اقوال حکمت
Al-Risala, January 2023, pp. 50–61
By Maulana Wahiduddin Khan
اللہ سے ڈرنے والے انسان کے لیے دلیل سب سے زیادہ قابلِ لحاظ چیز ہوتی ہے۔ مگر جو دل اللہ کے ڈر سے خالی ہو، اس کے لیے دلیل سب سے زیادہ ناقابلِ لحاظ چیز بن جائے گی۔ اللہ کے لیے عبادت ہے اور انسان کے لیے خدمت۔ عبادت کی حقیقت خدا کے آگے مکمل سپردگی ہے اور خدمت کی حقیقت انسان کی کامل خیر خواہی۔ بے پیسہ والا آدمی پیسہ کی طرف دوڑ رہا ہے اور جس کے پاس پیسہ آجائے وہ سرکشی کی طرف۔ ہوشیار آدمی موت کے بارے میں سوچتا ہے اور غافل آدمی صرف زندگی کے بارے میں۔ موجودہ دنیا امکاناتِ جنت کا تعارف ہے۔ وہ تعمیرِ جنت کا مقام نہیں۔
جو چیز آدمی کے لیے کل مقدر کی گئی ہو اس کو آپ کسی بھی تدبیر کے ذریعہ آج حاصل نہیں کر سکتے۔ لوگ جس چیز کو موت کے اُس پار ڈھونڈ رہے ہیں، اس کو قدرت نے موت کے اُس پار رکھ دیا ہے۔ مسلّم شخصیتوں کی سطح پر لوگ دادِ اعتراف دے رہے ہیں، حالانکہ اعتراف وہ ہے جس کا ثبوت غیر مسلمہ شخصیت کی سطح پر دیا جائے۔
मतलब यह है कि यहाँ इज़्ज़त और बरतरी सिर्फ उन्ही लागों का मक़्सद नहीं है जो तादाद और वसायल (साधनों) में ज़्यादा हों। यहाँ कम तादाद और कम वसायल वाला गिरोह भी इज़्ज़त और बुलंदी हासिल कर सकता है। बशर्ते कि वह इज़़निल्लाह (अल्लाह की मर्जी व हुक्म) पर चले। यह इज़़निल्लाह या ख़ुदाई क़ानून क्या है? वह क़ुरआन के मुताबिक़, यह है कि जो चीज़ लोगों को नफ़ा पहुंचाने वाली है वह ज़मीन में ठहराव और पायदारी (स्थायित्व) हासिल करती है (13:17)। यही बात हदीस में इस तरह बयान गई है कि ऊपर का हाथ नीचे के हाथ से बेहतर है। यानी जो हाथ दूसरों को देता है, वह उससे बेहतर है जो दूसरों से लेने वाला है। इसको एक लफ़्ज़ में इस तरह कह सकते हैं कि समाज में हमेशा दो किस्म के गिरोह होते हैं। एक देने वाला गिरोह (giver group) और दूसरा लेने वाला गिरोह (taker group)। ज़िन्दगी का यह अबदी (शाश्वत) क़ानून है कि जो गिरोह लेने वाला हो उसको इस दुनिया में पस्ती और मग़लूबियत (पराभवता) की सतह पर जगह मिले। और जो गिरोह देने वाला गिरोह बने उसको दूसरों के ऊपर इज़्ज़त, बरतरी और बढ़ाई का दर्जा हासिल हो। मौजूदा ज़माने में मुस्लिम रहनुमाओं ने मिल्लत को उठाने व बुलन्द करने के नाम से जो तहरीकें उठाईं, वे ज़िन्दगी के इस शुऊर (चेतना) से सिरे से ख़ाली थीं। ये लोग इस बात को न जान सके कि मुसलमानों की कामयाबी का राज़ यह है कि उन्हें तख़लीक़ी या रचनात्मक गिरोह की हैसियत से उठाया जाए। इसके बजाय उन्होंने मुसलमानों को लेने वाला गिरोह (taker group) के तौर पर उठाने की कोशिश की। 1947 से पहले इस का इज़हार जुग़राफ़ियाई तक़सीम (भौगोलिक बंटवारे) की शक्ल में हुआ और 1947 के बाद िल्ली तशख़्खुस (सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान) की हिफ़ाज़त की सूरत में हो रहा है। मुसलमानों की तरक़्क़ी का राज़ इंसानों से दूर रहने में नहीं बल्कि इंसानों के लिए उपयोगी होने में है। उन्हें तख़लीक़ी (creative) गिरोह बनना है, न कि जामिद यानी
