शहद का सबक़
Al-Risala, July 2024, pp. 8–12
By Maulana Wahiduddin Khan
शहद की मक्खियां फूलों का जो रस जमा करती हैं, वह सब का सब शहद नहीं होता। उसका सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा शहद बनता है। शहद की मक्खियों को एक पौंड शहद के लिए बीस लाख फूलों का रस हासिल करना पड़ता है। उसके लिए मक्खियां क़रीब तीस लाख उड़ानें करती हैं और इस दौरान वह कुल मिलाकर क़रीब पचास हज़ार मील तक का सफ़र तय करती हैं। रस जब ज़रूरी मात्रा में जमा हो जाता है तो इसके बाद शहद बनाने का काम शुरू शहद शुरू-शुरू में पानी की तरह पतला होता है। शहद तैयार करने वाली मक्खियां अपने परों को पंखे की तरह इस्तेमाल करके अतिरिक्त पानी को भाप की तरह उड़ा देती हैं। जब यह पानी उड़ जाता है तो इसके बाद एक मीठा द्रव
इस तरह का बशुमार व्यवस्थाए ह जो शहद का तयारा म का जाता हो। ख़ुदा ऐसा कर सकता था कि चमत्कारिक ढंग से अचानक शहद पैदा कर दे या पानी की तरह शहद का झरना ज़मीन पर बहा दे। पर उसने ऐसा नहीं किया। ख़ुदा हर क़िस्म की सामर्थ्य रखने के बावजूद शहद को एक व्यवस्था के तहत तैयार करता है, ताकि इन्सान को सीख मिले। वह जाने कि ख़ुदा ने दुनिया की व्यवस्था किस ढंग पर बनाई है और किन सिद्धांतों और नियमों को अपना कर ख़ुदा की इस दुनिया में कोई शख़्स कामयाब हो सकता है। शहद की मक्खी जिस तरह काम करती है, उसे योजनाबद्ध कार्य कहते हैं। यही उसूल इन्सान के लिए भी है। इन्सान भी सिर्फ़ उस वक़्त कोई सार्थक सफलता अर्जित कर सकता है, जबकि वह योजनाबद्ध कार्य के ज़रिए अपने मक़सद तक पहुंचने की कोशिश करे। संगठित और योजनाबद्ध कार्य ही इस दुनिया में कामयाबी हासिल करने का एकमात्र विश्वसनीय तरीक़ा है, शहद की मक्खी के लिए भी और इन्सान के लिए भी। चुप की ताक़त पुरानी कहावत है कि ‘एक चुप हज़ार बला टालती है।’ यह कहावत बहुत सार्थक है और लंबे इंसानी तजुर्बों पर आधारित है। हक़ीक़त यह है कि चुप रहना अपने आप में ख़ुद एक ताक़तवर हथियार है, बशर्ते कि इस हथियार को उसके तमाम तक़ाज़ों के साथ इस्तेमाल किया जाए।
सफर के दौरान ऐसा हुआ कि मुझे टॉयलेट जाने की जरूरत पेश आई। मैं अपनी सीट से उठकर टॉयलेट के पास गया। मैंने अपनी आदत के मुताबिक़ दरवाज़ा आहिस्ता से खोला, लेकिन दरवाज़ा ज़रा-सा खुलते ही अंदर से कपड़े का पल्लू दिखाई दिया। मैंने फ़ौरन दरवाज़ा बंद कर दिया और वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गया। वास्तविकता यह थी कि टॉयलेट के अंदर एक हिंदू महिला मौजूद थीं, लेकिन उन्होंने क़ायदे के मुताबिक़ दरवाज़े का बोल्ट नहीं लगाया था। महिला का पति मेरे पास की सीट पर बैठा हुआ था। इस दृश्य को देखते ही वह बिगड़ गया। वह गुस्सा और नफ़रत से भरकर मेरे ऊपर पिल पड़ा। वह