बोलने की सूझबूझ
Al-Risala, November 2024, pp. 4–8
By Maulana Wahiduddin Khan
रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता हो उसको चाहिए कि बोले तो भली बात बोले वरना चुप रहे। ला ब्रूइयर (Jean de La Bruyere) एक फ्रांसीसी लेखक है। वह 1645 में पैदा हुआ और 1696 में उसकी मृत्यु हुई। उसने यही बात इन शब्दों में कही कि यह बड़ी बद्क़िस्मती की बात है कि आदमी के अन्दर न इतनी समझ हो कि वह अच्छा बोले और न इतनी निर्णय-शक्ति हो कि वह चुप रहेः It is a great misery not to have enough wit to speak well, nor enough judgement to keep quiet. बोलने की क्षमता एक महान् क्षमता है, जो अल्लाह तआला ने इन्सान को दी है। बोलने की क्षमता को अगर सही तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो वह नेमत है और
करा जा ज़िम्मेदारी के एहसास के तहत बोल न कि बालन के शौक़ के तहत। इसके विपरीत बोलने की क्षमता का ग़लत इस्तेमा'माल यह है कि आदमी सोचे बग़ैर बोले; उसको सिर्फ़ सुनाने का शौक़ हो; सुनने से उसको कोई दिलचस्पी न हो; मामले को गहराई के साथ समझे बग़ैर मामले पर भाषण झाड़ने के लिए खड़ा हो जाए; उसका बोलना दिखावे के लिए हो न कि सच्चाई प्रकट करने के लिए। बोलना सबसे बड़ा सबाब (पुण्य) है और बोलना सबसे बड़ा गुनाह भी। जो आदमी इस हक़ीक़त को जान ले, उसका बोलना भी सार्थक होगा और उसका चुप रहना भी सार्थक। ज़ुबान और दिल सबसे अच्छे भी हैं और सबसे ख़राब भी लुक़मान हकीम एक हब्शी गुलाम थे। उनके आक़ा ने एक रोज़ उनसे कहा कि एक बकरी ज़िब्ह करो और उसमें से दो बेहतरीन गोश्त के टुकड़े निकालो। लुक़मान ने बकरी ज़िब्ह की और ज़ुबान और दिल निकाल कर आक़ा के सामने पेश किया। कुछ दिन के बाद आक़ा ने दोबारा कहा कि एक बकरी जिब्ह करो और उसमें से दो सबसे ज़्यादा ख़राब गोश्त के टुकड़े निकालो। लुक़मान ने बकरी ज़िब्ह की और दोबारा ज़ुबान और दिल निकाल कर आक़ा के सामने रख दिए। आक़ा ने कहा कि मैंने तुम से दो सबसे अच्छे टुकड़े निकालने के लिए कहा तो तुमने ज़ुबान और दिल निकाले और जब मैंने तुम से दो सबसे ख़राब टुकड़े निकालने के लिए कहा तब भी तुमने ज़ुबान और दिल निकाले। ऐसा क्यों? लुक़मान हकीम ने जवाब दिया: अगर
तार पर आएँ मगर इतिहास बताता है कि कोई भी शख़्स ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब लाने में कामयाब न हो सका। तमाम मालूम इन्क़िलाब क़त्ल और ख़ून के जंगल को पार करके ही आए हैं। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का लाया हुआ इन्क़िलाब तमाम मालूम इतिहास का अकेला इन्क़िलाब है जो सही मानो में ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब (bloodless revolution) है। मुहम्मद (स.अ.व.) को अगर इतिहास से हटा दिया जाए तो न सिर्फ़ ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब की यह बात अफ़साना बन कर रह जाती है, बल्कि उसके बाद कोई ऐसी व्यावहारिक मिसाल बाक़ी नहीं रहती जिसकी रोशनी में कोई इन्सान बाद के ज़मानों में ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब की बात सोच सके। फ्रांस में आधुनिक लोकतांत्रिक इन्क़िलाब आया। इसमें जनता और राजतंत्र के बीच जो मुक़ाबले हुए उनमें मरने वालों की तादाद 10 लाख तक पहुंच गई। बीसवीं सदी में रूस में कम्यूनिस्ट इन्क़िलाब आया। उसमें जो लोग मरे और मारे गए उनकी ठीक-ठीक तादाद मालूम नहीं। फिर भी अन्दाज़ा है कि उनकी तादाद किसी हाल में एक करोड़ से कम नहीं। अमरीकी इन्क़िलाब (1773-1783) में इससे कुछ कम आदमी मरे। फिर भी इसमें मरने वालों की तादाद 50 हज़ार तक पहुंच गई। विश्व युद्धों का मामला इससे भी आगे है। पहले विश्व-युद्ध में विभिन्न मुल्कों के 75 लाख आदमी मारे गए। और दूसरे विश्व-युद्ध में छः करोड़ से ज़्यादा आदमी मरे। मुहम्मद (स.अ.व.) इस दुनिया से गए तो एक पूरे मुल्क में ज़बरदस्त वैचारिक और नैतिक इन्क़िलाब आ चुका था। आपकी वफ़ात के वक़्त 12 लाख वर्ग मील के क्षेत्र पर आपकी हुकूमत क़ायम थी। मगर इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ़ 1018 आदमी मरे,
हा और यहाँ वह क़ीमत है जिसके दिन के लिए कोई शर्क्स तैयार नही खूनी इन्क़िलाब टकराव की ज़मीन पर आते हैं और ग़ैर-खूनी इन्क़िलाब सब्र और संयम की ज़मीन पर और सब्र से ज़्यादा मुश्किल कोई काम इस दुनिया में एक इन्सान के लिए नहीं। सब्र की हक़ीक़त झटके को अपने पर लेना है, दूसरे पर डालने के बजाए अपने आप पर सहना है। हक़ीक़त यह है कि लड़ाई के बग़ैर भी जीत होती है। मगर लड़ाई के बग़ैर जीतने के लिए अपने आप से लड़ना पड़ता है। लोग अपने आप से लड़ नहीं पाते, इसलिए वे लड़ाई के बग़ैर लड़ाई जीतने वाले भी नहीं बनते। मुहम्मद (स.अ.व.) ग़ैर-खूनी इन्क़िलाब लाने में किस तरह कमियाब हुए, इसका अन्दाज़ा आपकी ज़िन्दगी के हालात को पढ़ने से होता है। मक्का में 13 साल तक आपके विरोधियों ने आपको और आपके साथियों को हर तरह की तकलीफ़े पहुंचाईं। उन्होंने अल्फ़ाज़ की चोट भी दी और पत्थर और तलवार की चोट भी। मगर इस तरह की बेशुमार घटनाओ के बावजूद मुहम्मद (स.अ.व.) ने एक बार भी जवाबी प्रतिक्रिया नहीं की। न किसी से कोई लड़ाई की। आप विरोधियों के हर वार को एकतरफ़ा तौर पर सहते रहे। उनकी तरफ़ से हर क़िस्म के भड़काव के बावजूद कभी भड़के नहीं। इसके बाद आपने यह किया कि मक्का को छोड़ कर ख़ामोशी के साथ मदीना चले गए। आपने न इसके ख़िलाफ़ फ़रियाद की कि आपको आपके साथियों को अपने वतन और अपनी जायदाद को छोड़ना पड़ रहा है और न इसकी परवा की कि इस तरह वतन छोड़ कर जाने की वजह से लोग आप पर बुज़दिली और फ़रार का
जबकि मुठभड़ के सिवा कोई और सूरत बाक़ी न रह गई हो। एसा बाक़ायदा जग सिर्फ़ तीन हैं जिनमें आप ख़ुद शरीक रहे हों (बद्र, उहुद और हुनैन)। आपके ज़माने में मू'ता की जंग भी हुई मगर उसमें आप ख़ुद शामिल न थे। आपको अरब में जो ताक़त हासिल हुई वह जंग के ज़रिए नहीं हुई। बल्कि उस सुलह के ज़रिए हुई, जिसको कुरआन में फ़तह-मुबीन (48:1) यानी खुली-जीत कहा गया है। सुलह-हुदैबिया का वाक़िआ ग़ैर-ख़ूनी इन्किलाब लाने के लिए अपने आपका ख़ून करने से कम न था। आपने अपनी ज़ात का 'ख़ून' करना गवारा किया ताकि बाहर की दुनिया में ख़ून न बहाया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) को अरब में जो ताक़त हासिल हुई वह जंग के ज़रिए नहीं बल्कि दावत के ज़रिए हासिल हुई। इसी दावत के बन्द दरवाज़ों को खोलने के लिए आपने यह किया कि दुश्मन से उसकी अपनी शर्तों पर सुलह कर ली। यह सुलह हुदैबिया थी जिसको कुरआन में खु खुली फ़तह कहा गया है। सुलह हुदैबिया इस बात का एक ऐतिहासिक सबूत है कि जंग के मुक़ाबले में अमन की ताक़त बहुत ज़्यादा है। रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने हुदैबिया की एकतरफ़ा सुलह के ज़रिए इसी महान हक़ीक़त का अमली रूप दिखाया है, फिर भी यह कोई सादा बात नहीं। इस क़िस्म की एक घटना को अमली रूप देने के लिए सब्र की ज़रूरत है, और इस दुनिया में बेशक सब्र से ज़्यादा मुश्किल कुरबानी और कोई नहीं।