करेगा। कि दुनिया में कस-कस कमता माक थ जबकि वह खुदापरस्ती का सबूत देकर आख़िरत में उसका इनाम पा सकता था। मगर उस वक्त उसने मौके खो दिए और अब ये मौक़े कभी उसके लिए आने वाले नहीं। मौक़े को खो देने का एहसास बेशक सबसे बड़ी नफ़सियाती (मनोवैज्ञानिक) सज़ा होगी, जो हमेशा-हमेशा आदमी को तड़पाती रहेगी। दूसरी जगह क़ुरआन में कहा गया है:
और बेशक यह याददिहानी है डरने वालों के लिए और हम जानते हैं कि तुम में इसके झुठलाने वाले हैं, और वह मुंकिरों के लिए पछतावा है। (69: 48-50) दुनिया में बार-बार आदमी के सामने ऐसे मौक़े आते जबकि वह कोई अमल (काम) करके आख़िरत का इनाम हासिल कर सके। मगर आदमी, कुरआन के मुताबिक, ज़ुल्म और घमंड (27: 14) की बिना पर मतलूबा (वांछित) अमल नहीं करता। ऐसे लोग जब दुनिया से निकल कर आख़िरत में पहुंचेंगे तो अचानक वह महसूस करेंगे कि यहां उनके लिए हसरत और पशेमानी के सिवा और कुछ नहीं। अब एक-एक करके उन्हें वे गुज़रे हुए लम्हे याद आएंगे जबकि उनके सामने आख़िरत के लिए अमल करने का एक मौक़ा आया, पर उन्होंने इस मौक़े को बेदर्दी से खो दिया। उस वक्त आदमी कहेगा कि आह मेरे सामने हक़ बात ज़ाहिर हुई, जिसका साथ देकर मैं हक़ (सच्चाई) का मानने वाला बन सकता था। मुझे मौक़ा मिला कि मैं हक़ को उसके हक़दार के हवाले कर दूं। मुझे यह मौक़ा मिला कि मैं हक़ की गवाही देने वाला बनूं। मुझे यह मौक़ा मिला कि मैं दुरुस्त बात कहूं चाहे वह मेरे मुवाफ़िक हो या मेरे ख़िलाफ़। मुझे मौक़ा मिला कि मैं उन लोगों में से बनूं जो खुदा के ख़ौफ़ से अपनी ज़बान बंद कर लेते हैं, पर उन मौक़ों को मैंने खो दिया। मैं अपने आपको खुदा के चाहे हुए बंदों में शामिल नहीं कर सका। मैंने दुनिया में नेकी के मौक़े को खोया था, इसीलिए आख़िरत में इनाम के मौक़े में भी अब मेरा कोई हिस्सा नहीं। अल्लाह वाले वो हैं जो क़ुरआन वाले हैं
दुनिया की कुल मुस्लिम आबादी का 40 फ़ासद हिस्सा मुस्लिम अल्पसंख्यक का है जामिया अज़हर काहिरा (मिस्र) में एक इस्लामी कान्फ्रेंस हुई। इस मौक़े पर तक़रीर करने वालों में डा. अब्दुस्सबूर मरज़ूक भी थे। उन्होंने अपनी तक़रीर में बताया कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मुल्कों के मुसलमान अपने मुल्क के बहुसंख्यक वर्गों की ज्यादतियों का शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि उनके हाथों मौत से दो-चार होने वाले मुसलमानों की तादाद तीन करोड़ तक पहुंच चुकी है। उन्होंने मुस्लिम मुल्कों के विदेश मंत्रियों से अपील की कि वे मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मसलों को हल करने की कोशिश करें (अख़बार अल-आलामुल इस्लामी, 6 मार्च 1989, पेज 1)। यह किसी एक शख़्स की बात नहीं है। मौजूदा ज़माने के तमाम मुस्लिम रहनुमा एक या दूसरी शक्ल में इसी बात को दोहरा रहे हैं। मगर इस मामले में हमारे रहनुमा अब तक जो कुछ करते रहे हैं वह सिर्फ़ यह है – बहुसंख्यक वर्ग या ग़ैर-मुस्लिम हुकूमत के