Al-Risala · July 2024

Unilateralism is the Best.

Al-Risala, July 2024, pp. 12–17

By Maulana Wahiduddin Khan

पैग़म्बरे - रे-इस्लाम ने झगड़ों और शिकायतों को ख़त्म करने का यही तरीका बताया है। हदीस में कहा गया है: "जो शख्स तुम्हारे साथ बुरा सलूक करे उसके साथ तुम अच्छा सलूक करो।" (कुन्ज़ल उम्माल, हदीस संख्या 6929) यानी प्रतिक्रिया और रद्दे-अमल का तरीका न अपनाओ। और न इसका इंतजार करो

और इसी सब्र में बेहतर इन्सानी समाज का रहस्य छुपा हुआ है। अशुभ से शुभ एक वृक्ष की सफलता इसी में है कि वह छोटे को बड़ा बना सके, मामूली को विशिष्ट में बदल सके। वह जड़ पदार्थ (बीज) को बढ़ती हुई चीज़ों में बदल देता है। वह बाहर से मिट्टी, पानी और गैस लेता है। और उसको पत्ती, फूल और फल रूप में सामने ले आता है। इसी तरह किसी इंसानी समाज का बेहतर समाज होना इस बात पर निर्भर है कि उसके तमाम लोग यह योग्यता रखते हों कि वे छोटे सलूक को ऊंचे सलूक में बदल सकें। इस मामले में इंसान के मनोवैज्ञानिक अस्तित्व को भी ऐसा ही होना चाहिए जैसा बनाने वाले ने उसके बॉयलाजिकल (जीव-वैज्ञानिक) अस्तित्व को बनाया है। इंसान जो चीज़ें खाता है उनमें एक अंश शक्कर (चीनी) का होता है। शक्कर अपनी पहले की सूरत में इंसान के लिए बेफ़ायदा है इसलिए इंसान के जिस्म में अग्नाशय (Pancreas) की व्यवस्था की गई है, जिसका काम है शक्कर को ऊर्जा (एनर्जी) में बदल देना। इसी 'बदलने' की योग्यता पर इंसान की ताक़त और स्वास्थ्य निर्भर है। जिस आदमी के जिस्म का यह सिस्टम बिगड़ जाय उसके अन्दर जाने वाली शक्कर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं होगी। वह या तो ख़ून में शामिल हो जाएगी या पेशाब के रास्ते बाहर आने लगेगी। इसके बाद इंसान बेहद कमज़ोर हो जायगा। इसी से वह बीमारी पैदा होती है, जिसे मधुमेह (डायबिटीज) कहा जाता है।

इसक सिवाय कोइ नहा कि उसम दुबारा यह उच्च याग्यता पदा का जाया। आजकल हमारे समाज में जो बिगाड़ और टकराव पाया जाता है, उसका कारण यह नहीं कि लोगों के बीच सांस्कृतिक भेद है। उसका सही कारण यह है कि हमारे समाज के लोग मनोवैज्ञानिक रूप से डायबिटिक हो गए हैं, उनमें शक्कर को ऊर्जा में बदलने की योग्यता नहीं रही। उनमें यह सामर्थ्य नहीं रही कि वे 'बेताक़त' को अपने लिए 'ताक़त' बना लें। सामाजिक ज़िन्दगी में हमेशा ऐसा होता है कि आदमी के साथ अशोभनीय बातें होती हैं। एक आदमी को दूसरे आदमी के साथ शिकायत पैदा हो जाती है। किसी के हित दूसरे के स्वार्थ से टकरा जाते हैं, एक व्यक्ति ऐसे शब्द बोलता है जिन्हें सुनकर दूसरा व्यक्ति महसूस करता है कि वह उसकी निजी या सामाजिक हैसियत पर चोट कर रहा है, उसकी मानहानि कर रहा है। समाज में इस तरह की घटनाएं अवश्य ही घटती हैं और घटती रहेंगी। हमारे लिए यह सम्भव नहीं है कि हम ऐसी घटनाओं को होने से रोक दें। हमारे लिए जो चीज़ मुमकिन है वह सिर्फ़ यह है कि हम ऐसी घटनाओं से नकारात्मक (निगेटिव) प्रभाव न लें। एक स्वस्थ आदमी अपने अन्दर जाने वाली शक्कर को ऊर्जा में बदलता है। तब्दीली की यही प्रक्रिया मनोवैज्ञानिक तौर पर भी होनी चाहिए। इस दुनिया में बेहतर सामाजिक ज़िन्दगी बनाने का रहस्य यह है कि लोगों की चेतना को

आपसी मतभेद और झगड़ा में फंसा हुआ था, वह विविध रंग के पौधों और वृक्षों का खूबसूरत बाग बन गया है। हमारे आसपास जो कुछ घटित हो रहा है, उनका गहराई के साथ अध्ययन किया जाए तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि कल्चर का फ़र्क या कल्चर की समानता असम्बद्ध चीजें हैं। इनका एकता से कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं। चंद मिसालें लीजिए:

बम्बई में पारसी और हिन्दू हज़ार बरस से एक साथ रहते हैं। आप जानते हैं कि पारसी समाज एक बंद समाज है। वे लोग अपने से बाहर शादी-ब्याह को सही नहीं समझते। बम्बई के हिन्दुओं और पारसियों में आपस में शादी-ब्याह नहीं होता (कुछ अपवादों को छोड़ कर, जिन्हें आम परम्परा नहीं कहा जा सकता) इसके बावजूद वहां कभी हिन्दुओं और पारसियों में लड़ाई नहीं हुई। दोनों के बीच बहुत अच्छे और शांतिपूर्ण सम्बन्ध हैं। इससे उल्टी मिसाल हिन्दुओं और सिखों की है। आप जानते हैं कि हिन्दुओं और सिखों में आपसी शादी-ब्याह का बेरोकटोक रिवाज था, पर इन्हीं दोनों फ़िरक़ों में आज पंजाब में इतने बड़े पैमाने पर लड़ाई हो रही है जैसे कि एक-दूसरे के दुश्मन हों। इसी तरह, मसलन, कहा जाता है कि सभी लोगों की भाषा एक हो जाए तो इसके बाद लोगों के बीच एकता पैदा हो जाएगी, पर यह भी एक निरर्थक और

आपसी झगड़ है कि पाकिस्तान का बन हुए 40 साल से ज़्यादा बात गए, पर वहां का झगड़ा आज तक ख़त्म नहीं हुआ। इस तरह की कई मिसालें हैं, जिनसे पता चलता है कि एकता, इत्तेहाद और सद्भाव का ताल्लुक़ लोगों के विचार और सोच से है न कि उनके ज़ाहिरी रस्मो-रिवाज से। देश के नागरिकों में यदि सही सोच मौजूद हो और वे ज़िन्दगी गुज़ारने का राज़ जानते हों तो वे ऊपरी फ़र्क़ के बावजूद मिल-जुल कर रहेंगे। इसके विपरीत यदि उनकी सोच दुरुस्त न हो, वे ज़िन्दगी के रहस्य से परिचित न हों तो वे एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहेंगे- चाहे उनका ज़ाहिरी कल्चर एक सा क्यों न हो। सच्चाई यह है कि ज़िन्दगी के मामलों की दुरुस्तगी में असली अहमियत मानसिक रुझान (Attitude of mind) की है। अगर हम इस देश में एकता और आपसी समझ पैदा करना चाहते हैं तो हमें लोगों के नज़रिए को दुरुस्त करना होगा। इस उद्देश्य को पाने का यही एकमात्र रास्ता है और इसके सिवा कोई और रास्ता नहीं। यह एकमात्र रास्ता आपसी सम्मान और सद्भावना का रास्ता है। लोगों में यह मानसिकता व मिज़ाज पैदा किया जाए कि वे दूसरों के साथ सद्भावनापूर्ण व्यवहार करें, वे हर इन्सान का सम्मान करें चाहे वह अपनी बिरादरी का हो या अपने बाहर की बिरादरी का। यही मिज़ाज एकता और सद्भावना की असली

اگر آپ بولنا نہیں جانتے تو چپ رہنا جانیے، کیوں کہ چپ رہنا بھی اتنا ہی بڑا کام ہے جتنا کہ بولنا۔

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