Al-Risala · March 2025

اختلاف ایک آزمائش

Al-Risala, March 2025, pp. 50–17

By Maulana Wahiduddin Khan

اختلاف ایک پرچہ امتحان ہے۔ کسی سے آپ کا اختلاف پیدا ہوجائے تو سمجھ لیجیے کہ اللہ نے آپ کو ایک نازک آزمائش میں ڈال دیا تا کہ یہ جانے کہ آپ سچے مومن ہیں یا سچے مومن نہیں۔ اختلاف کو اختلاف کے دائرے میں رکھنا سچے اہل ایمان کا طریقہ ہے۔ جولوگ اختلاف کو تخریب کاری کے درجے تک پہنچا دیں وہ بلاشبہ ایمان و اسلام کے دائرے سے نکل گئے۔ آدمی جب اختلاف کو اختلاف کے دائرے میں رکھے تو اس کا امکان ہوتا ہے کہ تبادلہ خیال کے دوران دونوں میں سے کسی کے اوپر سچائی کھل جائے اور اس طرح جو بھٹکے ہوئے مسافر کی مانند تھا وہ دوبارہ صحیح راستہ پر آ جائے۔ مگر جب ایک آدمی اختلاف کو تخریب کاری تک پہنچا دے تو اس کے بعد گمراہی کے گڑھے میں گرنے کے سوا کوئی انجام اس کے لیے باقی نہیں رہتا۔ کا دماغ منفی سوچ کا کارخانہ بن جاتا ہے۔ وہ دلیل اور الزام تراشی کے فرق کو سمجھنے کی اہلیت کھو وہ منصفانہ اختلاف کی حد سے گزر کر ظالمانہ اختلاف کے دائرے میں داخل ہو جاتا ہے۔ خدا کی پکڑ کے احساس سے غافل ہو جاتا ہے۔ وہ صرف اپنی انا (ego) کو رہنما بنا لیتا ہے۔ کا مقصد حق کو قائم کرنا نہیں ہوتا بلکہ صرف اپنی ذات کو قائم کرنا اس کا اول و آخر مقصد بن جاتا ہے۔ خدا کی رحمت سے دور ہو کر پوری طرح شیطان کی گرفت میں آجاتا ہے۔

اختلاف پیدا ہونا بالکل فطری ہے۔ مگر اختلاف کو تخریب کاری بنا نا سراسر ظالمانہ فعل ہے۔ جو لوگ اختلاف کو تخریب کاری بنائیں ان کے لیے سخت خطرہ ہے کہ وہ خدا کی شدید پکڑ میں آجائیں۔ عین ممکن ہے کہ آخرت میں ان سے کہہ دیا جائے کہ آج تم نے دنیا کی زندگی میں شیطان کو اپنا رہنما اب آخرت کی خدائی نعمتوں میں تمہارا کوئی حصہ نہیں۔

اختلاف کے وقت عدل پر قائم رہنا آدمی کے لیے جنت کا دروازہ کھولتا ہے، اور اختلاف کے وقت عدل و انصاف سے ہٹ جانا آدمی کو جہنم کے دروازے پر پہنچا دیتا ہے۔

(اس شمارے کے اردو مضامین اختلاف رائے کے موضوع پر زیر اشاعت نئی کتاب کے مضامین پر مشتمل ہیں)

शब्द इस प्रकार हैं: हज़रत अबू हुरैरा (राज़यल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि पैगंबर- ए-इस्लाम ने कहाः “मनुष्य धातु की तरह हैं, जैसे सोने और चांदी की धातु। जो व्यक्ति जिहालत (अज्ञानता) में बेहतर था, वही इस्लाम में भी बेहतर है, बशर्ते वह समझ हासिल कर लो।” (मुसनद अहमद, हदीस संख्या 10956)

इस हदीस में इंसान के बौद्धिक विकास के चरणों को बताया गया है। पहला चरण वह है जिसमें इंसान जन्म लेता है। दूसरा चरण वह है जो इंसान अपने प्रयासों से बनाता है। तीसरा चरण मारिफ़त (ज्ञान) का है। जब इंसान मारिफ़त के चरण में पहुंचता है, तो वह अपने विकास की अंतिम मंज़िल पर पहुंच जाता है, जिसे इस्लाम कहा गया है। इंसान की स्थिति धातु (मेटल) जैसी है। जैसे लोहा जमीन से निकलता है। प्रारंभिक स्थिति में वह कच्चा लोहा (ore) होता है। इसके बाद उसे पिघलाकर साफ किया जाता है और वह स्टील बन जाता है। फिर वह वह बनाने के मुख्तलिफ़ मरहले से गुजरता है और अंततः एक मशीन का रूप ले लेता है। यानी पहले चरण में कच्चा लोहा, दूसरे चरण में स्टील, और तीसरे और अंतिम चरण में मशीन। इंसान भी ऐसा ही है। जब वह पैदा होता है, तो वह प्रकृति की खदान से बाहर

कमाल-ए-इंसानियत के स्तर पर पहुंचकर इश्वर का ज्ञान (आ'रिफ़ बिल्लाह) प्राप्त करता है। इन तीन चरणों को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है: 1. जन्मजात व्यक्तित्व (Born Personality)

2. विकसित व्यक्तित्व (Developed Personality) 3. ज्ञानी व्यक्तित्व (Realized Personality) जन्मजात व्यक्तित्व ईश्वर का दिया हुआ व्यक्तित्व होता है। इस दृष्टि से सभी मनुष्य समान हैं। क्षमता के मामले में एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति में हमेशा अंतर होता है, लेकिन संभावित योग्यता (Potential Capacity) के संदर्भ में सभी मनुष्य समान होते हैं। इसी तथ्य को एक हदीस में इस प्रकार व्यक्त किया गया है: “ताक़तवर ईमान वाला ईश्वर के निकट कमजोर ईमान वाले से बेहतर और अधिक प्रिय है, और हर किसी में भलाई है। जो चीज़ तुम्हारे लिए फायदेमंद हो, उसे प्राप्त करने की कोशिश करो और ईश्वर से मदद मांगो, लेकिन हार मत मानो। और अगर तुम्हारे खिलाफ कोई बात पेश आए तो यह न कहो कि काश, मैंने ऐसा और ऐसा किया होता। बल्कि यह कहो कि यह

चाहिए, क्योंकि दूसरे पहलू से उसके अंदर कोई और गुण अधिक होगा। इंसान को चाहिए कि वह उस क्षमता (potential) को पहचाने जो उस को ख़ुदा की तरफ़ से मिली हुई है और हिम्मत के साथ अपनी ज़िंदगी की रचना करे। जीवन के संघर्ष के दौरान अगर उसे कोई नुकसान पहुँचे तो उसे यकीन रखना चाहिए कि इस नकारात्मक अनुभव में भी कोई सकारात्मक लाभ छुपा होगा। इंसान को चाहिए कि वह अपने हर नकारात्मक अनुभव से सकारात्मक सीख ले और किसी भी हाल में हिम्मत न हारे। इस तरह आदमी अपनी शख्सियत का निर्माण करता रहता है। वह अपना मूल्यांकन करके अपनी कंडीशनिंग को दूर करता रहता है। वह अपने चेतना को जागरूक करके अपने अंदर ऐसी शख्सियत का विकास करता रहता है जिसमें सत्य को स्वीकार करने की योग्यता मौजूद हो, जिसमें वह क्षमता हो जिसे पैगंबर की एक दुआ में इस तरह व्यक्त किया गया है:

"हे अल्लाह, तू मुझे सत्य को सत्य के रूप में दिखा और उसकी अनुगति करने की शक्ति दे। और हे अल्लाह, तू मुझे असत्य को असत्य के रूप में दिखा और उससे बचने की शक्ति प्रदान कर। और हे अल्लाह, तू मुझे चीजों को वैसा ही दिखा जैसा कि वे वास्तव में हैं।" (तफसीर इबन कसीर, भाग 1, पृष्ठ 427; तफसीर अल-राज़ी, भाग 1, पृष्ठ 119)