ख़िलाफ़ फ़रियाद या विरोध करना। मगर यह मामला इससे ज़्यादा संगीन है। यह हमको ग़ैर-मुस्लिम ताक़त के ख़िलाफ़ विरोध प्रकट करने से ज़्यादा अल्लाह की तरफ़ रूजू करने की दावत देता है, यानी अल्लाह की तरफ़ झुकने और उससे लौ लगाने पर क़ुरआन में बताया गया है कि एक छोटी जमाअत भी बड़ी जमाअत पर ग़ालिब आ जाती है, अल्लाह के इज़्न (मर्ज़ी) से, और अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है (2:249)। यह आयत बताती है कि मुसलमानों के किसी गिरोह को अगर अपने माहौल में ज़ोर हासिल न हो तो उन्हें यह समझना चाहिए कि वह इज़्नुल्लाह से महरूम हो गए हैं। ऐसी हालत में उन्हें कुरान के अल्फाज़ में 'अल्लाह की तरफ़ दौड़ने' (51:50) के हुक्म
वह बालता हा। वह काम करता हा। मगर हक़ीक़त म वह एक मशान होता ह न कि काई शऊर या चैतन्य। वह उसी तरह मैकानिकी अन्दाज़ में अमल करता है, जैसे इन्सान की बनाई हुई दूसरी तमाम मशीनें। लन्दन के एक दफ़्तर में एक रोबोट रखा गया था, ताकि वह चपरासी (office boy) के तौर पर काम कर सके। यह रोबोट जब तैयार होकर दफ़्तर में आया तो दफ़्तर की सेक्रेटरी मिस जैनी सेफ़ ने उसको अजमाइशी हरकत (trial run ) देनी चाही। वह रोबोट की बैटरी जांच रही थीं कि रोबोट हरकत में आ गया। वह सेक्रेटरी के पीछे चलने लगा। अब यह हालत हुई कि सेक्रेटरी आगे-आगे भाग रही हैं और मशीन उनको पीछे से दौड़ा रही है। रोबोट इस तरह चल रहा था जैसे उसने कंट्रोल क़बूल करने से इन्कार कर दिया है। इस भाग दौड़ में एक नया टाइपराइटर टकरा कर ज़मीन पर गिर पड़ा और टूट गया। आख़िरकार बड़ी मुश्किल से रोबोट को क़ाबू में लाया गया (हिन्दुस्तान टाइम्स, 30 जून 1981)| मौजूदा ज़माने में जो लोग ख़ुदा को नहीं मानते उनका कहना है कि कायनात इसके सिवा कुछ नहीं कि वह बहुत बड़ी मशीन है। वह बस उसी तरह चल रही है जिस तरह कोई 'रोबोट' मैकानिकी तौर पर चलता है। मगर कायनात या ब्रह्माण्ड का खरबों साल से बेहद संगठित तौर पर एक सी हालत में चलना इस मान्यता का खंडन कर रहा है। अगर कायनात महज़ एक मैकानिकी मशीन होती, जैसे रोबोट, तो यक़ीनन उसमें बार-बार उसी क़िस्म के टकराव होते जैसा कि लन्दन के आफ़्रिस में ऊपर वाली घटना में हुआ। कुरआन में है: और सूरज अपने एक तयशुदा मदर पर चक्कर लगाता है। यह ज़बरदस्त बुद्धीमान हस्ती का तय किया हुआ अन्दाज़ा है। और चांद के लिए हमने मंज़िलें ठहरा दी हैं। यहां तक कि वह फिर खजूर की सूखी शाख़ की तरह रह जाता है। न सूरज के बस में है कि वह चांद को जा पकड़े और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है। हरेक अपने ख़ास दायरे में चक्कर लगाता है (36:38-40)। कुरआन का यह बयान
(17:36)। हदीस में आया है कि तुम में जो शख़्स फ़तवा देने में ज़्यादा जरा (दुस्साहसी) है वह जहन्नम के ऊपर ज़्यादा जरी है। (सुनन अल-दारमी, 159)
इसलिए फ़तवा देने के मामले में सहाबी बेहद एहतियात बरतते थे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद के बारे में हदीस में आया है कि अब्दुल्लाह तराज़ू में उहुद पहाड़ से भी ज़्यादा वज़नी हैं। इसके बावजूद उनका यह हाल था कि वह कूफ़ा में थे। उन से एक मामले में पूछा गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। लोग उनसे महीने भर पूछते रहे। यहां तक कहा कि अगर आप ही फ़तवा न देंगे तो हम किस से पूछें? फिर भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर हमेशा फ़तवा देने से परहेज़ करते थे। लोग जब ज़ोर डालते तो कहते कि हमारी पीठ को जहन्नम के लिए सवारी न बनाओ। (अल-मारिफ़ा व अल-तारीख़, 1/490)
इन रिवायतों में फ़तवे से मुराद कोई महदूद और सीमित फ़तवा नहीं है। इसका ताल्लुक़ उन तमाम बातों से है जो मुसलमानों के साथ होती हैं और जिनमें वे अपने आलिमों और अपने रहनुमाओं से राय पूछते हैं। ऐसे मामलों में आलिमों और रहनुमाओं का फ़र्ज़ है कि वे बोलने से ज़्यादा सोचें। वे उस वक़्त तक कोई बयान न दें जब तक इस मामले में मशवरा, और ग़ौरो-फ़िक्र की तमाम शर्तों को आख़िरी हद तक पूरा न कर चुके हों। ऐसे मामलों में न बोलना इससे बेहतर है कि आदमी ग़ैरज़िम्मेदाराना तौर पर बोलने लगे। सामूहिक मामलों में राय देना बेहद नाज़ुक ज़िम्मेदारी है, क्योंकि अगर राय ग़लत हो तो लोगों को नामाلوم मुद्दत तक उसका नुक़सान भुगतना पड़ता है। इसलिए आदमी को चाहिए कि अगर वह बोलना चाहता है तो पहले उसकी तमाम शर्तों को पूरा करे, उसके बाद अपनी राय ज़ाहिर करे। वह नेकी नेकी नहीं जिससे फ़ख्र और बढ़ाई का जज़्बा पैदा हो
पर खुल गया कि यह सच्चा दान हो। वह उसी वक़्त ईमान लाए और रात हुए सज्दे में गिर इस आयत में ईमान को मारिफ़त (बोध) कहा गया है। यानी सच को पहचान लेना। जिस चीज़ की पहचान हो, उसी के लिहाज़ से आदमी के अन्दर भाव पैदा होते हैं। ख़ुदा चूंकि सबसे बड़ी ताक़त है इसलिए ख़ुदा की पहचान से आदमी के अन्दर विनम्रता और छोटेपन का भाव पैदा होता है। इसलिए नज़रान के लोगों में जब ख़ुदा की मारिफ़त पैदा हुई, जब उन पर ख़ुदा की अज़मत और बढ़ाई खुल गई तो उनका सीना फट गया। उनकी आँखों से आंसू बहने लगे और वे बेइख़्तियार होकर सज्दे में गिर पड़े। इसी तरह सहीह मुस्लिम में एक रिवायत है, जो हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान के वास्ते से नक़्ल हुई है। वह कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जो शख़्स इस हाल में मरा कि वह जानता था कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं वह जन्नत में दाख़िल होगा। (सहीह मुस्लिम, 26)
इस हदीस में ईमान को इल्म कहा गया है। यानी जानना, आगाह होना। इससे मालूम होता है कि ईमान जानने का एक वाक़िआ है। वह एक चेतनामय खोज है। हक़ीक़त यह है कि ईमान उसी क़िस्म का एक गहरा तजुर्बा है, जिसको मौजूदा ज़माने में डिस्कवरी कहते हैं। ईमान एक डिस्कवरी है। ईमान एक ऐसी हस्ती की मौजूदगी को पा लेना है, जो ज़ाहिरी तौर हमारे सामने मौजूद नहीं। ईमान उस गहरे 'बोध' का नाम है, जबकि आदमी के लिए परोक्ष का पर्दा फट जाता है और वह ख़ुदा को न देखते हुए भी उसे देखने लगता है। ईमान बन्दे और ख़ुदा के बीच उस ताल्लुक़ का क़ायम होना है, जिसकी एक भौतिक मिसाल बल्ब और पावर हाऊस के ताल्लुक़ में दिखाई देती है। बल्ब का ताल्लुक़ जब पावर हाउस से क़ायम होता है तो वह अचानक चमक उठता है। वह एक नया इंसान बन जाता है। उसका अंधेरा उजाले में तब्ब्दील हो जाता है। उसी तरह
निकल: ऐ अल्लाह के रसूल, हम जाहिलियत और बुराई में पड़ थे, यहां तक कि अल्लाह ताआला इस ख़ैर (भलाई) को ले आया। इस तरह जो ईमान मिलता है, वह उससे बिल्कुल अलग होता है जो परम्परा या अनुकरण से आदमी को मिल जाए। परम्परा या अनुकरण वाला ईमान आदमी को अन्दर से नहीं हिलाता, उसे बदलता नहीं है, जबकि 'मारिफ़त' वाला ईमान आदमी को हमेशा हमेशा के लिए हिला देता है, उसे बदल देता है। अनुकरण वाले ईमान से आदमी के अन्दर कोई अपनी निगाह पैदा नहीं होती, जबकि 'मारिफ़त' वाला ईमान आदमी के अन्दर अपनी निगाह पैदा कर देता है, जिससे वह चीज़ों को देखे और अपने आंतरिक बोध और अपनी निगाह से फ़ैसला कर सके। अनुकरण वाले ईमान से सिर्फ़ जड़ और बेजान अक़ीदा पैदा होता है। जबकि 'मारिफ़त' वाला ईमान आदमी के अन्दर इन्किलाब बन कर दाख़िल होता है। वह आदमी की सोच और अमल की दुनिया में एक तूफ़ान, एक खलबली पैदा कर देता है। अनुकरण वाले ईमान से बेजान लोग पैदा होते हैं, जबकि 'मारिफ़त' वाले ईमान से जानदार लोग जन्म लेते हैं। और जानदार लोग ही वे लोग हैं जो इतिहास बनाते हैं, जो इन्सानियत के लिए कोई नया भविष्य बनाते हैं। अनुकरण वाला ईमान आदमी को अपनी क़ौम से मिलता है और 'मारिफ़त' वाला ईमान सीधे अल्लाह ताआला से। आख़िर वक़्त तक अल्लाह पर यक़ीन रमूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हिजरत के लिए मक्का से निकले तो पहले तीन दिन तक ग़ारे-सौर में ठहरे। कुरैश के लोग आपको तलाश करते हुए इस ग़ार (गुफा) तक पहुंच गए। अबू बक्र रज़िअल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा: ऐ ख़ुदा के रसूल, दुश्मन इतने क़रीब आ चुका है कि
द जा ख़ुदा के दिनों की उम्मीद नहीं रखते ताकि अल्लाह क़ामा को उसका बदला द जा वे कर रहे थे। (45:14)
यानी जो लोग अल्लाह की पकड़ से नहीं डरते जब वे ख़ुदा से बेख़ौफ़ होकर इस्लाम वालों के ख़िलाफ़ ज़ुल्म की कार्रवाई करें तो इस्लाम वालों को ऐसा नहीं करना चाहिए कि वे उनके ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई करने या उनसे इन्तिक्राम लेने के लिए खड़े हो जाएं। इस काम को उन्हें ख़ुदा के ऊपर छोड़ देना चाहिए। ख़ुदा से बेख़ौफ़ होकर जो लोग ज़ुल्म करें, उनको सिर्फ़ ख़ुदा ही ज़रूरी सज़ा दे सकता है। ऐसे मामलों में मुसलमानों के ऊपर सब्र है और अल्लाह के ऊपर जुर्म के मुताबिक़ मुजरिम की सज़ा। इस का मतलब निष्क्रियता और प्रभाव कुबूल करना नहीं है और न इसका मतलब यह है कि ज़ालिम के मुक़ाबले में समर्पण का तरीक़ा इख़्तियार किया जाए। यह अमल के रुख को निश्चित करना है। यानी ऐसे मौक़े पर ईमान वालों को रिएक्शन का तरीक़ा इख़्तियार करने के बजाए पोजिटिव रूख पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए। इन्सान का काम अपनी ज़िम्मेदारी को अदा करना है। ख़ुदा का काम यह है कि वह लोगों के अमल के मुताबिक़ उन्हें उसका बदला दे। एक शख़्स ख़ुदा के दीन की दावत लेकर उठे, और कुछ लोग उसके साथ बुरा सुलूक करें, तो उस वक़्त दायी यानी दीन की तरफ़ बुलाने वाला दो चीज़ों के दरम्यान खड़ा हो जाता है। एक यह कि वह लोगों के हमले को बर्दाश्त करते हुए अपनी दावती ज़िम्मेदारी को बदस्तूर जारी रखे, दूसरे यह कि वह दावती अमल को भूल कर लोगों को सज़ा देने या उनसे इन्तिक्राम लेने के लिए दौड़ पड़े। पहला तरीक़ा ख़ुदा के हुक्म के मुताबिक़ है और दूसरा तरीक़ा ख़ुदा के हुक्म के के ख़िलाफ़ा पहला तरीक़ा इख़्तियार करने की सूरत में यह होता है कि दूसरे काम के लिए ख़ुदा उनकी तरफ़ से काफ़ी हो जाता है। लेकिन अगर मुसलमान दूसरे क़िस्म का तरीक़ा इख़्तियार करें तो वे दोहरे मुजरिम बन जाते हैं। उन्होंने ख़ुदा के काम को अपने हाथ में लिया और दूसरे यह कि उनके अपने लिए करने का जो अस्ल काम था उसको उन्होंने
फ़रिश्त से लेकर इन्सानी तक पहुँचाना। दूसरा ताज़ा 'ताज़क़िया' है। ताज़क़िया से मतलब वही चीज़ है जिसको मौजूदा ज़माने में 'एजुकेट' करना या जागरूक बनाना कहा जाता है। यानी लोगों की सोच को रब्बानी सोच बनाना। उनका रूहानी सुधार करके उन्हें इस क़ाबिल बनाना कि वे उस तरह सोचें जिस तरह ख़ुदा चाहता है कि सोचा जाए। और इस तरह फ़ैसला करें जिस तरह ख़ुदा चाहता है कि फ़ैसला किया जाए। मौजूदा ज़माने में जो मुस्लिम सुधारक उठे, उनमें आम तौर पर यह बुनियादी ख़ामी पाई जाती है कि उन्होंने 'ताज़क़िया' से अपने काम का आग़ाज़ नहीं किया। लगभग सभी का यह हाल हुआ कि मुसलमानों के कुछ हालात उसके सामने आए और उनको देखकर वे पुरजोश तौर पर उठ खड़े हुए। ज़ेहन बनाए बग़ैर उन्होंने अमली काम शुरू कर दिया – किसी ने अंग्रेज़ी साम्राज्य से बिगड़ कर आज़ादी के जिहाद का नारा लगाया; कोई पश्चिमी सभ्यता का ज़ोर देख कर मैदान में कूदा; किसी को 'श्रद्धानन्द' के कत्ल के बाद पैदा होने वाले हालात ने मुजाहिदे-इस्लाम बना दिया; कोई शुद्धि-संगठन के आन्दोलन से बेचैन होकर सरगरम हो गया; किसी को मुस्लिम ख़िलाफ़त के पतन ने जान देने पर आमादा कर यह सब काम करने का ग़ैर-पैग़म्बराना तरीक़ा है। काम का पैग़म्बराना तरीक़ा यह है कि उसको 'ताज़क़िया' से शुरू किया जाए, न कि आख़िरी क़दम उठा लिया जाए। ताज़क़िया का एक मतलब यह है कि लोगों को दीन का सही इल्म हासिल हो जाए। वे सही दीनी अन्दाज़ में सोचना जान लें। उनके अन्दर यह सलाहियत पैदा हो जाए कि वे ग़ैर-इस्लामी नज़रिए के मुक़ाबले में इस्लामी नज़रिए को पहचान सकें। वह मुख़्तलिफ़ क़िस्म के हालात में यह फ़ैसला कर सकें कि किस वक़्त उन्हें क्या करना है और किस वक़्त उन्हें क्या नहीं करना।
मुख़ातिब (सम्बोधित) मद्यत के लोग थे। कहा जाता है कि मद्यन वाले पुरान ज़माने में अहमर सागर के अरब वाले किनारे पर आबाद थे। पैग़म्बर का इन्कार करने के बाद वे एक भयानक भूकंप में तबाह कर दिए गए। क़ुरआन में बताया गया है कि हज़रत शुऐब ने जब अपनी क़ौम को ख़ुदा के दीन की दावत दी तो उन्होंने कहा कि ऐ शुऐब जो कुछ तुम कह रहे हो उसका बहुत-सा हिस्सा हमारी समझ में नहीं आता (11:91)। हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम को हदीस में ख़तीबुल- अम्बिया यानी पैग़म्बरों में बेहतरीन बोलने वाला कहा गया है (तफ़सीर अल-तबरी 1/327)। आप साफ़ और असरदार अन्दाज़ में बात कहने की ख़ास सलाहियत रखते थे। फिर यह कि आपकी क़ौम के लोग हज़रत इब्राहीम को मानते थे। उनकी वंश-परम्परा का सिलसिला चौथी पीढ़ी में हज़रत इब्राहीम से मिल जाता था। इसके बावजूद क्यों ऐसा हुआ कि हज़रत शुऐब ने जब तौहीद (एकेश्वरवाद) के दीन की बात उनके सामने पेश की तो उन्होंने कह दिया कि तुम्हारी बात हमारी समझ में नहीं आती। इसकी वजह यह थी कि कई नस्ल गुज़रने के बाद वे हज़रत इब्राहीम की असली तालीम से दूर हो चुके थे। उनकी सोच वह न रही थी जो ख़ुदा के पैग़म्बरों की सोच होती है। इस तरह हज़रत शुऐब और मद्यन वालों के बीच एक क़िस्म का ज़ेहनी फ़ासला (intellectual gap) पैदा हो चुका था। यही चीज़ थी जो उनके लिए पैग़म्बर की बात को समझने में रुकावट बन गई। जो लोग अल्लाह के अलावा की बड़ाई में जी रहे हों वे अल्लाह की बड़ाई वाली बातों में अपनी ज़ेहनी ख़ुराक नहीं पाते। जो लोग दुनिया के फ़ायदों में खोए हुए हों उन्हें आख़िरत के फ़ायदे की बात बिल्कुल अजनबी मालूम होती है। जो लोग सिर्फ़ अपनी अक़्ल से सोचना जानते हों वे वह्य की रहनुमाई को समझ नहीं सकते। जो लोग क़रीब की
बाता का जान और समझ नही सकत जिनका जानना और समझना ख़ुदाइ अक़्ल के बग़ैर मुमकिन नहीं। ईमान की हक़ीक़त यह है कि आदमी ग़ैबी हक़ीक़तों को देखने लगे हज़रत मालिक बिन अनस कहते हैं कि हज़रत मुआज़ बिन जबल रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए। आपने पूछा कि ऐ मुआज़, तुमने कैसे सुबह की? उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह पर ईमान के साथ सुबह की। आपने फ़रमाया कि हर बात का एक मिस्दाक़ होता है और हर बात की एक हक़ीक़त होती है। फिर जो कुछ तुम कहते हो उसका मिस्दाक़ (चरितार्थ) क्या है। उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने कभी कोई ऐसी सुबह नहीं की, जिसमें मुझे यह ख़याल न लगा हुआ हो कि अब मैं शाम न कर सकूंगा। और मैंने कोई क़दम ऐसा नहीं उठाया जिसमें मुझे यह ख़याल न हो कि मैं दूसरा क़दम न उठा सकूंगा। और गोया कि मैं घुटनों के बल गिरी हुई उन तमाम उम्मतों को देख रहा हूं, जिनको अपने आमालनामे (कर्मपत्र) की तरफ़ बुलाया जा रहा है और उनके साथ उनका पैग़म्बर है। और उनके साथ वे बुत भी हैं जिनको वे ख़ुदा के सिवा पूजती थीं। और जैसे मैं दोज़ख़ वालों की सज़ा को और जन्नत वालों के सवाब को देख रहा हूं। यह सुन कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: तुम मग़फ़िरत को पहुंच गए। अब इसी पर जमे रहो। (हिलयत-उल-औलिया, 1/242)