बोलने का तरीक़ा
Al-Risala, November 2024, pp. 3–4
By Maulana Wahiduddin Khan
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बोलने का तरीक़ा यह था कि आप हमेशा साफ़ अन्दाज़ में बोलते थे और अल्फ़ाज़ को ठहर-ठहर कर अदा करते थे। आपकी अहलिया हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहू अन्हा ने बाद के ज़माने के लोगों से फरमाया: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) तुम लोगों की तरह तेज़-तेज़ नहीं बोलते थे, बल्कि आपके कलाम में ठहराव होता था। आप के पास बैठा हुआ आदमी उसको याद कर लेता था (सुनन अल-तिरमिधि, हदीस संख्या 3639)। एक और रियायत में ये अल्फ़ाज़ आए हैं:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) इस तरह तेज़-तेज़ बातें नहीं करते थे जैसे तुम करते हो, आप इस तरह बात करते थे कि अगर गिनने वाला गिने तो उसको गिन ले। (सही अल-बुख़ारी, हदीस न. 3567)
तज़कलेमा का अन्दाज़ छान लेता है। आख़िरत का जवाबदेही का एहसास उसके बोलने के जोश के लिए रुकावट बन जाता है। जो शख़्स इस क़िस्म के सख़्त एहसासों से दबा हुआ हो वह आख़िरी हद तक संजीदा इन्सान बन जाता है। और संजीदा इन्सान की बातचीत का अन्दाज़ वही होता है, जिसका नक्शा हज़रत आयशा की ऊपर वाली روایت में नज़र आता है।