कुरआन आधुनिक साइंस पर बाज़ी ले जाता है।
Al-Risala, September 2023, pp. 9–14
By Maulana Wahiduddin Khan
भ्रूण विज्ञान के एक विद्वान जिनका ताल्लुक़ कनाडा की टोरेंटो यूनिवर्सिटी से है, उन्होंने सऊदी अरब के कई सफर किए हैं, ताकि कुरआन की कुछ आयतों की व्याख्या करने में मदद करें। ये आयतें वे हैं जिनमें मानव-भ्रूण के विकास का ज़िक्र है। यह डाक्टर कैथ्मूर हैं। इनकी खोजों से, जो टेस्ट ट्यूब बेबी की ईजाद करने वाले डाक्टर राबर्ट एडवर्ड्स से सम्बद्धता रखती हैं, ज़ाहिर होता है कि कुरआन की सम्बद्ध आयतें इन्सानी भ्रूण के क्रमिक विकास का निहायत
यह सात वर्ष पहल का बात ह, टारान्टा यूनिवर्सिटी के एक भ्रूण-वैज्ञानिक एक गैरमामूली वैज्ञानिक अभियान पर सऊदी अरब गए। उनसे कुरआन की कुछ आयतों की व्याख्या में मदद चाही गई थी। यह डाक्टर कैथ मूर थे। पहली टेस्ट ट्यूब बेबी के आविष्कारक डा. एडवर्ड ने भी उनकी व्याख्याओं की पुष्टि कर दी थी। उन दिनों वैज्ञानिकों ने मुस्लिम 'उल्मा' को कुरआनी आयतों के बारे में अपनी खोज से हैरान कर दिया था। वही कुरआन जिसको मुसलमान तेरह सौ वर्ष से 'हिफ़्ज़' व 'तिलावत' करते चले आ रहे हैं। जो उन्होंने खोज की थी वह यह थी कि कुरआन में मानव भ्रूण का जो नज़रिया बयान किया गया है वह अब एक निर्विवाद सच्चाई बन कर सामने आया है। और यह कि पश्चिमी खोजकर्ताओं को यह हक़ीक़त 1940 में पता चली और इस सिलसिले में ज़्यादातर मालूमात तो महज़ पिछले पन्द्रह वर्ष में सामने आई हैं। डाक्टर कीथ मूर टोरोंटो यूनिवर्सिटी के एम्ब्रियोलॉजी विभाग के चेयरमैन हैं। इन्सान की तख़्लीक़ और सृजन से ताल्लुक़ रखने वाली कुरआनी आयतों पर अपना ख़ास पेपर पेश करते हुए उन्होंने कहा:
"मुझे इस बात ने हैरत में डाल दिया, जब मुझे यह पता चला कि कुरआन ने सातवीं सदी ईस्वी में जो तथ्य पेश किए वे किस क़दर दुरुस्त और वैज्ञानिक सच्चाइयों से पूर्ण हैं और उनमें कितनी वैज्ञानिक सटीकता है।"
मुसलमानों की आस्था है कि कुरआन सातवीं सदी ईस्वी में ख़ुदा की तरफ़ से अपने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर उतारा गया।
उनक अनुवाद छप चुक हा डॉक्टर मूर कहत ह कि भ्रूण के शुआती 28 दिना में विकास के बारे में कुरआनी आयतों ने जो के तथ्य बयान किए हैं वे इतने सही हैं कि इन्सानी अक्ल को ताज्जुब में डाल देते हैं। डा. मूर को यक़ीन है: कुरआन की आयतें और पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ कथन मज़हब और साइंस के बीच मुद्दतों की खाई को पाटने में मदद कर सकते हैं। जब उनसे पूछा गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कहीं अधकचरी चीर-फाड़ के नतीजे में यह मालूमात सामने आ गई हों, तो उन्होंने कहा कि इस चरण में भ्रूण का आकार एक मिली लीटर के दसवें हिस्से से ज़्यादा नहीं होता। यह इन्सानी आंख को एक छोटे से नुक्ते की शक्ल में नज़र आता है। इसकी शिनाख्त एक ताक़तवर सूक्ष्मदर्शी के बग़ैर मुमकिन नहीं और यह बात अपनी जगह साबित है कि सत्रहवीं सदी ईस्वी से पहले सूक्ष्मदर्शी ईजाद नहीं हुई थी। डाक्टर मूर ने जब अपनी तहक़ीक़ पेश की, उससे दो वर्ष पहले उन्हें जद्दा की शाह अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी ने बुलाया था। उनके अलावा डाक्टर राबर्ट एडवर्ड्स को भी बुलाया था। यह वही डाक्टर राबर्ट हैं, जिनके कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में किए गए प्रयोग की बदौलत पहले टेस्ट ट्यूब बच्चे की पैदाइश अमल में आई। उनके अलावा डाक्टर टी.वी.एन. प्रसाद और डाक्टर मार्शल जानसन भी आमंत्रित किए गए। डाक्टर मूर कहते हैं कि इस मौके पर होने वाली कान्फ्रेंस के उल्मा ने इन चारों विशेषज्ञों को कुरआन की बहुत सी आयतों के अंग्रेज़ी तर्जुमे पेश किए और उनसे राय मांगी कि क्या इनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है? एक आयत जो पेश की गई वह यह थी:
कि इनस तात्पर्य पट का दीवार, गर्भाशय का पर्दा और बच्चादानी का अन्दरूना झिल्ली है। एक दूसरी आयत में बताया गया है कि बाद में बूंद को खून के लोथड़े (मुज़ग़ा) में तब्दील कर दिया जाता है। अरबी में मुज़ग़ा का लफ़्ज़ जोंक के लिए आया है। डा. मूर और दूसरे विशेषज्ञों का ख़्याल है कि अरब में पाई जाने वाली जोंक और 24 दिन के भ्रूण में हैरतअंगेज़ तौर पर समरूपता पाई जाती है। फिर यह कि इस चरण पर भ्रूण गर्भाशय की दीवार से जोंक की तरह लिपट जाता है। आगे की एक आयत कहती है कि यह जोंकनुमा लोथड़ा बाद में चबाई हुई चीज़ की शक्ल इख़्तियार कर लेता है। इस चरण में भ्रूण की शक्ल को समझाने के लिए डा. मूर ने प्लास्टिक की एक छोटी-सी चीज़ तैयार की और फिर उसे अपने दांतों से चबाया और फिर उसे दिखाते हुए कहा कि 28 दिन के भ्रूण की शक्ल हूबहू ऐसी होती है और उस पर जो निशान पाए जाते हैं वे भी दांतों के निशानों जैसे होते हैं। इस आयत से यह भी मालूम होता है कि इस अवस्था में जिस्म के चंद ही अंगों की शनाख़्त हो सकती है और हक़ीक़त भी यही है कि सिर्फ दिल और आंखों की पहचान मुमकिन होती है। डा. मूर ने कहा कि क़ुरआन की आयतें कहती हैं कि तेज़ी से निकलने वाले वीर्य के एक बेहद छोटे हिस्से में जनन क्षमता रखने वाले शुक्राणु पाए जाते हैं। डा. मूर ने बताया कि जिस हक़ीक़त को स्पैलिनज़ैनी ने अठारहवीं सदी ईस्वी में पहचाना, जब उसने प्रयोगात्मक तरीके से साबित किया कि जब तक नर और मादा के प्रजनन तत्वों का आपसी मेल न हो तो दैवीय अस्तित्व प्रकट नहीं हो सकता। क़ुरआन ने इससे ग्यारह सदियों पहले 'मख़्लूत क़तरे' के बारे
हाज़्म न आर उन से अबू हुरुरा न कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अल्लाहि वसल्लम से कहा गया कि आप मुश्रिकों के ख़िलाफ़ बद्दुआ करें। आपने फ़रमाया कि मुझको ला'नत करने वाला बना कर नहीं भेजा गया है, बल्कि मुझको रहमत बना कर भेजा गया है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर और आपके सहाबियों और साथियों पर उनके दुश्मनों ने जो मुसीबतें डालीं और ज़ुल्म किया वह आज के ज़ुल्म और मुसीबत से बहुत ज़्यादा था। यहां तक कि मुक़द्दस सहाबा इन जुल्मों को देख कर कह उठे कि उनके ख़िलाफ़ बद्दुआ की जाए। मगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके ज़ेहन को सही किया। उन्होंने फ़रमाया कि हमारा काम दुनिया को ख़ुदा की रहमतों के साये में दाख़िल करना है न कि उनकी हलाकत और बरबादी का सामान करना। यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है। आपके ख़िलाफ़ लोगों ने जुल्म किया, इसके बावजूद आपने उनके साथ ख़ैरख़्वाही की। लोगों ने आपके ऊपर मुसीबतें डालीं, इसके बावजूद आप उनके लिए अल्लाह ताआला से दुआ करते रहे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इसी आला और बेहतर सुलूक का नतीजा था कि आपको दुनिया में आलातरीन कामयाबी हासिल हुई। क़ौमें आपके आगे झुक गईं जुल्म और सरकशी करने वाले आपके हाथ पर बैअत करके यानी आपसे दीक्षा लेकर आपके साथी और सहयोगी बन गए। मुल्समानों को भी अपने पैग़म्बर के इसी नमूने पर अमल करना है। हमको
यहा पग़म्म्बर का तऱक़ा हो और पग़म्म्बर का तऱक़ा इख़्तियार करने के बाद हो मुसलमान ख़ुदा की उन नुसरतों और मदद के हक़दार बन सकते हैं जिनका वा’दा ख़ुदा ने अपने पैग़म्बर के ज़रिए उनके लिए किया है।