حقیقت پسندی
Al-Risala, September 2024, pp. 50–9
By Maulana Wahiduddin Khan
پیغمبر اسلام صلی اللہ علیہ وسلم نے امت کو ایک ہدایت ان الفاظ میں دی تھی : میری تعریف میں مبالغہ نہ کرو ( لا تُطْرُونِی ) ، جیسا کہ نصاری نے ابن مریم کی تعریف میں مبالغہ کیا۔ میں تو صرف اللہ کا ایک بندہ ہوں ، تم صرف یہ کہو کہ اللہ کا بندہ اور اس کا رسول ( صحیح البخاری ، حدیث نمبر 3445 ) ۔ اس ہدایت پر غور کیجئے تو معلوم ہوتا ہے کہ اس کا مقصد امت کو ایک عظیم خطرہ سے بچانا تھا۔ ہے غیر حقیقت پسندانہ مزاج۔ پیغمبر کے بارے میں قرآن میں آیا ہے کہ وہ ایک بشر تھے۔ اور مزید بات تھی کہ اللہ نے ان پر وحی نازل کی (18:110)۔ لیکن جب امت اطراء (مبالغہ آمیزی) کا معاملہ کرے تو اس کا لازمی نتیجہ یہ ہوتا ہے کہ امت کے اندر غیر حقیقت پسندانہ مزاج پرورش پاتا ہے ، یعنی امانی (wishful thinking) کا مزاج۔ مبنی بر حقیقت پلاننگ کا مزاج ان کے اندر ختم ہو جاتا ہے۔ یہ مزاج اس طرح آتا ہے کہ لوگ پہلے اپنے پیغمبر کو شہنشاہ کونین اور فخر موجودات جیسے مبالغہ آمیز القاب دیتے ہیں۔ پھر یہ مزاج عام ہو کر دوسرے مفروضہ بڑوں کے لیے بولا جانے لگتا ہے۔ اکابر، شیخ العالم، قائم الزماں اور سید الملت ، وغیرہ۔ مگر یہ سب غیر حقیقت پسندی یعنی قصیدہ خوانی کی زبان اور قصیدہ خوانی کا مزاج ہمیشہ لوگوں کے اندر تخلیقی فکر (creative thinking) کا عمل روک لوگ اجتہاد کے بجائے فکری جمود (intellectual stagnation) کا شکار ہو جاتے اس لیے پیغمبر اسلام نے اس مزاج سے اپنی امت کو شدت کے ساتھ روکا ہے۔
नियम पर क़ायम हो। यहाँ विविधता इंसानों के बीच भी अपेक्षित है। हम इंसानों के बीच यह मिज़ाज बनाना चाहिए कि वह अनेकता और भिन्नता के बावजूद एक होकर रहें। वह हर तरह के इंसानों के बीच ज़िंदगी गुजारना सीखें। इंसानी एकता को क़ायम करने के लिए फ़र्क व विविधता को मिटाना प्रकृति के नियम के विरुद्ध है इसलिए यह विचार कभी सफल नहीं हो सकता। मिसाल के तौर पर जानवरों को लीजिए। जानवरों की दस लाख से ज़्यादा किस्में पाई जाती हैं और हरेक का एक काम है, जो उसी के लिए नियत है। यहाँ जमीन पर रहने वाले कीड़ों की भी ज़रूरत है, जो गन्दी और बेकार चीज़ों को विखंडित (decompose) करके हमारे वातावरण को लगातार पाक साफ करते रहते हैं। यहाँ बैल की भी ज़रूरत है, जो हमारे खेत जोते और घोड़े की भी जरूरत है जो हमारी सवारी के काम आए। एक तरफ़ अगर यहाँ चिड़ियों की भी ज़रूरत है, जो चहचहाएं तो दूसरी तरफ़ गधे की भी जरूरत है कि जब वह चीखे तो आप सोचें कि मुझे इस तरह चीख कर नहीं बोलना चाहिए। यही मामला तमाम दूसरी चीज़ों का भी है। इस दुनिया में बेहिसाब विविधता है और रंगबिरंगापन है, इसी विविधता और अनेकरूपता पर उसकी व्यवस्था चल रही है। इसी पैटर्न पर इंसानों को पैदा करने वाले ने इंसानों के भीतर भी भिन्नता और विविधता रखी है। इस विविधता को बाकी रखने ही में इंसान की
विश्लेषण किया जाता है तो मालूम होता है कि तमाम चीज़ अपना आतम सच्चाई की दृष्टि से परमाणु (एटम) का संकलन हैं। हर चीज़ अंततः एटम है, चाहे वह ऊपर से कुछ भी दिखाई देती हो। यही क़ायनाती पैटर्न इन्सानों के अन्दर भी रखा गया है। इन्सान ऊपर से देखने में एक-दूसरे से अलग नज़र आते हैं। उनमें रंग और नस्ल के लिहाज़ से बहुत सी भिन्नताएं पाई जाती हैं, पर अगर उनका ऐतिहासिक विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि तमाम नस्लें आख़िरकार एक मां-बाप पर जाकर ख़त्म होती हैं। यानी सब एक-दूसरे के भाई हैं, न कि एक-दूसरे के पराए। यही बात कुरआन में इन शब्दों में कही गई है: ऐ लोगो, अपने रब से डरो, जिसने तुमको एक जान से पैदा किया, और उससे उसका जोड़ा निकाला। और फिर उन दोनों से बहुत से मर्द और औरत ज़मीन में फैला दिए। (4:1) यही बात हदीस में इस तरह आई है: सुन लो कि तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से थे। (मुसनद अहमद, हदीस संख्या 8736) इन्सानी एकता की यह परिकल्पना हर इन्सान के दिल में दूसरे इन्सान के लिए मुहब्बत और सद्भाव पैदा करती है। वह पूरी इन्सानी नस्ल को एक कुटुम्ब, एक ख़ानदान और एक बिरादरी बना देती है। हदीस में कहा गया है: “तमाम मख़लूक (जीवधारी) अल्लाह की कुटुम्ब है। तमाम लोगों
in diversity) का नियम चल रहा है तो इन्सान के लिए यह दुरुस्त नहीं कि वह अनेक को एक करने (unification of diversity) के तरीके पर जिंदगी की व्यवस्था बनाने की कोशिश करे। तरक्क़ी और एकता आजकल जो चीज़ सबसे ज़्यादा बहस का विषय बनी हुई है वह राष्ट्रीय एकता (national integration) है। व्यापक अर्थों में इसको मानवीय एकता कहा जाता है। इसमें शक नहीं कि यह एकता आज हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत है। इसी पर देश की तरक्क़ी और कामयाबी निर्भर है। पर इस मामले में बोलने वाले जो कुछ बोल रहे हैं या लिखने वाले जो कुछ लिख रहे हैं, उसको देख कर मुझे ऐसा लगता है कि इस बारे में लोगों का ज़ेहन साफ़ नहीं है कि वे जो कुछ चाहते हैं उसको हासिल करने का तरीक़ा क्या है। ज़्यादातर लोगों की तरफ़ से यह कहा जा रहा है कि नेशनल इंटेग्रेशन का रास्ता कल्चरल इंटेग्रेशन से है। यानी लोगों में एकता पैदा करने का तरीक़ा यह है कि उनका कल्चर (संस्कृति) एक कर दिया जाए। भाषा, धार्मिक रीति रिवाज, पहनावा, त्यौहार, शादी-ब्याह, इस तरह की तमाम सांस्कृतिक चीज़ों को सबके लिए समान (काममन) और साझा बना दिया जाए। इस तरह लोगों में वह एकता या इंटेग्रेशन पैदा हो जायगा, जिसकी हमें ज़रूरत है।
गई तरकीबों से राष्ट्रीय एकता या नेशनल इंटग्रेशन भी पैदा नहीं किया जा सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय एकता का रहस्य एक कल्चर में नहीं है, बल्कि एक ज़ेहन में है। इस उद्देश्य के लिए हमें लोगों के अन्दर इसके अनुकूल सोच पैदा करनी होगी। प्लास्टिक सर्जरी जैसा कोई उपाय ऊपरी शक्ल को तो बदल सकता है, पर वह अन्दरूनी सोच को नहीं बदल सकता। और महज़ ऊपरी चीज़ों को एक कर देने से कभी सच्ची एकता पैदा नहीं हो सकती। 6 जनवरी, 1990 को दिल्ली (शहूरपुर) में एक दर्दनाक हादसा हुआ। कुछ छोटे बच्चे एक मैदान में खेल रहे थे। वहां एक तरफ़ कूड़े का ढेर था। वे खेलते हुए उस कूड़े तक पहुंच गए। यहां उन्हें एक पड़ी हुई चीज़ मिली। यह कोई ज़हरीली चीज़ थी। मगर उन्होंने उसको बेख़बरी में उठा कर खा लिया। इसके नतीजे में दो बच्चे फ़ौरन ही मर गए, और आठ बच्चों को गम्भीर हालत में जयप्रकाश नारायण अस्पताल में दाख़िल करना पड़ा। ये बच्चे दो साल से पांच साल तक के थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया (7 जनवरी 1990) ने पहले पेज पर इसकी ख़बर देते हुए लिखा है कि इन बच्चों में से एक ने वहां एक छोटा पैकेट पाया। देते उसमें करीब डेढ़ सौ ग्राम कोई सफ़ेदम रंग का चूर्ण था। उन्होंने ग़लती से उसको शक्कर
भातिक ख़ुराक के लिहाज़ से यह चन्द बच्चों का वाकिआ है, लाकन नातक ख़ुराक की दृष्टि से देखिए तो आज यही तमाम इन्सानों का वाक़िआ है। आज की दुनिया में तामाम इन्सान ऐसी नैतिक ख़ुराकें खा रहे हैं जो उनकी इन्सानियत के लिए ज़हर हैं, जो उनको हमेशा की बरबादी से दो-चार करने वाली हैं। झूट, दुराचार, रिश्वत, अहंकार, ईर्ष्या, ज़ुल्म, अपहरण, अवैध क़ब्ज़ा, बदियानती, वादाखिलाफ़ी, बदख़्वाही, बेउसूली, बद-मामलगी, अविश्वास, ग़लती न मानना, एहसानफ़रामोशी, ख़ुदग़र्ज़ी, इन्तिक्राम, उत्तेजना, अपने लिए एक चीज़ पसन्द करना और दूसरे के लिए कुछ और पसन्द करना, यह तमाम चीजेंै नैतिक अर्थों में ज़हरीली ख़ुराकें हैं। आज तमाम लोग चीज़ों को मीठी शक्कर समझ कर खा रहे हैं। मगर वह वक़्त ज़्यादा दूर नहीं जब उनका ज़ेहरीलापन ज़ाहिर होगा, और फिर इन्सान अपने आपको इस हाल में पाएगा कि वहां न कोई उसकी फ़रियाद सुनने वाला होगा और न कोई उसका इलाज सृष्टि में एकत्व सृष्टि का अध्ययन बताता है कि पूरी सृष्टि एक केन्द्र के चारों तरफ़ घूम रही है। एटम का एक न्यूक्लियस है और एटम का पूरा ढांचा उस न्यूक्लियस के चारों
का चाज़ का खाचना शुरू करेगा और फिर अकलुपनार हद तक फला हुई यह असीम सृष्टि अपने केन्द्र की तरफ़ सिमटना शुरू होगी और आख़िरकार वह वक़्त आएगा कि सृष्टि के सारे पिंड सिमट-सिमट कर एक केन्द्रीय गोले का रूप धारण कर लेंगे, जैसे बिखरी हुई कीलों के बीच चुम्बक लाया जाए और सब कीलें सिमट-सिमट कर उससे जुड़ जाएं। इस तरह सृष्टि (क़ायनात) जैसे एकेश्वरवाद का व्यावहारिक प्रदर्शन बन गई है। वह अपने व्यवहार और अपनी गति से बता रही है कि इन्सान की ज़िन्दगी को कैसा होना चाहिए। इन्सान की ज़िन्दगी को ऐसा होना चाहिए कि उसकी तमाम सरगर्मियों का सिर्फ़ एक केन्द्र हो और वह एक ख़ुदा हो। आदमी के जज़्बात, उसकी सोच, उसकी सरगर्मियां, उसका सब कुछ ख़ुदा के आगे घूमने लगे। आदमी अगर अपनी ज़िन्दगी का केन्द्र अपने आपको बनाए तो सृष्टि की गति के हिसाब से वह प्रतिकूल है। इसी तरह अगर वह अपने व्यक्तित्व के बाहर किसी को अपने ध्यान का केन्द्र बनाए तो मौजूदा ढांचा एक हस्ती के सिवा किसी दूसरे की 'केन्द्रीयता' को मानने से इन्कार करता है। सृष्टि पुकार-पुकार कर कह रही है - 'एक' को अपने ध्यान का केन्द्र बनाओ, न कि एक के सिवा 'कई' को। सीमबद्धता का नियम
प्रभुत्वशाली (अज़ाज़) व ज्ञानवान (अलार्म) का बांधा हुआ अंदाज़ा है। और चांद के लिए हमने मंजिलें निर्धारित कर दीं, यहां तक कि वह ऐसा रह जाता है जैसे खजूर की पुरानी शाख़ा। न सूरज के वश में है कि वह चांद को पकड़ ले और न रात दिन से पहले आ सकती है। और सब एक-एक दायरे में तैर रहे हैं।” (36:38-40)
इन आयतों में उस आकाशीय सच्चाई की तरफ़ संकेत किया गया है कि इस क़ायनात के तमाम घूमने वाले सितारे और सैय्यारे (गृह व नक्षत्र) अपनी- अपनी कक्षा (Orbit) में ठीक-ठीक और सुनिश्चित ढंग से घूमते हैं। वे कभी अपनी हद को छोड़कर दूसरे की हद में दाख़िल नहीं होते। यही हदबन्दी या सीमाबद्धता इंसान के लिए भी आदर्श है। कुरान में कहा गया है कि जो लोग ख़ुदा की क़ायम की हुई हदों को तोड़ते हैं वे ख़ुदा की नज़र में ज़ालिम (अत्याचारी) हैं। (2:229)
यही बात हदीस में इन शब्दों में कही गई है:
“और अल्लाह ने हदें क़ायम कर दी हैं। तो तुम उन हदों का उल्लंघन न करो” (अल-मुसतदरक अल-हाकिम, हदीस संख्या 7114)
एक और हदीस में इस बात को मिसाल के ज़रिए इस तरह स्पष्ट किया गया है: “मोमिन की मिसाल और ईमान वाले की मिसाल ऐसी है जैसे घोड़ा,
आसमान के सितार एक अनदखी रस्सी में बंधु हुए हैं जो उन्हें उनके तयशुदा दायरे (Orbit) से बाहर नहीं जाने देती। इसी तरह इंसान को भी एक नैतिक (अख़लाकी) रस्सी में बांधा गया है। यह रस्सी सही और ग़लत की रस्सी है। उसको सही काम करना है पर ग़लत क़दम नहीं उठाना है। इंसान को इंसाफ़ पर क़ायम रहना है। उसको जुल्म और अत्याचार की इज़ाजत नहीं उसको जब बोलना है सच बोलना है। झूठ बोलना उसके लिए जायज़ नहीं। उसको अपनी तरक़्क़ी और कामयाबी के लिए प्रयत्नशील रहने की इजाजत है। पर उसको यह इजाजत नहीं कि वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने की क़ीमत पर अपने लिए फ़ायदा हासिल करे। इस सत्य को एक चुटकुले द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। एक देश को बाहरी गुलामी से आजादी मिली। उसके बाद वहां का एक 'नागरिक सड़क पर निकला। वह खुशी से झूमता हुआ जा रहा था। और अपने दोनों हाथ ज़ोर-ज़ोर से हिला रहा था। इसी बीच उसका हाथ एक राहगीर की नाक से टकरा गया। राहगीर ने गुस्सा होकर पूछा कि तुम इस तरह हाथ हिलाते हुए क्यों चल रहे हो? उस नागरिक ने जवाब दिया: “आज मेरे देश को आज़ादी मिल चुकी है। अब मैं आज़ाद हूं कि जो चाहूं करूं।" राहगीर ने अहिस्ता स्वर में कहा:
“तुम्हारी आज़ादी वहां ख़त्म हो जाती है, जहां से मेरी नाक शुरू
(Your freedom ends where my nose begins.)
जिस हा दूसर शख्श की नाक से टकरान का हद शुरू हो वहा हाथ हिलान वाल की आज़ादी की हद भी ख़त्म हो जाती है।