अब उनका मक़सद महज़ एक बहस और बातचीत का विषय है, जिस पर वह कभी आपस में, कभी दूसरों से बातें कर लेते हैं। उनके रिसाले और अख़बार निकलते हैं। मगर इन रिसालों और अख़बारों की हैसियत मक़सदी पर्चों से ज़्यादा कारोबारी संस्थाओं की है। उनके इजितमे और सभा सम्मेलन भी होते हैं, मगर उन इजितमों की हैसियत किसी मक़सदी सरगर्मी की नहीं, बल्कि वह बीते हुए वक़्त की पड़ी हुई एक लकीर है, जिस पर वे रस्मी तौर पर चले जा रहे हैं। उनके जमाअती फंड भी हैं, जिनमें वे अपनी आमदनी का एक हिस्सा देते हैं। मगर यह देना ज़्यादातर एक जमाअती तक़ाज़े के तहत होता है न कि हक़ीक़त में अल्लाह के रास्ते में देने के जज़्बे के तहत। वे अपने ख़यालात को फैलाने के लिए
वह अमल जो हक़ीक़त में 'दाइयाना' जज़्ब के तहत निकलता है और वह अमल जो पारम्परिक तौर पर या महज़ ड्यूटी अंजाम देने के लिए किया जाता है, दोनों में बड़ा फ़र्क़ है। एक हक़ीक़त है और दूसरा हक़ीक़त की नक़ल। एक जगह बात सिर्फ़ मुंह से निकलती है और दूसरी सूरत में जब आदमी बोलता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसने अपने कलाम में अपनी पूरी शख़्सियत को उंडेल दिया है। एक सूरत में आदमी का अमल सिर्फ़ एक लगी-बंधी कार्रवाई नज़र आता है और दूसरी सूरत में उसका अमल उसके बेताब जज़्बात का इज़हार होता है। एक सूरत में आदमी की तमाम ज़िन्दगी उसके मक़सद में डूबी हुई होती है और दूसरी सूरत में कुछ मक़सदनुमा हिस्से उसकी ज़िन्दगी के साथ इस तरह इधर-उधर अटके हुए होते हैं जैसे किसी मीनार में आम के कुछ पत्ते। यह ख़तरा हर उस गिरोह को है जो एक मक़सद को लेकर उठे और उस पर उसको पच्चीस-पचास साल गुज़र जाएं। लेकिन याद रखिए कोई गिरोह उसी वक़्त तक मक़सदी गिरोह है जब तक हक़ीक़त में वह मक़सदी तड़प के तहत काम कर रहा हो। उसके बाद जब उसकी गाड़ी उससे उतर कर पारंपरिक डगर पर चल पड़े, जब उसकी सरगर्मियां बेताब जज़्बात के इज़हार के बजाए घिसी-पिटी कार्रवाई बन कर रह जाएं तो वह तहरीक के बजाए रस्म और जमाअत के बजाए अंजुमन बन जाती है, इसके बाद भी हालांकि वह एक बामक़सद गिरोह दिखाई देता है। मगर मक़सदी हैसियत से अब वह मर चुका होता है। वह बामक़सद इन्सान नहीं होता बल्कि गुज़रे हुए बामक़सद इन्सानों की लाश होती
هنگامی امل کے دوران ہم اپنا چتنا کا جس طرح 'ایکٹو' کرت هے، ہمارا بھاونا میں جو اندرونی ہلچل پیدا ہوتی ہے۔ امل کرتے ہوئے ہماری روح کو احساس کی جو خوراک ملتی ہے، وہی ہمارا اصل حاصل ہے۔ جب مقصدیت زندہ ہو تو آدمی کا امل ایک زندہ امل ہوتا اور جب مقصدیت مر جاتی ہے تو امل ایک بیجان کاروائی بن کر رہ جاتا ہے۔ آدمی حرکت کرتا ہے مگر اسکی روح پر جڑتا چھائی رہتی ہے۔ آدمی ظاہری کارنامے دکھاتا ہے مگر آدمی کا اندرونی وجود اس طرح सोया रहता है جیسے اس پر نیند چھائی ہوئی ہو۔ سے زندہ دکھائی دیتا ہے، مگر اندر سے وہ ایک مرا ہوا انسان ہوتا ہے۔ اب میں ایک آخری بات کہہ کر اپنی بات ختم کروں گا۔ اس طرح کی باتیں جب کہی جاتی ہیں تو کچھ لوگ جواب دیتے ہیں، "آپکی باتیں تو ٹھیک ہیں، ہم خود بھی اپنے اندر یہی چیز پیدا کرنا چاہتے ہیں۔ مگر سمجھ میں نہیں آتا کہ یہ چیز کیسے پیدا ہو؟
ویسے تو یہ محض ایک سوال ہے مگر دراصل اسکے ذریعہ سے اپنے الزام کو اپنے سے ہٹا کر دوسرے کے سر ڈالنے کی کوشش کی گئی ہے۔ مگر سوچیے کہ وہ 'دوسرا' کون ہے، جسکے اوپر آپ اپنا الزام ڈالنا چاہتے ہیں۔ ظاہر ہے کہ وہ اس دنیا کا مالک خدا ہے۔ اسنے ساری چیزوں کو بنایا ہے۔ کو الزام دینے کا مطلب یہ ہے کہ خدا نے یہ دنیا اس ڈھنگ سے بنائی ہے کہ ہم وہاں اپنے ایمانی تقاضوں کو حاصل کرنا چاہیں تو حاصل نہ کر سکیں۔ ہے کہ یہ بالکل غلط بات ہے۔ خدا اس سے پاک ہے کہ اس پر یا اسکے سُرجن
लाज़िमा तौर पर प्रकृति और जगत का ऐसा ही होना चाहिए कि हम एस बन सक। इसलिए हर ख़राबी का कारण अपने अन्दर ढूंढिए, क्योंकि आपके बाहर हक़ीक़त में कोई चीज़ ही नहीं है, जहां ये कारण पाए जा रहे हों। (आजमगढ़ के एक इजतिमा में की गई तक़रीर 1963)
कलिम-ए-इस्लाम की हक़ीक़त इख़्लास और तक़वा है हज़रत उस्मान बिन अफ्फान कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम को यह कहते सुना कि मैं एक ऐसा कलिमा जानता हूं कि जो बन्दा भी इसको अपने दिल से कहे वह आग पर हराम हो जाएगा। हज़रत उमर फ़ारूक़ ने कहा कि मैं तुमको बताऊं कि वह कलिमा क्या है? वह 'इख़्लास' का कलिमा है, जिसको अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आपके असहाब पर लाज़िम किया था। वह तक़वा का कलिमा है, जिसकी तल्क़ीन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने चाचा अबू तालिब को मौत के वक़्त की की थी। वह इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के सिवा कोई मा'बूद नहीं। मेहनत की कमाई सबसे बेहतर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से किसी ने पूछा, “ऐ ख़ुदा के रसूल, सबसे बेहतर कमाई कौन-सी है? आपने जवाब दिया, “हाथ की कमाई”।