जोश में उठकर खड़ा हो गया और मुझे बुरी तरह डांटना और बुरा-भला कहना शुरू कर दिया। मैंने कहा कि दरवाज़ा अंदर से बंद न था और मुझे मालूम न था कि अंदर कोई है, वरना मैं हरगिज़ दरवाज़ा खोलने की कोशिश न करता। पर मेरी सफ़ाई का हर शब्द उसको और भी अधिक उत्तेजित कर रहा था। ऐसा लगता था कि वह मुझे खिड़की से बाहर फेंक देगा। लंबी बोगी पूरी तरह भरी हुई थी, पर पूरे डब्बे में एक शख़्स भी मेरी हिमायत के लिए नहीं उठा। आख़िर में मैं बिल्कुल खामोश हो गया। मैं उस शख़्स की तरफ़ देख रहा था, पर मेरे चेहरे पर डर या उत्तेजना का ज़रा सा भी कोई भाव न था। मैं एकदम भावहीन मुद्रा में स्टेचू की तरह ख़ामोशी के साथ उसको
का शाब्दिक अथ ह— झटक का सहन वाला एक यंत्र जो मोटर गाड़ियाँ म लगाया जाता है और एक्सल और बॉडी के बीच एक किस्म के गद्दे का काम करता है। वह सड़क की सतह पर ऊंच-नीच से पैदा होने वाले झटकों को बॉडी तक पहुंचने से रोकता है:
A device which on an automobile, acts as a cushion between the axles and the body and reduces the shocks on the body produced by undulations of the road surface (IX / 159)। अगर आप ट्रेक्टर पर 50 किलोमीटर का सफ़र करें तो आप अपनी मंजिल पर इस तरह पहुंचेंगे कि आप थके हुए होंगे। इसके विपरीत जब आप एक अच्छी मोटर कार पर 50 किलोमीटर की यात्रा करें तो आप मंजिल पर इस तरह उतरते हैं कि आप बिल्कुल तरो-ताज़ा होते हैं। दोनों गाड़ियों में इस अन्तर का कारण क्या है? इसका कारण शॉक एब्ज़ारबर है। कार जब चलती है तो ज़्यादातर उसका पहिया ऊपर-नीचे होता है, बॉडी ऊपर नीचे नहीं होती। इसके विपरीत जब ट्रैक्टर चलता है तो उसका पहिया और बॉडी दोनों ऊपर-नीचे होते रहते हैं। दूसरे शब्दों में कार उस गाड़ी का नाम है कि जो झटका गाड़ी को लगा वह गाड़ी तक रह गया, वह मुसाफिर तक नहीं पहुंचा। जबकि ट्रैक्टर उस गाड़ी का नाम है कि जो झटका गाड़ी को लगा वह
इन्सान हो ह जा समाज का बिगाड़ आर फ़साद से भर दत ह। दिल्ली के एक अंग्रेजी अख़बार में मैंने एक लेख पढ़ा। उसका शीर्षक था कि 'दोतरफा तरीका बेहतरीन तरीक़ा है' (Bilateralism is the Best) यानी दो वर्गों के बीच विवाद हो तो उसको हल करने का तरीका यह है कि दोनों 'फिफ्टी फिफ्टी' पर राज़ी हो जाएं। पचास प्रतिशत जिम्मेदारी एक पक्ष ले और पचास प्रतिशत जिम्मेदारी दूसरा पक्ष। इस तरह मामले को ख़त्म कर दिया जाए। यह बात ग्रामर (व्याकरण) के लिहाज से सही, पर हक़ीक़त के हिसाब से ग़लत है। क्योंकि आज की दुनिया में यह अव्यवहारिक है। इस दुनिया में कोई विवाद उसी स्थिति में ख़त्म हो सकता है जबकि एक पक्ष एकतरफा तौर पर इसको ख़त्म करने पर राजी हो जाए। इस लिहाज से यह कहना ज़्यादा सही होगा कि एकतरफ़ा तरीक़ा बेहतरीन तरीका है: