अजीब करिश्मा
Al-Risala, March 2024, pp. 3–9
By Maulana Wahiduddin Khan
इन्सान का जिस्म कुछ माद्दी और भौतिक चीज़ों मिल कर बना है। पानी, कार्बन, ऑक्सीजन और कुछ दूसरे रासायनिक तत्व। ज़ाहिरी तौर पर इन्सान बस इसी क़िस्म को कुछ चीज़ों का मजमूआ है। राबर्ट पैटिसन (R. Pattison) ने इन्सानी जिस्म के इन भौतिक तत्वों का हिसाब लगाया तो उसने पाया कि बाज़ार के रेट
इन्सान के बेहद क़ीमती हान का अन्दाज़ा उस वक़्त होता है जबकि उसका कोई अंग उससे छीन लिया जाए। इन्सान का एक हाथ कट कर उससे अलग हो जाए अरबों डालर अदा करके भी दोबारा वैसा हाथ उसको नहीं मिल सकता। इन्सान की आंख अगर बेनूर हो जाए तो सारी दुनिया की दौलत भी उसको वह आंख नहीं दे सकती, जिससे वह दोबारा देखने लगे। इन्सान की ज़ुबान अगर जाती रहे तो कोई भी क़ीमत अदा करके वह बाज़ार से ऐसी चीज़ नहीं पा सकता, जिससे वह बोले और अपने ख़यालात का इज़हार कर सके। कैसी अजीब है ख़ुदा की कारीगरी कि वह बेक़ीमत चीज़ों से बेइन्तिहा क़ीमती चीज़ बनाता है। वह मुर्दा चीज़ को ज़िन्दा चीज़ में तब्दील करता है। वह बेशऊर, बेजान माद्दे से बाशऊर और जानदार मख़्लूक़ वजूद में लाता है। वह 'नहीं' से 'है' की रचना करता है। किसी जादूगर की छड़ी से एक पत्थर कोई आवाज़ निकाले तो उसको देख कर सारे लोग हैरान रह जाएंगे। लेकिन ख़ुदा बेशुमार इन्सानों को माद्दे से बना कर खड़ा कर रहा है। मगर उसको देख कर किसी को हैरानी नहीं होती। कैसे अंधे हैं वे लोग, जिनको जादूगर के करिश्मे दिखाई देते हैं, मगर ख़ुदा के करिश्मे दिखाई नहीं देते। कैसे बेअक़्ल हैं वे लोग जो झूठे करिश्मे दिखाने वालों के सामने सम्पूर्ण श्रद्धा बन जाते हैं। मगर जो हस्ती सच्चे करिश्मे दिखा रही है, उसके लिए उनके अन्दर श्रद्धा व प्रेम का जज़्बा नहीं उमडता।
जो आधुनिक सैनिक विमान मिराज 2000 खरीदा था उसको भारतीय हवाई सेना में शामिल करने की रस्म यहां अदा की जाने वाली थी। भारत के बारहवें एयर चीफ मार्शल एल.एम. कत्री (1927-1985) आज बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। उन्होंने इस समारोह में पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। लेकिन एयर चीफ मार्शल इस शानदार समारोह से दिल्ली वापस लौटे थे कि उन पर दिल का दौरा पड़ा। उन्हें तेज़ी से फौजी अस्पताल ले जाया गया जहां चन्द घंटे बाद पहली जुलाई 1985 को उनका देहांत हो गया। ख़बरों में बताया गया कि एयर चीफ़ मार्शल एल. एम. कत्री योग्यतम पायलट थे। उन्होंने कई लड़ाइयों में दुश्मन के ख़िलाफ़ हवाई लड़ाई का शानदार रिकार्ड कायम किया था। लेकिन दुश्मन के युद्ध विमानों को मार गिराने वाला शख़्स मौत के खामोश हमले का मुकाबला न कर सका। वह आदमी जिसने आसमान में उड़ कर युद्ध में विजय हासिल की थी वह ज़मीन पर मौत के ख़िलाफ़ जंग में इस तरह पराजित हो गया जैसे उसके मुकाबले के लिए उसके पास कोई ताक़त ही नहीं। ताकत और बेताक़ती का यह मुक़ाबला हर रोज किसी न किसी रूप में ज़मीन पर दिखाई देता है। रोज़ कोई ‘एयर चीफ़ मार्शल’ मौत के ख़ामोश हमले के मुकाबले में एकतरफा शिकस्त खा जाता है। और इस तरह अपने तजुर्बे के रूप दूसरों के लिए एक ऐलान करता एक हक़ीक़त का ऐलान कि इन्सान एक ऐसी दुनिया में है जहां हर जीत आख़िरकार एक मुकम्मल हार पर ख़त्म होती है। ज़िन्दगी इख़्तियार से
सान की नाल रखते हैं। यह नाल उनको राष्ट्रपति बनने से लगभग पांच साल पहले उनके एक दोस्त ने दी थी। श्री रीगन को विश्वास है कि इस सुनहरी नाल में चमत्कारिक असर है। वह उनको हर आफ़त से बचाती है 1981 में जब उनके ऊपर क़ातिलाना हमला किया गया तो उनके ख़्याल के मुताबिक़ इस नाल ने उनको बचा यह नाल हर वक़्त श्री रीगन के पास रहती है। जून 1981 की एक मुलाक़ात में श्री सैलर ने उनसे पूछा, “क्या आप अब भी इस नाल को अपनी जेब में रखतें हैं?” राष्ट्रपति रीगन ने कहा, “हां, ज़रूर।”
इसके बाद उन्होंने अपनी बाईं जेब में हाथ डाला और वह नाल निकाल कर दिखाई। (टाइम्स ऑफ़ इंडिया 24 जून 1981)
बेशक यह एक अंधविश्वास (superstition) है। पर इस अंधविश्वास का एक ज्ञात कारण है। वह यह कि मौजूदा दुनिया में इन्सान के साथ जो कुछ घटता है वह सब इतना रहस्यपूर्ण होता है कि आदमी पूरी तरह उसकी व्याख्या नहीं कर पाता, उसे समझ नहीं पाता। ऐसा मालूम होता है कि कुछ छुपे हुए कारक (factors) हैं जो किसी आदमी को कामयाब और किसी को नाकाम कर देते। कोई शख़्स एक नतीजे से दो-चार होता है और कोई शख़्स दूसरे नतीजे से। और दोनों में से कोई भी सही अर्थों में नहीं बता सकता कि उसके साथ जो हुआ वह क्यों
इन्सान मजबूर है कि वह किसी को अपना मा 'बूद (उपास्य, आराध्य) बनाए- ख़ुदा को या ख़ुदा को छोड़कर किसी और को। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (1944-1991) लोकसभा के दसवें चुनाव (मई 1991) के अभियान पर थे। वह देश भर का तूफ़ानी दौरा करते हुए 21 मई 1991 को अपने विशेष विमान के ज़रिए तमिलनाडु पहुंचे। वह हवाई अड्डे मीनमपक्कम पर उतरे। यहां वह अपनी बुलेट प्रुफ़ गाड़ी में बैठे। और तीस से ज़्यादा कारों के काफिले के साथ श्रीपेरुम्बुदुर के लिए रवाना हुए, जहां उन्हें एक चुनाव- सभा को सम्बोधित करना था। रात को दस बजे वह पंडाल के अन्दर जनता की तरफ़ से गुलदस्ते स्वीकार कर रहे थे। उसी दौरान एक 25 वर्षीया महिला अपने दोनों हाथों में फूलों का एक गुलदस्ता लिए हुए राजीव गांधी की तरफ़ बढ़ी। राजीव गांधी भी विजयभाव से उसकी तरफ़ बढ़े, क्योंकि हर जगह जनता से मिले स्वागत ने उन्हें यकीन दिलाया था कि इस चुनाव के बाद वे देश के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। महिला ने पास आकर अपना गुलदस्ता राजीव गांधी की तरफ़ बढ़ाया। पर उस महिला का सम्बंध आत्मघाती दस्ते से था और वह अपने जिस्म पर ख़तरनाक बम बांधे हुए थी। राजीव गांधी ने गुलदस्ता अपने हाथ में लिया ही था कि बम फट गया।
का तरफ़ बढ़ रहा है। हर आदमी का हाथ खुशियों के गुलदस्ते पर है। पर सच्चाई उसकी उम्मीदों के विपरीत है। जिस चीज़ को आदमी गुलदस्ता समझ कर वसूलकर रहा है वह उसके लिए विनाश का बम है। इसके अपवाद सिर्फ़ वे लोग हैं, जिनको मौत से पहले अपने रब का बोध हासिल हो गया, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी को सृष्टि के पालनहार के आज्ञापालन में गुज़ारा, जिनको मौत इस हाल में आई कि वे अपने इम्तिहान के पर्चे को कामयाबी के साथ हल कर चुके थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया (4 दिसम्बर 1989) ने एक सार्वभौमिक आकलन शुरू किया था। इसमें बताया गया कि आज दुनिया के कूटनीतिक किस अन्दाज़ में सोचते हैं। इसमें बिल्कुल दुरुस्त तौर पर आधुनिक ज़ेहन की नुमाइन्दगी करते हुए कहा गया कि विश्व शक्ति या समाजी तब्दीली के लिए जंग के हथियार का इस्तेमाल अब एक नामुमकिन चीज़ बन चुका है। मौजूदा ज़माने में ऐसे बहुत से सबब सामने आए हैं, जिन्होंने जंग के तरीके को एक नामुमकिन तरीक़ा बना दिया है। आज कोई क्रौम जंग करके वह फ़ायदा हासिल नहीं कर सकती, जो पुराने ज़माने में शासक वर्ग इससे हासिल किया
جسک رہنما آج بھا لڑ رہ ہو مسلم رہنما آج بھا جگا بھا جوشیلی تقریریں کرنے میں مشغول ہیں۔
آج بہت ضروری ہو گیا ہے کہ مسلمانوں کے اندر بیمانی لڑائی کا مزاج ختم کیا جائے، ان کی ذہنی تربیت کے ذریعے انہیں ایسا بنایا جائے کہ وہ آج کی دنیا کو سمجھیں اور تلوار کے بجائے نظریوں اور بیچاروں کی طاقت سے اپنی زندگی کی تعمیر کریں ۔
یہ صورت حال اللہ کی عظیم نعمت ہے، جو پوری طرح مسلمانوں کے حق میں ہے۔ اس طرح خدا اتہاس کو مقابلے کے اس میدان میں لایا ہے، جہاں اسلام صاف طور پر فیصلہ کن حیثیت رکھتا ہے۔ بھوتک طاقت میں کوئی دوسرا اسلام والوں سے آگے بڑھ سکتا ہے، مگر विचार اور نظریے کے معاملے میں اسلام کو ایکادھیکار (monopoly) کی حد تک اٹوٹ طاقت حاصل ہے۔ ہتھیار کے میدان میں جیت اور ہار دونوں کی سمھاونا ہے۔ مگر وچارک مقابلے میں اسلام کی فتح یقینی ہے۔ یہاں کوئی اس کے اوپر فتح پانے والا نہیں۔