मेयार को बुलन्द करना
Al-Risala, November 2024, pp. 9–15
By Maulana Wahiduddin Khan
उन्होंने हमारे साथ जैसा किया था वैसा ही हमने उनका बदला दिया।" रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अख़्लाक़ के इस उसूल को बदला। बराबरी के अख़्लाक़ के बजाय आपने उनको बुलन्द अख़्लाक़ी की तालीम दी। आपने फ़रमाया कि “जो शख़्स तुम्हारे साथ बुरा सुलूक करे उसके साथ तुम अच्छा सुलूक करो।" (कंजुल उम्माल, हदीस न. 6929)
एक और हदीस में है:
तुम लोग इम्माआ (मौक़ापरस्त-खुदग़र्ज़) न बनो, कि यह कहने लगो कि अगर लोग हमारे साथ अच्छा करें तो हम भी उनके साथ अच्छा करेंगे। और अगर वे ज़्यादती करें तो हम भी ज़्यादती करेंगे। बल्कि अपने आपको इसके लिए तैयार करो कि लोग तुम्हारे साथ अच्छा करें तो तुम उनके साथ अच्छा करोगे और अगर लोग तुम्हारे साथ बुरा करें तब भी तुम उनके साथ ज़्यादती नहीं करोगे। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस न. 2007)
आपकी एक सुन्नत यह भी है कि लोगों के शुऊर (चेतना) को बुलन्द किया जाए। उनके अख़्लाक़ को ऊंचा किया जाए। उनकी ज़ेहनी हालत को हर लिहाज़ से ऊपर उठाने की कोशिश की जाए। इन्सान के इन्सानी मे'यार को बुलन्द करना, फ़िक्री, इल्मी, अख़्लाक़ी हैसियत से उसको ऊपर उठाना अहमतरीन काम है। इसमें आदमी की भलाई है और इसी में पूरे समाज की भलाई भी। यह ठीक रसूल का तरीक़ा है यानी सुन्नते रसूल है और इसको ज़िन्दा करना सुन्नते-रसूल को ज़िन्दा करना है।
भविष्यवाणियां की गई हों। उन्हीं में से एक पशोनगाई वह है जिसका इमाम अहमद और दूसरे हदीसकारों ने नक़्ल किया है :
हज़रत मिक़दाद कहते हैं कि उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कहते हुए सुना कि ज़मीन की सतह पर कोई ख़ेमा या घर बाक़ी न रहेगा, मगर यह कि अल्लाह उसमें इस्लाम के कलिमे को दाख़िल कर देगा, चाहे अज़ीज़ की इज़्जत के साथ या ज़लील की ज़िल्लत के साथ। अल्लाह या तो उन्हें इज़्जत देगा और उनको इस्लाम वालों में से बना देगा या उन्हें ज़लील करेगा तो वे उसके दीन को इख्तियार कर लेंगे। (मुसनद अहमद, हदीस न. 23814)
यह हदीस बताती है कि आख़िरी ज़माने में इस्लाम हर घर में दाख़िल हो जाएगा। मगर हदीस के अल्फ़ाज़ के मुताबिक़ जो चीज़ घरों के अन्दर दाख़िल होगी वह इस्लाम का कलिमा होगा न कि इस्लाम का सियासी और हुकूमती इक्तिदार (सत्ता)। कुछ लोगों ने इस पेशेनगोई को सियासी दाखिले के मानों में ले लिया है इसका नतीजा यह है कि वे लोग सारी दुनिया में इस्लाम का सियासी झंडा लहराने के नाम पर मदऊ (निमंत्रणीय) क़ौमों से सियासी लड़ाई छेड़े हुए हैं। इस बेकार की लड़ाई का नतीजा यह है कि ये लोग इस्लाम से बेज़ार होकर उससे दूर होते जा रहे हैं। इस पेशेनगोई को सच्चाई बनाने के लिए मुसलमानों को जो काम करना है वह अल्लाह की दा'वत है। उन्हें चाहिए कि वे तौहीद और आख़िरत के रब्बानी पैग़ाम से तमाम क़ौमों को बाख़बर करने में दिलो-जान से लग जाएं, वे इस्लाम को फ़िक्री और बौद्धिक हैसियत से एक मालूम और सम्पूर्ण चीज़ बना दें, ताकि जिसको मानना
جس اس گھر کے اندر بات کرتے ہوئے خود نبأ موجود ہو (جامعُ ال۔ اسِیر، بھاگ 1، پیج 194)
یہ بات ویسے تو ایک سادہ سی بات ہے، لیکن ہے بہت اھم۔ آج انسان کے پاس صرفٔ پَیغَمبرے-اِسلام سللللاہو अलैहि वसल्लम ही का कलाम नहीं है، بلکہ دوسرے پَیغَمبروں کا कलाम भी موجود ہے۔ مسلن تورات اور انجیل میں بہت سے نبیوں کے कलाम मौजूद हैं، مگر ان کتابوں کے بارے میں نہیں کہا جا سکتا کہ جس گھر میں یہ کتابیں ہیں، اس گھر میں اَمبیا بات کرتے ہوئے موجود ہیں، جبکہ پَیغَمبرے اِسلام کے بارے میں یہ بات بالکل لَفزی طور پر درست ہے۔
اس फ़र्क की वजह यह है कि दूसरे पैग़म्बरों का जो कलाम आज मज़हबी किताबों में मौजूद है वह भरोसे के लायक नहीं है। उनमें मिलावट और नक़्ल के नतीजे में बहुत-सी तब्दीलियां हो चुकी हैं। इस तरह वैसे तो पैग़म्बर का कलाम मौजूद है लेकिन वह इस रूप में नहीं है कि उन पर भरोसा किया जा सके। जबकि पैग़म्बर-इस्लाम (स.अ.व.) का मामला बिल्कुल अलग है। आपका कलाम पूरी तरह पैग़म्बर का कलाम है। आपके कलाम के संकलन और सम्पादन में इतनी ज़्यादा मेहनत और एहतियात की गई है और उसकी शुद्धता और स्वस्थता का इतना ज़्यादा ध्यान रखा गया है कि आज जो ‘हदीस का संग्रह’ हमारे पास मौजूद है, उसके बारे में पूरे भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि वे पैग़म्बर के शब्द हैं। इस तरह पैग़म्बरे इस्लाम जैसे हमेशा के लिए हमारे बीच में मौजूद हैं। वह इन हदीसों के ज़रिए बराबर हम से बात करते हैं। वह हमको हिदायत दे रहे हैं। वह हर मौक़े पर
बात का सुनने और समझने के लिए अन्ध और बहर बन रहा वह इन्सान भी कैसा बदनसीब और महरूम इन्सान है जिसके पास बोलने वाला नबी मौजूद हो लेकिन वह उसे सुनने वाला न बन सके। मुश्किल में आसानी क्या हमने तुम्हारा सीना तुम्हारे लिए खोल नहीं दिया। और तुम्हारा वह बोझ उतार दिया जो तुम्हारी पीठ को तोड़ रहा था। और हमने तुम्हारा ज़िक्र बुलन्द किया। तो मुश्किल के साथ आसानी है, बेशक मुश्किल के साथ आसानी है। फिर जब तुम मुक्त हो जाओ तो मेहनत करो। और अपने रब की तरफ़ ध्यान लगाओ। (सूरह अल- यह सूरह मक्का के शुरू के ज़माने में उतरी। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का में जब लोगों को एकेश्वरवाद (तौहीद) की तरफ़ बुलाना शुरू किया तो यह उन तमाम लोगों को अविश्वसनीय ठहराने के बराबर था, जो अल्लाह के सिवा दूसरे खुदाओं के आधार पर बड़ाई और सरदारी का दर्जा पाए हुए थे। इसलिए ये लोग आपके सख़्त दुश्मन हो गए। वे आपको तरह-तरह की तकलीफ़ें पहुंचाने लगे। आप सख़्त परेशानी में पड़ गए। उस वक़्त इस सूरह के ज़रिए आपको अल्लाह की एक सुन्नत से बाख़बर किया गया। वह यह कि इस दुनिया में ‘मुश्किल’ का रिश्ता ‘आसानी’ से बंधा हुआ है।
ختم کر دیا۔ یہ پریشانی حالانکہ شروع کا 'مشکل' تھا، لیکن اسکے اندر 'آسانی' کا پہلو نکل آیا۔ کیونکہ इसने आपको ख़ुश्क ज़मीन की तरह बना दिया, ताकि जब 'वह्य' की सूरत में हिदायत आए तो उसकी एक-एक बूंद आपके अन्दर जज़्ब होती चली जाए। आप भरपूर तौर पर उसे ग्रहण कर लें। वह पूरी तरह आपके ज़ेहन को साफ़ और रोशन कर दे। दूसरी चीज़ जो इस 'सुन्नत' के लिए बतौर मिसाल पेश की गई, वह ज़िक्र को बुलन्द करने का मामला है। रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की के लोगों को ईश्वर के सृष्टि-निर्माण योजना से अवगत करने की वजह से जिन लोगों को विरोध पैदा हुआ उन्होंने इसको नाकाम करने के लिए उनको बदनाम करने की मुहिम शुरू कर दी। वे आपके ख़िलाफ़ अशआर (कविता) कह कर उसको फैलाते, जो एक तरह से उस ज़माने की पत्रकारिता थी। मेले और बाज़ार, जो उस ज़माने के इजतिमा थे, वहां जाकर वे लोगों को आपके ख़िलाफ़ भड़काते। वे लोगों के सामने आपकी बुरी तस्वीर पेश करते ताकि वे आपसे और आपके सच्चे मिशन से बदगुमान हो जाएं। विरोधियों ने ऐब निकालने और इल्ज़ाम लगाने की जो मुहिम चलाई, उसका मक़सद उनके अपने ख़्याल के मुताबिक़ यह था कि पैग़म्बर को बदनाम करें और इस तरह लोगों को ईश्वर के सृष्टि-निर्माण योजना को समझने से दूर कर दें, उससे डरा दें। मगर इस मुश्किल में भी आसानी का पहलू निकल आया। विरोधी अपने तौर पर तो आपको बदनाम करने की कोशिश कर रहे थे, पर दूसरों के लिए इसमें उत्सुकता पैदा हो गई। इस तरह आपकी शख़्सियत लोगों के सामने एक बड़ा सवाल बन कर खड़ी
वाल के बारे में और ज़्यादा जानकारी हासिल करने के ख़ुद खाजबान करत थे। वे आपसे मिलते और क़ुरआन को पढ़ते-सुनते। इस तरह विरोध का यह नतीजा हुआ कि आपका पैग़ाम दूर-दूर तक पहुंच गया, जहां आप ख़ुद अभी तक उसको नहीं पहुंचा सके थे। विरोधियों ने आपको बदनाम करके आपके बारे में लोगों के अन्दर खोज-बीन करने का शौक़ पैदा किया। और जब उन लोगों ने सीधे ख़ुद खोज-बीन की तो उनमें से बहुत से लोग आपके पैग़ाम को हक़ व सच्चा पाकर उसके हामी बन गए। इस सूरह में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से कहा गया है कि 'मुश्किल' के 'आसानी' में तब्दील होने के दो तजुर्बे तो तुम कर चुके हो - सच की तलाश की बेचैनी के बाद हिदायत का मिलना, बदनामी की मुहिम से दावत फैलने के नए मौक़े पैदा होना। इसी तरह उस सुन्नते-इलाही का तीसरा पहलू भी जल्द ही तुम्हारे सामने आ जाएगा। हालात की स्वाभाविक रफ़्तार को अपनी हद तक पहुंचाने दो और भविष्य के उजागर होने तक सब्र के साथ उसका इंतज़ार करो। इस तीसरे दौर का मतलब पैग़ाम और पैग़ाम पेश करने वाले का शुरुआती दौर से निकल कर मुसल्लमा (सम्पूर्ण) दौर में दाख़िल होना है। जिसको सूरह नस्त्र में 'फ़तह' कहा गया है। मौजूदा शुरुआती दौर में जो सख़्त हालात पेश आ रहे हैं, वे आने वाली 'आसानी' की भूमिका हैं। इस तरह वे तमाम ज़रूरी कारक (फ़ैक्टर) जमा किए जा रहे हैं कि आइन्दा जब ठहराव का चरण आए तो वह सही माइनों में ठहराव और स्थायित्व बन सके।
गुमनामी में पड़े हुए हीर निखर उठें और झूठी शोहरत का लबादा ओढ़ने वाले लोग बेनक़ाब हो जाएं। और यह कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) और आपका चिन्तन माहौल में छा जाए तो इस तरह छाए कि वह उनका एक साबितशुदा हक़ बन चुका हो, और इसी तरह जब आपके विरोधियों को नाकाम किया जाए तो यह नाकामी इस तरह आए कि वह लोगों को एक खुली हुई ऐतिहासिक ज़रूरत दिखाई देने लगे। मुश्किल में आसानी का यह तजुर्बा जो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) को हुआ, यही आइन्दा भी आपके उम्मतियों को होता रहेगा, बशर्ते कि वे उसी सही रास्ते पर चलें, जिस पर आप चले और उसी सब्र और धीरज का सबूत दें जिसका सबूत आपने अपने ज़माने में दिया।