Al-Risala · September 2024

ख़ुदा की हिफ़ाज़त में

Al-Risala, September 2024, pp. 9–17

By Maulana Wahiduddin Khan

इस्लाम दीने-महफ़ूज़ है, यानी एक सुरक्षित धर्म है। मुसलमान इस दीने-महफ़ूज़ के मानने वाले हैं। मुसलमानों की इस हैसियत ने उनको भी एक महफ़ूज़ और सुरक्षित गिरोह बना दिया है। जिस तरह इस्लाम को मिटाना मुमकिन नहीं उसी तरह मुसलमानों को मिटाना भी मुमकिन नहीं। इस्लाम और मुसलमानों के लिए ख़ुदा की यह हिफ़ाज़त जारी रहेगी, यहां तक कि क़ियामत आ जाए। मुस्लिम उम्मत के साथ ख़ुदा के इस मामले का इज़हार बार-बार हुआ है। पहले दौर में मक्का में मुसलमानों के ठहरने को नामुमकिन बना दिया गया। ठीक उसी वक़्त मदीना के रूप में अल्लाह ने मुसलमानों के लिए एक ताक़तवर मर्कज़ फ़राहम कर दिया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफ़ात के बाद अरब क़बीलों में आम बग़ावत पैदा हो गई, जिसको तारीख़ में ‘फ़ितना-ए-इर्तिदाद’ यानी धर्म से फिर जाने का फ़ितना कहा जाता है। मगर अल्लाह ने अपनी ख़ास मदद से फ़ितने और बुराई के पैदा होते ही उसको ख़त्म कर दिया। ख़िलाफ़ते राशिदा के ज़माने में रोमी साम्राज्य और ईरानी साम्राज्य ने मुसलमानों को ख़त्म करना चाहा मगर अल्लाह की मदद से मुसलमान ख़ुद उन साम्राज्य को ख़त्म करने में कामयाब

तातारियों न इस्लाम क़बूल कर लिया, उन्हान ढाई हुई मास्जिद का दोबारा तामीर किया और उन मस्जिदों में सज्दा करके ख़ुदा के सामने अपने इज्ज़ और खुदृता का इक़रार किया। उन्नीसवीं सदी के मध्य में मुग़ल साम्राज्य ख़त्म हुआ। बीसवीं सदी के आग़ाज़ में उस्मानी ख़िलाफ़त का ख़ात्मा हो गया। बज़ाहिर ऐसा मालूम हुआ कि अब मुसलमानों के लिए दुनिया में कोई मुस्तक़बिल और कोई भविष्य नहीं। मगर दूसरे विश्व-युद्ध के बाद लोगों ने देखा कि दुनिया के नक़्शे पर पचास से ज़्यादा आज़ाद मुस्लिम मुल्क वजूद में आ गए हैं। और तमाम इस्लामी सरगर्मियां नए सिरे से, नई ताक़त के साथ जारी हो गई हैं। मुसलमानों को उम्मते-मरहूमा और वंचित समाज कहा जाता है। यह बात सही नहीं, बल्कि मुसलमान उम्मते-महफ़ूज़ा (सुरक्षित उम्मत) हैं। यानी उनके अन्दर बिगाड़ के बावजूद उन पर मिटा देने वाला अज़ाब नहीं आएगा, और कोई कौम उन पर इसन क़ाबू न पा सकेगी कि वह उनको बिल्कुल मिटा दे। इसका सबब कोई फ़ज़ीलत (मुसलमानों की श्रेष्ठता) नहीं है। यह दुन्यवी हिफ़ाज़त मुसलमानों को पूरी तरह नबूवत की श्रृंखला के ख़त्म होने के कारण से हासिल मौजूदा ज़माने में ख़ुदा की यह सुन्नत बहुत बड़े पैमाने पर ज़ाहिर हुई है। मौजूदा ज़माने में जो मुस्लिम रहनुमा उठे, उन्होंने अपनी ग़लत रहनुमाई से

आधुनिक अथवतन्त्र में अपना जगह न बना सका ऐसा लगा कि व आज के ज़माने के शूद्र और प्रददलित बन कर रह जाएंगे। मगर ऐन वक़्त पर तेल का ख़जाना ज़ाहिर हुआ। मुस्लिम मुल्कों की ज़मीन के नीचे अल्लाह तआला ने दुनिया के तेल के ज़ख़ीरों का 50 फ़ीसद से भी ज़्यादा हिस्सा रख दिया। इस कुदरती ख़ज़ाने ने मुसलमानों के आर्थिक पिछड़ेपन की भरपाई कर दी। क़यामत में ऐसे हक़ायक़ और तथ्य छिपे हुए थे जो क़ुरआन के ख़ुदा की किताब होने की पुष्टि करने वाले थे। मगर मुस्लिम लीडर अपने झूठे कामों की वजह से सृष्टि और कायनात की सच्चाई की खोज में न लग सके। अल्लाह तआला ने यह काम पश्चिमी क़ौमों से लिया। उन्होंने प्रकृति और फ़ितरत की सच्चाइयों को खोज निकाल कर इस बात की व्यावहारिक व्याख्या जुटा दी कि हम उनको ज़मीन और आसमान और प्रकृति में अपनी निशानियां दिखाएंगे ताकि उन पर यह खुल जाए कि यह हक़ (सत्य) है (क़ुरआन, 41:53)। अल्लाह तआला को इस दीन की आवाज़ पूरी ज़मीन के हर छोटे और बड़े घर में पहुंचानी थी (मुसनद अहमद, हदीस संख्या 23814), इसलिए अल्लाह ने फ़ितरत और प्रकृति में यातायात और संचार के साधन छिपा रखे थे। मगर मुस्लिम अल्लाह तआला ने दूसरी क़ौमों को इस खोज में लगा दिया। यहां तक कि वे तमाम प्रचार-प्रसार के साधन वजूद में आ गए, जिनको प्रिंट मीडिया

हिफ़ाज़त और मदद का यह ख़ास मामला फ़रमाया है। इंसानीयत के नमूने स्वामी विवेकानन्द (1863-1902) ने एक पत्र के जवाब में लिखा था कि मेरा अनुभव है कि अगर कभी कोई धर्म उल्लेखनीय हद तक इन्सानी बराबरी के लक्ष्य तक पहुंचा है तो वह इस्लाम और सिर्फ इस्लाम है। इसलिए मेरा यह स्पष्ट मत है कि व्यावहारिक (अमली) इस्लाम के बिना वेदांत के सिद्धांत, भले ही वे कितने ही अच्छे और शानदार हों, आम इन्सान के लिए बिल्कुल मूल्यहीन हैं। हमारे देश के लिए दो महान व्यवस्थाओं का मिलाप हिन्दुत्व और इस्लाम- वेदांत दिमाग और इस्लाम जिस्म - एक मात्र आशा है। मैं अपने मस्तिष्क की आंख से देख रहा हूं कि भविष्य का आदर्श भारत, अव्यवस्था और फूट से निकल कर वेदांत दिमाग़ और इस्लाम जिस्म के माध्यम से यशस्वी, सफल और अपराजेय बन रहा है। My experience is that if ever any religion approached this equality in an appreciable manner, it is Islam and Islam alone. Therefore, I am firmly persuaded that without the help of practical Islam, theories of Vedantism, however fine and wonderful they may be, are entirely valueless to the vast mass of mankind. For our own motherland, a junction of the two great systems, Hinduism and Islam-Vedanta brain and Islam body-is the only hope. I see in my mind's eye the future perfect India rising out of this chaos and strife, glorious and invincible, with Vedanta brain and Islam body. Letters of Swami Vivekananda (1986), pp. 379-80

गांधी जी ने एक बार अपने अख़बार ‘हरिजन’ में लिखा था कि सादगी कांग्रेसियों ही की विरासत नहीं। मैं राम और कृष्ण का हवाला नहीं देता, क्योंकि वे ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं थे। मैं मजबूर हूं कि अबू बक्र और उमर नाम का उल्लेख करूं। हालांकि वे बहुत बड़ी सल्तनत के शासक थे, पर उन्होंने फकीरों जैसी ज़िन्दगी गुज़ारी। Simplicity is not the monopoly of Congresses. I am not going to mention the names of Rama and Krishna because they were not historic personalities. I am compelled to mention the names of Abu Bakr and Umar. Though they were masters of vast empires, yet they lived the life of paupers. (Harijan, July 27, 1937) यह एक सच्चाई है कि इस्लामी शख्सियतों ने इस्लाम के रूप में जो इतिहास बनाया है, वह सारी मानवता के लिए नमूने का इतिहास है। इस्लाम ने उन खूबियों की ऊंची मिसाल क़ायम की है, जिनको इन्सानी खूबियां कहा जाता है। काल्पनिक क़िस्से-कहानियों के रूप में कोई भी व्यक्ति एक किताब लिख सकता है, पर इन्सानियत के नमूने के लिए यथार्थ चरित्र का उल्लेख करना हो तो इस्लामी शख्सियतों के सिवा किसी और का हवाला नहीं दिया जा सकता। इस लिहाज़ से ये इस्लामी शख्सियतें पूरी इन्सानियत की साझा नैतिक विरासत

आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले उसन अपन पत्र म लिखा थाः “मैं अपनी ज़िन्दगी को ख़त्म कर रहा हूं, क्योंकि शायद मैं ऐसी दुनिया में भटक आया जिसके लिए मैं पैदा नहीं किया गया था।” कमी का यह अहसास ऐसे बहुत से लोगों का पीछा किए रहता है, जो प्राकृतिक रूप से ग़ैर-मामूली ज़ेहन लेकर पैदा हुए हों। वे या तो घोर निराशा और असफलता की ज़िन्दगी गुज़ार कर मरते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं। कम बुद्धि और कम प्रतिभा रखने वालों में ऐसे लोग काफ़ी मिल जाएंगे जो प्रत्यक्षतः संतुष्ट जीवन जीते हों, पर ज़्यादा प्रतिभाशाली लोगों में मुश्किल ही से कोई शख़्स मिलेगा, जो संतुष्ट जीवन हासिल करने में सफल इसकी वजह इन्सान का आदर्शवाद है। हर इन्सान स्वाभाविक तौर पर आइडियल (आदर्श) की तलाश में है। पर मौजूदा दुनिया में आइडियल को पाना इतना कठिन मालूम होता है कि कहावत बन गई है कि आदर्श कभी हासिल नहीं किया जा सकताः Ideal cannot be achieved. अब होता यह है कि कम बुद्धि रखने वालों में चूंकि चेतना बहुत ज़्यादा जागृत नहीं होती, वे आइडियल और ग़ैर-आइडियल के बीच बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं

पालनहार हा उच्च बुद्धसम्पन्न लोग जिस चीज़ का तलाश में ह व इश्वरिय मिशन के सिवा कुछ नहीं, ख़ुदा का अस्तित्व ही आइडियल अस्तित्व है। और ख़ुदा के मिशन में अपने को लगा कर ही हम उस चीज़ को पा सकते हैं जो हमारी पूरी हस्ती को संतुष्टि दे और आइडियल के बारे में हमारी मानसिक कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरे। इन्सान का आइडियल उसका ख़ुदा है। पर वह अपने इस आइडियल को 'ग़ैर- ख़ुदा' में तलाश करने का असफल प्रयास कर रहा है। हज़ार मील का सफ़र एक चीनी कहावत है कि 'हज़ार मील का सफ़र एक कदम से शुरू होता है' यानी किसी को अगर हज़ार मील दूर जाना है तब भी पहले क़दम ही से उसका सफर शुरू होगा। एक-एक कदम चल कर ही वह अपनी मंज़िल को पहुंचेंगेा। ऐसा नहीं हो सकता कि पांव उठाते ही वह पहला कदम अपनी आखिरी मंजिल पर रख दे। यह ज़िन्दगी की एक आम सच्चाई है। इसका ताल्लुक व्यक्ति से भी है और समाज से भी। एक व्यक्ति का सफ़र भी इसी उसूल पर अमल करके 'कामयाब होता है और एक समाज या क़ौम का सफ़र भी।

चाहत ह तो बुनियाद आर दावार का निर्माण करन के बाद हा यह हो सकेगा कि आप अपने लिए एक ऊँचा मकान खड़ा कर सकें। ठीक यही मामला समाज और राष्ट्र के निर्माण का भी है। समाज का निर्माण इतिहास बनाने वाले भाषणों से नहीं होता, बल्कि इतिहास बनाने वाले कर्म से होता है। समाज व मिल्लत का मज़बूत किला मज़बूत पत्थरों से बनता है न कि शाब्दिक भाषणबाजी और शायराना भावुकता का कमाल दिखाने से। मौजूदा ज़माने में जो मुस्लिम नेता उठे, हरेक ने किसी न किसी ‘मुजाहिदाना प्रयास’ से अपने काम की शुरूआत की। हालांकि सही तरीका यह था कि वे वैचारिक सुधार और मानसिक जागरण से अपना काम शुरू करते। यही कारण है शोर भरे हंगامों के बावजूद अब तक कोई नतीजाखेज़ काम न हो सका। समाज के निर्माण का काम वैचारिक निर्माण और मानसिकता के सुधार से शुरू होता है, उसको व्यावहारिक पहल (दूसरे शब्दों में छलांग) से शुरू नहीं किया जा सकता। बड़ों को सभी के जनाज़ों में शामिल होना चाहिए। मदीने में एक काले रंग की बावली-सी औरत थी। वह मसजिद का कूढ़ा साफ़ किया करती थी। उसका इन्तिकाल हुआ तो चन्द लोगों ने उसको दफ़न कर दिया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इसकी ख़बर न दी।

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