ज़माने के ख़िलाफ़
Al-Risala, March 2024, pp. 11–17
By Maulana Wahiduddin Khan
खुद चालास साल से यहाँ काम कर रहा हो इसलिए उसका ज़ेहन बर्तन क़लई' में इतना गुम हो चुका है कि वह इससे बाहर निकल कर सोच नहीं सकता। लेकिन जो शख़्स 'बर्तन क़लई' से बाहर की हक़ीक़तों को जानता हो, जो व्यापक दायरे में सोच सके, वह आसानी से समझ सकता है कि बर्तन क़लई वाले को कालोनी में काम न मिलने की वजह क्या थी। इसकी सीधी-सी वजह यह थी कि क़लई का काम तांबे-पीतल के बर्तनों में होता है, जबकि कालोनी के तमाम घरों में स्टेनलेस स्टील के बर्तन इस्तेमाल हो रहे थे, फिर यहां बर्तन क़लई वाले को काम मिलता तो किस तरह मिलता? मौजूदा दुनिया में कामयाबी के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत है, उनमें से एक यह है कि आदमी वक़्त को पहचाने। वह ज़माने के तक़ाज़ों को समझे। जो शख़्स वक़्त और ज़माने को न जाने उसका हाल वही होगा जो ऊपर बताये गए आदमी का हुआ। वह स्टेनलेस स्टील इस्तेमाल करने वालों के बीच 'बर्तन क़लई' की आवाज़ लगाता रहेगा और वहां कोई भी शख़्स न मिलेगा जो उसका ख़रीदार बन सके। वह ज़माने के ख़िलाफ़ चलने वाली अपनी दुकानदारी में नाकाम होगा और फिर दूसरों को इल्ज़ाम देगा कि उन्होंने पक्षपात और जुल्म की वजह से मेरी दुकान चलने न दी। योग्यता के दौर में आरक्षण की मांग, सार्थकता की दुनिया में शब्दों के चमत्कार दिखाना, हक़ीक़त के बाज़ार में खुशख्याली की क़ीमत पर सौदा हासिल करने की कोशिश, यह सब इसी क़िस्म की ज़माने के ख़िलाफ़
मसलन यूनान में ब्रह्मचर्य (celibacy) पर अमल करने का अंजाम यह हुआ कि उनकी आबादी में गैर-मामूली कमी आ गई। इसी तरह मसीही चर्च में ब्रह्मचर्य को उच्च मानदंड माना गया, जिसका नतीजा इतना बदतर निकला कि उनमें विवाहेतर सम्बन्ध और नाजायज़ औलाद की समस्याएं पैदा हो गईं। यह प्रकृति से हटने की सज़ा है। जब भी इन्सान के किसी प्राकृतिक तक़ाज़े पर पाबंदी लगाई जाएगी, यह पाबंदी भयंकर बुराइयां पैदा करेगी। जो तक़ाज़ा रचनात्मक रूप से इन्सान की प्रकृति में शामिल हो उस पर रोक लगाना मुमकिन नहीं। ऐसे किसी तक़ाज़े पर रोक लगाना सिर्फ़ इस क़ीमत पर होता है कि और भी ऐसी भयंकर बुराइयां पैदा हो जाएं, जिन पर नियंत्रण करना संभव न हो। इसी क़िस्म की अप्राकृतिक पाबंदी की एक मिसाल लोगों को आलोचना (तनक़ीद) से रोकना है। आलोचना अन्य प्राकृतिक तक़ाज़ों की तरह एक स्वाभाविक तक़ाज़ा है। अगर इस पर रोक लगाई जाए तो इसका नतीजा सिर्फ़ यह होगा कि लोगों के दिलों में तो कुछ होगा, पर वे मुंह से कुछ और कहेंगे। इस तरह लोगों के अन्दर ‘मुनाफ़िक़त’ (पाखंड) की बुराई पैदा हो जाएगी और मुनाफ़िक़त तमाम बुराइयों में सबसे ज़्यादा बड़ी बुराई है। यह एक स्वाभाविक सच्चाई है कि लोगों की सोच में फ़र्क होता है, इसलिए लोगों की राय में मतभेद पैदा हो जाता है। इसी वैचारिक मतभेद का नाम आलोचना है। आलोचना वैचारिक मतभेद के कारण प्रकट होती है और वैचारिक मतभेद प्रकृति के अनिवार्य तक़ाज़े के कारण।
मुऩाफ़िक़त ही सही बात यह है कि आलोचना का बदार्शत करने का स्वभाव पदा किया जाए, न कि आलोचना पर रोक लगाई जाए। आलोचना को बर्दाश्त करने से स्वस्थ समाज बनता है और आलोचना को बंद करने से मुनाफ़िक़ (पांखड़ी) समाज। बेन्जामिन फ्रैंकलिन एक अमरीकी चिंतन था। वह 1706 में पैदा हुआ और 1790 में उसकी मृत्यु हुई। उसका एक वाक्य है- शादी से पहले अपनी आंखें खूब खुली रखो, पर शादी के बाद अपनी आधी आंख बन्द कर लोः Keep your eyes wide open before marriage, half shut afterwards. यानी शादी करने से पहले अपने जोड़े के बारे में पूरी जानकारी हासिल करो, लेकिन जब शादी हो जाए तो उस पर संतोष करो। इसी बात को किसी ने सादा तौर पर इन शब्दों में कहा कि शादी से पहले जांचो और शादी के बाद निभाओ। कोई मर्द या औरत 'परफेक्ट' नहीं। कोई भी संपूर्ण या परम आदर्श नहीं। इसलिए रिश्ते से पहले जांच तो ज़रूर करनी चाहिए, लेकिन रिश्ते के बाद यह करना चाहिए कि अपने जीवन साथी की खूबियों को देखा जाए और कमियों को नज़रअंदाज़ कर इस दुनिया में 'परफेक्ट' का मिलना संभव नहीं। फिर यह भी ज़रूरी नहीं कि जिस
और अगर दूसरे रिश्ते को ख़त्म करके तीसरा या चौथा किया जाए तो उसमें भा ऐसी हालत में तालमेल का तरीका अपनाना चाहिए। हर मर्द या औरत में खूबी भी होती है और कोताही भी, ज़रूरत है कि खूबी को देखा जाए और कोताही को बर्दाश्त किया जाए। अमली तौर पर यही एक मुमकिन तरीक़ा है। इसके सिवा और कोई तरीक़ा इस दुनिया में व्यवहार्य नहीं। इस्लाम की तसदीक़ अमरीकी औरतों में आजकल एक नया आन्दोलन उभर रहा है, जिसे ‘महिला आन्दोलन द्वितीय’ (Women's Movement II) का नाम दिया गया है। इस आन्दोलन का झंडा उठाने वालों के दावे के मुताबिक यह पुराने महिला आन्दोलन ही का विस्तार है। लेकिन ज़्यादा सही बात यह है कि यह दरअसल इस बात को मान लेना है कि पुराना महिला आन्दोलन एक बेतुका आन्दोलन था। इसलिए उस पर फिर से नज़र डालने की ज़रूरत पड़ी। एक समीक्षक ने ठीक ही इसे आन्दोलन में एक ख़ामोश तब्दीली (quiet shift) कहा है। अमरीकी पत्रिका स्पान (Span) के जुलाई 1989 अंक में इस आन्दोलन का परिचय छपा है। इसमें बताया गया है कि मौजूूदा अमरीका की औरतें बदहाली का शिकार हैं। काम करने वाली औरतों की दो तिहाई तादाद 13000 डालर सालाना से कम कमाती है, जो अमरीका में ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए नाकाफी है। गर्भ ठहरना, बच्चों की देखभाल और दूसरे मसलनों ने औरत को सख़्त परेशानी में
मालूम हुआ कि औरत की आज़ादी के साथ सुरक्षा (Protection) का ज़रूरत ह सिर्फ़ अपने निजी आधार पर वह खड़ी नहीं हो सकती। महिला आन्दोलन द्वितीय की एक नेता टार व्हेलम (Tarr-Whelam) ने कहा कि यह बात साफ़ है कि औरतों के हुकूक (अधिकार) हासिल करने के लिए अब राज्य ही हमारे लिए अमल का मुक़ाम हैं:
But it is clear that to win women's rights, the states are now the place for action (p. 37). पश्चिमी औरत ने पहले बराबरी का हक़ मांगा था। उसको बराबरी का हक़ मिल गया। अब उसे मालूम हुआ कि सिर्फ़ बराबरी का हक़ काफ़ी नहीं। उसको इसी के साथ एक्स्ट्रा सपोर्ट की ज़रूरत है। वह घरेलू सरपरस्त को अपना सरपरस्त बनाने पर राज़ी नहीं हुई। नतीजा यह है कि उसे हुकूमत को अपना सरपरस्त (संरक्षक) इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि ज़माना आज इस्लाम के अनुकूल दिशा में जा रहा है। इन्सान के अनुभव उसको इस तरफ़ ले जा रहे हैं कि वह यह मानने पर मजबूर हो जाए कि ख़ुदा का कानून ही सही कानून है। कोई बड़ा काम सिर्फ़ वह शख़्स करता है जो अपने आपको छोटा काम करने पर राज़ी कर ले
जसा रात उसके लिए ज़िन्दगी अधरा का एक अथाह समुद्र है, जहाँ कोई उजाला नहीं। उसके लिए दुनिया एक अनन्त अंधकारपूर्ण शून्य है, जिसमें रोशनी की कोई यही हाल अर्थ के लिहाज़ से उस इन्सान का है, जो 'दृष्टि' न रखता हो, जानने- समझने की संवेदना न रखता हो। ऐसे इन्सान के लिए सत्य और असत्य में कोई फ़र्क नहीं। उसके लिए सच भी वैसा ही होगा जैसा झूठ। उसके लिए जुल्म भी वैसा ही होगा जैसा इन्साफ़। 'दृष्टि वाले' और 'बिना दृष्टि वाले इन्सान के बीच इससे भी ज़्यादा बड़ा फ़र्क है जो तथ्यों की समझ के बारे में पैदा होता है। 'दृष्टि' वाले आदमी के अन्दर 'सूझबूझ' होती है, जो सच्चाई को सच्चाई के रूप में और झूठ को झूठ के रूप में दिखाती है। उसकी बातों में स्तरहीनता और विरोधावास नहीं होता। वह हमेशा लगती हुई बात कहता है। उसकी जुबान सच्चाई के मुताबिक़ खुलती है। वह वही बात कहता है जो कहना चाहिए और वह बात नहीं कहता, जो कहने वाली नहीं। इसके बरअक्स जो आदमी 'दृष्टिहीन' हो उसकी समझ अंधेरे में भटकने वाली समझ होती है। वह कभी कुछ कहता और कभी कुछ। उसकी बातों में सस्तापन और विरोधावास होता है। उसकी बातें अर्थहीन होती हैं, पर शब्दों से भरी होती हैं। आप नेत्रवान आदमी को देखें तो उसके चेहरे पर रौनक दिखाई देगी। इसके बरअक्स नेत्रहीन आदमी के चेहरे पर एक तरह की बेरौनकी छाई हुई होती है। यही हाल दृष्टिहीन (बे-बसीरत) कथन और दृष्टिवांन (बा-बसीरत) कथन का है। एक सुरुचिपूर्ण
رمضان کے بعد عید کا دن ایک عظیم انعام کی یاد دہانی ہے، یعنی ابدی جنت کا انعام۔