एक आज़माइश
Al-Risala, September 2023, pp. 2–9
By Maulana Wahiduddin Khan
कुरआन में बताया गया है कि अल्लाह ने किसी के सीने में दो दिल नहीं बनाए। (अल-अहज़ाब 4) इससे इन्सान की एक पैदाइशी कमज़ोरी मालूम होती है। वह कमज़ोरी यह है कि इन्सान एक वक़्त में दो चीज़ों पर ध्यान नहीं दे सकता। आदमी सिर्फ़ एक चीज़ को अपने ध्यान का केन्द्र बना सकता है। जब भी वह एक चीज़ पर फोकस ध्यान केन्द्र) करेगा तो दूसरी चीजें निश्चित रूप से उसके फोकस से बाहर (out of focus) हो जाएंगी। इन्सान का यह गुण इन्सान के लिए एक बेहद नाजुक आज़माइश है। अपने हालात या अपनी रूचि के लिहाज से वह एक चीज़ को अपनाता है। ‘एक दिल' वाले स्वभाव की वजह से उसे एक चीज़ सारी चीज़ नज़र आने लगती हैं। बाकी चीजें बाहरी तौर पर मौजूद होते हुए भी उसके लिए गैर-मौजूद हो जाती हैं। वह अपनी इस सोच में दृढ़ होता रहता है, यहां तक कि उसी एक चीज़ को वह सब से बड़ी चीज़ समझ लेता है, जिस पर शुरू में उसने अपनी नज़रों को जमाया था। यह नाजुक और गंभीर स्थिति है, जिसमें हर इन्सान फंसा हुआ है। अपने प्राकृतिक स्वभाव की वजह से चूंकि दूसरी चीज़ें आदमी के फ़ोकस में नहीं होतीं इसलिए बाक़ी चीज़ों की हैसियत उसके लिए ऐसी हो जाती है जैसे उनकी कोई अहमियत नहीं, बल्कि शायद उनका कोई अस्तित्व ही नहीं। इन्सान की इसी पैदाइशी बनावट की वजह से इन्सान के अन्दर वह कमज़ोरी
किसी इन्सान के लिए इस तरह की तबाहकुन स्थिति क्या आती है? इसका कारण उसका यही स्वभाव है। वह जब एक बार किसी चीज़ को अपना लेता है तो इसके बाद ऐसा होता है कि उस एक चीज़ के अलावा दूसरी तमाम चीज़ें अपने आप उसके लिए ओझल (आउच ऑफ फ़ोकस) हो जाती हैं। वह मौजूद होते हुए भी उसके अपने लिए ऐसी बन जाती हैं जैसे कि वे मौजूद ही न हों। अब आदमी की सारी दिलचस्पी उसकी अपनी अपनाई हुई चीज़ से हो जाती है। अपने विशिष्ट प्रनोविज्ञान के कारण वह इस बनावटी विश्वास में पड़ जाता है कि वह मामले का सिरा पकड़े हुए है। हालांकि उसके हाथ में सिर्फ़ एक ऐसा बेक़ीमत तिनका होता है, जो तूफ़ान के पहले ही झटके में उससे अलग हो जाए। इसीलिए क़ुरआन में कहा गया है कि हर इन्सान अपने ढंग (तरीके) पर अमल करता है और अल्लाह ही बेहतर जानता है कि कौन शख्स ज़्यादा सही रास्ते पर है (बनी इसराईल 84)। इस आयत से यह बात मालूम होती है कि ऐसा हो सकता है कि एक शख़्स अपने निजी तौर-तरीक़े में अपने आपको पूरी तरह सच्चा समझे पर वह अल्लाह की नज़र में सच्चा न हो। ऐसे लोग आख़िरत में बेक़ीमत हो कर रह जाएंगे। इन्सान की यह पैदायशी कमज़ोरी जिस तरह आम इन्सान के लिए घातक है उसी तरह वह मुस्लिम समाज के लोगों के लिए भी 'फ़ितना' है। इस आम आज़माइश के मामले में मुसलमान अपवाद नहीं। मुसलमानों के बीच भी ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग दीन के एक पहलू को लेकर उसको अपने ध्यान का केन्द्र बना लें और फिर दीन के दूसरे तमाम तक़ाज़े उनके फ़ोकस से बाहर
वह स्थित है, जिसके बार म कुरआन हरक का चेतावनी द रहा ह- कहा, क्या मैं तुमको आगाह करूं कि अपने कर्मों के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा घाटे में कौन हैं। वे लोग जिनकी कोशिश दुनिया की ज़िन्दगी में अकारथ हो गई। और वे समझते रहे कि वे बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। (अल-कहफ़)। इस इम्तिहान से बचने का एकमात्र ज़रिया अपने आपको जांचना (आत्मविश्लेषण) है। यानी अपने स्वभाव को कसौटी न समझना, बल्कि कुरआन और सुन्नत को दीन की कसौटी बना कर अपने आपको उस पर रज़ीन ने ज़ैद बिन असलम से रिवायत किया है। वह कहते हैं कि दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक रोज़ पानी मांगा। उनके पास एक प्याले में पानी लाया गया, जिसमें शहद मिला हुआ था। हज़रत उमर ने कहा कि यह अच्छा है। मगर मुझे कुरआन की आयत (अल-अहकाफ़ 20) याद आती है जिसमें बताया गया है कि क़ियामत में कुछ लोगों से कहा जाएगा कि तुम अपनी अच्छी चीजें दुनिया में ले चुके। अब आख़िरत की अच्छी चीज़ों में तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं। मुझे डर है कि यह वही न हो। हज़रत उमर ने कहा और प्याला पिए बग़ैर वापस कर दिया। ऊपर वाली आयत के तहत अक्सर 'तफ़्सीरों में इस तरह के वाक़ियात दर्ज
नहीं पहुँच सकता, जब तक उसका यह हाल न हो जाए कि वह (कभी कभी) ऐसी चीज़ों को भी छोड़ दे, जिसमें हर्ज़ नहीं है, इस अन्देशे की वजह से कि शायद इसमें हर्ज़ हो। हज़रत उमर के उस मामले को भी इसी हदीस के तहत देखना चाहिए। अगर दुनिया की अच्छी चीज़ों को ज़रूरी तौर पर क़ाबिले तर्क समझा जाए तो यह नज़रिया क़ुरआन की उन आयतों से टकरा जाएगा, जिनमें अच्छी और पाक चीज़ों को साफ़ तौर पर ईमान वालों के लिए जायज़ बताया गया है। यहां तक कि कहा गया है कि कहो, अल्लाह की 'ज़ीनत' (शोभा) को किसने हराम ठहराया है, जो उसने अपने बन्दों के लिए पैदा की हैं और खाने की तय्यब (पाक) चीज़ें। कहो कि वे दुनिया की ज़िन्दगी में भी ईमान वालों के लिए हैं और आख़िरत में तो वे ख़ास उन्हीं के लिए होंगी (अल-आराफ़ 32)। कुरआन में मामूली लफ़्ज़ी फ़र्क के साथ दो जगहों पर यह बात कही गई है कि अल्लाह किसी क़ौम की हालत को उस वक़्त तक नहीं बदलता जब तक कि वह उसको न बदल डाले जो उसके जी में है (अर रअद)। इस खुदाई सुन्नत से मालूम होता है कि किसी गिरोह के क़ौमी और इज्तिमाई हालात उसके वैयक्तिक हालात पर निर्भर हैं। इसको दूसरे लफ़्ज़ों में इस तरह कहा जा सकता है कि क़ौमी हैसियत का दारोमदार मानवीय गुणों पर है। किसी क़ौम के लोगों में इन्सानी या अख़्लाक़ी या नैतिक खूबियां जैसी होंगी, उसी
ही इसका वजह से उनका ताक़त बहुत बढ़ जाता ही व हर मामिल मँ गैरमामूली तौर पर कामयाब रहते हैं। जापान की इस एकता का राज़ वहां के लोगों का वैयक्तिक स्वभाव है, जो तक़रीबन तमाम जापानियों के अन्दर पाया जाता है। प्रोफ़ेसर ची नकानी (Chie Nakane) की जापानी भाषा में एक किताब है, जिसका तर्जुमा अंग्रेजी में जापानी समाज (Japanese Society) के नाम से छपा है। इस किताब में जापानी प्रोफ़ेसर ने लिखा है कि जापानी का वैयक्तिक मिज़ाज यह होता है कि वह समझता है कि मैं किसी के मातहत हूं। I am under someone. दूसरे लफ़्ज़ों में यह कि हर जापानी अधीनता-भाव में जीता है। इसलिए जब भी कोई सामूहिकिता कायम होती है तो वह फ़ौरन उससे जुड़ जाता है। वह तन्ज़ीम यानी संगठन के नेता को फ़ौरन अपना नेता मान लेता है, क्योंकि वह पहले ही से यह माने हुए था कि मैं किसी के मातहत हूं - यह है जापानियों की उस एकता का राज़ जिसके नतीजे में उन्होंने मौजूदा ज़माने में अप्रत्याशित तरक्की की है। अब मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को देखिए। मुसलमानों का मामला जापानियों के बिल्कुल बरअक्स है। मसजिद से लेकर सियासत तक कोई मामला ऐसा नहीं, जिसमें मुसलमान मुत्तहिद या एक हों। मौजूदा मुसलमान दुनिया की सबसे ज़्यादा बरबाद कौम हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह बेशक
मौजूदा ज़माने में जब मुसलमान पस्ती, मग़्लूबियत और पतन का शिकार हुए तो उनके रहनुमाओं की तश्खीस (मर्ज़ की जांच) यह थी कि पश्चिम के प्रभाव में आ जाने से उनको पस्ती से दो-चार किया। इसलिए तमाम रहनुमाओं ने एक या दूसरी सूरत में यह किया कि इस्लाम को गर्वपूर्ण अन्दाज़ में पेश करना शुरू कर में दिया, ताकि उनके प्रभुत्व को ख़त्म कर सकें। इसका नतीजा यह है कि मुसलमानों की पूरी नस्ल गर्व और हाकिमियत (शासकत्व) के एहसास पर परवरिश पा कर उठी है। हर आदमी नज़रिए और आस्था के लिहाज़ से अपने अन्दर बरतरी और बढ़प्पन का जज़्बा लिए हुए है। क्योंकि यही जज़्बा उसके अन्दर उभारा गया था। यह मानसिकता एकता की क़ातिल है। एकता उस वक़्त क़ायम होती है जबकि एक शख़्स को बड़ा बना कर बाक़ी तमाम लोग उसके मुक़ाबले में छोटे बनने पर राज़ी हो जाएं। मगर मुसलमानों की गर्व की मानसिकता इसमें रुकावट है। इसका नतीजा यह है कि अब हर आदमी सरदार बनना चाहता है। हर आदमी चाहता है कि उसकी बात चले। हर आदमी चाहता है कि हाकिमाना सीट पर बैठे। ऐसी हालत में एकता कायम होना मुमकिन नहीं। और मुसलमानों की यही वह मानसिकता है, जिसने आज उनके दरम्यान किसी भी एकता को سراسر नामुमकिन बना दिया है। मौजूदा ज़माने के मुसलमानों का अस्ल मसला सत्ता को खोना नहीं, बल्कि इन्सानी गुणों को खोना है। मौजूदा मुसलमान अपने रहनुमाओं और लीडरों की ग़लत रहनुमाई के नतीजे में ऊंचे मानवीय गुणों से खाली हो गए हैं। अब सबसे पहला ज़रूरी काम यह है कि मुसलमानों के अन्दर वे गुण पैदा किए जाएं जो
कितन हो बड़े पैमान पर की जाए, मुसलमानों के लिए किसी नए भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती। कुरआन में बहुत विस्तार के साथ जन्नत का ज़िक्र किया गया है। उन सबका खुलासा इस संक्षिप्त आयत में है कि जन्नत में वह तमाम चीज़ें होंगी जिनको आदमी का जी चाहेगा और जिनसे उसकी आंखों को लज़्ज़त हासिल होगी इन्सान तमाम मालूम सृष्टि में एक अनोखी सृष्टि है, जो लज़्ज़त (आनंद) चाहता है जो लज़्ज़त का बोध कर सकता है। इस अजीब इन्सान के लिए अल्लाह तआला ने यह बेहद अजीब संभावना रखी है कि उसके लिए श्रेष्ठम लज़्ज़तों से भरी हुई एक जन्नत बना दी, जहां वह हमेशा-हमेशा रह सके। लज़्ज़त (pleasure) की सृष्टि बेशक सृजनहार का एक हैरतनाक रचनात्मक करिश्मा है। एक इंजीनियर ख़ुदा की दी हुई अक़्ल और ख़ुदा की दी हुई चीज़ों को काम में लाकर मशीनी इन्सान (रोबोट) बनाता है। वह सारे इन्सानी काम करता है। पर किसी मशीनी इन्सान के अन्दर आनन्द बोध नहीं। कोई मशीन किसी भी चीज़ से आनंदित होना नहीं जानती। यह सिर्फ़ इन्सान है जो आनन्द और लज़्ज़त का बोध करता है, जो अपनी पसंदीदा चीज़ों से आनंदित हो आनन्द या लज़्ज़त कोई सीमित चीज़ नहीं। यह एक निहायत व्यापक बल्कि असीमंत अर्थ रखने वाला शब्द है। इन्सान सिर्फ़ खाने-पीने जैसी लज़्ज़तों ही से आनंदित नहीं होता, बल्कि हर स्तरीय चीज़ में उसके लिए लज़्ज़त है। मसलन एक कम्प्यूटर सौ हज़ार सवालों का निहायत सही जवाब देगा। मगर
किया जाएगा वह भी चरम स्तरार्थ शख्सियत में ढाल कर दाखिल किया जाएगा। इसलिए जन्नत का हर काम असीमित आनन्द देने वाला बन जाएगा। वहां बोलना, छूना, देखना, सुनना, उठना, बैठना और चलना-फिरना हर क्रिया अपने अन्दर अनन्त, असीमित आनंद से भरी होगी। कुरआन और साइंस 1984 के आखिर में एक ख़बर कई अख़बारों में छपी। कनाडा के अख़बार सिटीज़न (22 नवम्बर 1984) ने उसकी सुर्खी इस तरह लगाई: प्राचीन पवित्र किताब अपने वक़्त से सौ साल आगे। नई दिल्ली के अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में (10 दिसम्बर 1984) यह ख़बर इस सुर्खी के साथ छपी: