अल्लाह की याद सबसे बड़ी इबादत
Al-Risala, January 2023, pp. 62–67
By Maulana Wahiduddin Khan
यह ख़ुदाई ज़ह्न से निकला हुआ कलाम है। क़ुरआन में हिदायत का सामान है। वह इन्सान की उस तलाश का जवाब है कि वह ज़िन्दगी का अर्थ समझ सके। उसकी प्रकृति जिस रहनुमाई को मांग रही है, क़ुरआन में वह उसको साफ़ और मुकम्मल तौर पर पा लेता है। क़ुरआन उसके तमाम अन्दरूनी सवालों का जवाब देता है। मगर यह हिदायत किसी को अपने आप नहीं मिल जाती। इसको वही शख़्स पाता है जिसके अन्दर सच्ची तलब हो, जो यह आग्रह न करे कि वह आंख से देख कर ही किसी बात को मानेगा। बल्कि वह अपने अन्दर के बोध से समझ में आने वाली बातों पर यक़ीन करने के लिए तैयार हो, जो सबसे बड़ी सच्चाई (ख़ुदा) के आगे झुक कर उस बात का सबूत दे कि वह झूठी ख़ुदापरस्ती से पाक है, जो अपनी कमाई में दूसरे का हिस्सा लगा कर यह ज़ाहिर करे कि उसकी अपनी ज़ात से बाहर पाए जाने वाले तक़ाज़ों को मानने के लिए उसका सीना खुला हुआ है, जो इन्सानी सीमाओं को मानते हुए बाहरी हिदायत की ज़रूरत को स्वीकार करता हो, जो इस सवाल को अहमियत दे कि मौजूदा दुनिया का अधूरा व नामुकम्मल होना एक ज़्यादा मुकम्मल दुनिया के होने का तक़ाज़ा करता है। यह सच्ची तलब के लक्षण हैं। क़ुरआन में कहा गया है कि ऐसे ही लोगों के हिस्से में हिदायत आती है और वे ही इस कायनात में कामयाबी की मंज़िल तक पहुंच सकते हैं (2:1-5)। इस्लामी ज़िन्दगी की शुरुआत ईमान से होती है। एक शख़्स को जब इस बात की पहचान हो जाए कि इस कायनात को बनाने वाला, इसका मालिक, इसे पालने वाला यानी इसका रब अल्लाह है; वह उसको इस तरह अपनी चेतना का हिस्सा बना ले कि अल्लाह ही उसका सब कुछ बन जाए; वह उसी पर भरोसा करे; उसी से उम्मीद रखे; उसी से ख़ौफ़ खाएं; अपनी ज़िन्दगी को पूरी तरह उसी के रुख़ पर डाल देने का फ़ैसला करे तो इसी का नाम ईमान है। ईमान के बाद चार इबादतों को इस्लाम में 'अरकान' (स्तंभ) का दर्जा हासिल है
आता रहता है। अगर आदमी अपन सिवा दूसरा को सहन का मिज़ाज न रखता हो; अगर वह दूसरों को बर्दाश्त करते हुए दूसरों के साथ मिलकर चलने के लिए तैयार न हो तो मौजूदा दुनिया में वह सच्चाई के सफ़र को कामयाबी के साथ तय नहीं कर सकता। यह ईमान और यह इबादत अगर सच्चे तौर पर आदमी के अन्दर पैदा हो जाए तो उसके अन्दर वह ख़ुदापरस्ताना ज़िन्दगी उभरती है, जो कायनात का मालिक अपने बन्दों से चाहता है। दुनिया में उसकी हस्ती का होना हक़, सच्चाई और इंसाफ़ का होना बन जाता है। उसकी सोच, उसका अख़लाक़, ,उसका बरताव, उसके मामलेात, सब अल्लाह के रंग में रंग जाते हैं। यही दीने इस्लाम है और यही वह चीज़ है, जिसको सिखाने के लिए कुरआन उतारा गया। कुरआन को क़लम के ज़रिए किताब की सूरत में लिखवाकर इन्सान के हवाले किया गया है। यह इस बात की पूरी व्यवस्था थी कि वह किसी भी तब्दीली के बग़ैर अगली नस्लों तक पहुंच सके। कुरआन आज मुकम्मल तौर पर ‘महफ़ूज़’ व पूरी तरह सुरक्षित हालत में मौजूद है। इसके मानने वाले भी बेशुमार तादाद में दुनिया भर में पाए जाते हैं। मगर कुरआन वाली ज़िन्दगी अमली तौर पर कहीं नज़र नहीं आती। कुरआनी संभावनाएं उसी तरह बन्द हालत में पड़ी हुई हैं, जिस तरह चन्द सौ साल पहले भाप और बिजली की ताक़तें बन्द पड़ी हुई थीं। ऐसा क्यों है? इस सवाल के जवाब को उस वक़्त तक समझा नहीं जा सकता, जब तक ख़ुदा की सुन्नते - इम्तिहान को सामने न रखा जाए । मौजूदा दुनिया इम्तिहान की जगह है। यहां कुरआन को मानने वाले और कुरआन को न मानने वाले दोनों अपना-अपना इम्तिहान दे रहे हैं। दोनों क़िस्म के लोगों को एक जैसी आज़ादी हासिल है। कोई शख़्स कुरआन का इन्कार करके गुमराह होना चाहे तो उसको भी पूरी आज़ादी है। और कोई कुरआन को मान कर अमली तौर पर कुरआन के ख़िलाफ़ चलना चाहे तो उसके लिए भी रास्ता खुला हुआ है। कुरआन को न मानना किसी के
भी ख़ुदा की अदालत में जाँच की ठीक उसी सतह पर खड़ा हुई है, जहाँ दूसरा ग़ैर-मुस्लिम क़ौमें खड़ी हुई हैं:
जो लोग मुसलमान हुए और जो लोग यहूदी हुए और नसारा (ईसाई) और साबी, इनमें से जो शख़्स ईमान लाया अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर और उसने नेक काम किया तो उसके लिए उसके रब के पास अज्र (प्रतिफल) है। और उनके लिए न कोई डर है और न वे ग़मगीन होंगे। (2:62)
जब तक अल्लाह की यह सुन्नत (तरीक़ा) बाक़ी है, यह संभावना भी बाक़ी रहेगी कि कोई अगर क़ुरआन और इस्लाम का नाम ले और अमली तौर पर इस तरह रहे जैसे क़ुरआन और इस्लाम से उसका कोई ताल्लुक़ नहीं, यहां तक कि हदीस से मालूम होता है कि यह आज़ादी यहां तक है कि एक शख़्स क़ुरआन के आलिम और मुफ़स्सिर की हैसियत से नुमायां हो, दुनिया की ज़िन्दगी में वह ख़ुदा के दीन का चैम्पियन बने, मगर हक़ीक़त में उसकी कोई दीनी क़ीमत न हो, वह आख़िरत में उन लोगों के साथ धकेल दिया जाए जिन्होंने क़ुरआन को सिरे से माना ही न था, जिनका दीन-इस्लाम से कोई ताल्लुक़ न था। क़ुरआन नसीहत के लिए है, न कि केवल तिलावत के लिए इमाम अहमद ने हज़रत आयशा की रिवायत नक़्ल की है कि उनको बताया गया कि कुछ लोग रात को क़ुरआन पढ़ते हैं और रात भर में सारा क़ुरआन एक बार या दो बार में पढ़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि उन लोगों ने पढ़ा और उन्होंने नहीं पढ़ा। मैं रसूलुल्लाहु सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सारी रात खड़ी रहती। आप सूरह बक़रह, सूरह आल इमरान और सूरह अल-निसा पढ़ते। जब भी आप किसी ऐसी आयत से गुज़रते जिसमें अल्लाह से डराया गया है तो आप ज़रूर अल्लाह
बयान कर दिया जाए, तब भी वह उसका क़बूल नहीं करेगा। मसलन हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि उन्होंने अपनी क़ौम के सामने सच्चाई को पूरी तरह खोल कर रख दिया, इसके बावजूद वे लोग मानने के लिए तैयार नहीं हुए। आख़िर में वे अपनी क़ौम से निकल गए और कहा कि ऐ मेरी क़ौम, मैंने तुमको अपने रब का पैग़ाम पहुंचा दिया और मैंने तुम्हारा भला चाहा। पर तुम भला चाहने वालों को पसन्द नहीं करते (7:79)। दूसरी जगह अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि मैं अपनी निशानियों से उन लोगों को फेर दूंगा जो ज़मीन में नाहक़ घमंड करते हैं। और वे हर क़िस्म की निशानियां देख लें तब भी वे उन पर ईमान न लाएं (उनका हाल यह है कि) अगर वे हिदायत का रास्ता देख लें तो उसको वे नहीं अपनाएंगे। और अगर वे गुमराह-- का रास्ता देखें तो उसको वे अपना लेंगे। इसकी वजह यह है कि उन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया और उनको अनदेखा इन दोनों आयतों में ऐसे गिरोहों का ज़िक्र है जिनको ख़ुदा के पैग़म्बर के ज़रिए बेहतरीन शक्ल में दावत पहुंची। उसके बावजूद उन्होंने हक़ की दावत को क़बूल नहीं किया। इस की वजह क्या थी। इसकी वजह उनकी बिगड़ी हुई मानसिकता थी। मानसिकता का यह बिगाड़ अक्सर हालात में घमंड की बुनियाद पर होता है। इसलिए उपरोक्त दोनों आयतों में घमंड सबब बताया गया है (7: 75, 146)। नसीहत हर इन्सान के लिए नापसन्दीदा चीज़ है। और ख़ास तौर पर घमंडी इन्सान तो नसीहत को बिल्कुल नापसन्द करता है। जो लोग घमंड की मानसिकता रखते हैं वे कभी अपने ख़िलाफ़ किसी नसीहत को सुनने पर राज़ी नहीं होते। ऐसी कोई सच्चाई उनके लिए आख़िरी हद तक अस्वीकार्य होती है, जिसमें उन्हें अपनी शख़्सियत का निषेध दिखाई दे रहा हो। जो लोग अपने आपको ऊंचे मुक़ाम पर बैठा हुआ मान लें वे किसी ऐसी दावत
जिसमे खुद अपना ही जाच पड़ताल करन पर सबस ज़्यादा ज़ार दिया गया हो। जा लाग आरज़ुओं और खुशुख्यालियों की दुनिया में जी रहे हों वे किसी ऐसे पैग़ाम को अपने लिए अजनबी महसूस करते हैं जिसमें यथार्थ और मौजूदा सच्चाई से तालमेल करके ज़िन्दगी के निर्माण का सबक़ दिया गया हो। जिन लोगों की निगाह अपनी ज़िम्मेदारियों के बजाय अपने अधिकारों पर हो, वे ऐसी किसी दावत को ग़ैरज़रूरी समझ कर रद्द कर देते हैं जिसमें उन्हें उनकी ज़िम्मेदारियां याद दिलाई जाएं। जो लोग अपने बारे में यह समझ लें कि वे माफ़ किये हुए लोग हैं वे ऐसे पैग़ाम की सार्थकता को समझ नहीं पाते, जिसमें अपनी मौजूदा हालत के तहत उन्हें अपनी माफ़ी संदिग्ध दिखाई पड़ती हो। जिन लोगों ने ख़्यालों की रंगीन दुनिया में अपने क़िले बना रखे हों वे किसी ऐसे पैग़ाम को अहमियत देने में नाकाम रहते हैं, जिसको मानने की हालत में उन्हें दिखाई दे कि वे किसी सुरक्षित क़िले में नहीं बल्कि रेगिस्तान में खड़े हुए हैं। जिन लोगों ने यह आस्था बना रखी हो कि किसी अमल के बिना उनके लिए पहले से ही जन्नत के महल रिज़र्व हो चुके हैं वे किसी ऐसी तहरीक में हिस्सा लेना ग़ैरज़रूरी समझते हैं जिसमें अमल की बुनियाद पर जन्नत में दाखिले का राज़ बताया गया हो। सच को क़बूल करने में सबसे बड़ी रुकावट बिगड़ा हुआ मिज़ाज है। जो लोग बिगड़े हुए मिज़ाज वाले हों, उनको सिर्फ़ अपने मिज़ाज के मुताबिक़ बात ही अपील करती है। दूसरी कोई बात, चाहे वह कितनी ही दलीलों के साथ बयान कर दी जाए वह किसी तरह उन्हें अपील नहीं करती। अपने ख़ास मिज़ाज के ख़िलाफ़ किसी बात को मानना उनके लिए उतना ही कठिन हो जाता है, जितना कि बकरी के लिए गोश्त खाना और शेर के लिए घास चरना। वह नेकी नेकी नहीं जिससे फ़ख़्र और बड़ाई का जज़्बा पैदा हो
صبح ہمیشہ اپنے وقت پر آتی ہے، مگر اس کو صرف جاگنے والے پاتے ہیں، نہ کہ سونے والے۔