रूप से मिलती है, लेकिन उसके बाद स्वयं का एक विकसित व्यक्तित्व बनाना, यह हर इंसान का स्वयं का प्रयास होता है। ठीक उसी तरह जैसे कच्चा लोहा प्रकृति की ओर से प्रदान किया जाता है, लेकिन इस कच्चे लोहे को स्टील और मशीन में बदलने की प्रक्रिया इंसानी कारखाने में होती है। इसी आत्म-तैयारी (self-preparation) की प्रक्रिया पर अगले विकास के चरण की निर्भरता होती है। जो लोग स्वयं को पहचानें, जो लोग अपने कर्मों का ईमानदारी से मूल्यांकन करें, जो लोग अपनी कमियों को खोजकर अपने अंदर सुधार करें, जो लोग हर कीमत चुकाकर अपने "कच्चे लोहे" को "स्टील" बनाने का काम करें, जिन लोगों की यह स्थिति हो कि वे अहंकार, घमंड, लालच, जलन, गुस्सा और बदले की भावना जैसे नकारात्मक भावों का कभी शिकार न बनें, जो कि व्यक्तित्व के विकास में एक घातक बाधा की तरह होते हैं। संक्षेप में, जो लोग लगातार अपने ऊपर आत्म-शुद्धि (purification) की प्रक्रिया जारी रखें, वही लोग होते हैं जो ईश्वर की कृपा से सत्य को खोजते हैं और उसे पूरी तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं। "तज़किया" शब्द का शाब्दिक अर्थ है, पवित्र करना (purification)। यह हर इंसान की ज़रूरी आवश्यकता है। यह हर इंसान की समस्या है कि वह अपने माहौल का असर लेता है, जिसे मानसिक जकड़न (conditioning of mind) कहा जाता है। अपनी भावनाओं और इच्छाओं के अनुसार, उसकी कुछ आदतें

प्रक्रिया को अपनाता है। यही तज़किया की अनिवार्य शर्त है। इसके बिना किसी का वास्तविक तज़किया नहीं हो सकता— कठोर आत्म-सुधार के बिना तज़किया नहीं, और तज़किया के बिना जन्नत नहीं। जो लोग स्वयं को इन चरणों से गुज़ारें और अपनी तैयारी के नतीजे में सत्य को प्राप्त करें, उन्हें ही कुरआन में "अन-नफ़्स अल-मुतमइनना" (अल-फ़ज्र: 27) कहा गया है। ये वे लोग हैं जो ईश्वर की सृजनात्मक योजना से संतुष्ट हुए, जिन्होंने ख़ुद को इस योजना में ढालकर अपने अंदर वांछित व्यक्तित्व का निर्माण किया। यही वे लोग हैं जो ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करेंगे और ईश्वर की कृपा से जन्नत के अनंत बागों में बसाए जाएँगे। सब कुछ ईश्वर का उपहार अरब में जब तेल की दौलत आई, तो वहां अचानक जीवन का नक्शा बदल गया। एक अरब शेख, जो पहले एक साधारण तंबू में रहता था और जिसकी पूरी जिंदगी ऊंट पर निर्भर थी, अचानक तेल की दौलत से ख़ुशहाल हो गया। उसके एक दोस्त ने स्विट्जरलैंड में उसके लिए आधुनिक शैली का एक शानदार मकान खरीदा। जब वह अरब शेख जहाज़ से सफर करके वहां पहुंचा और अपने खूबसूरत मकान को देखा, तो उसे यक़ीन ही नहीं हुआ कि यह मकान उसी का

आर वह उसी का है, तो वह खुशी के आंसुओं के साथ सजदे में गिर पड़ा और काफी देर तक इसी हालत में रहा। यह जो अनुभव एक अरब शेख ने किया, वैसा ही अनुभव हर इंसान को एक बड़े पैमाने पर करना चाहिए। क्योंकि इस दुनिया के रूप में हर इंसान को वही मिला हुआ है, जो उस अरब शेख को स्विट्जरलैंड के मकान के रूप में मिला। स्विट्जरलैंड का मकान उस अरब शेख के लिए जितना अद्भुत था, उससे अनगिनत गुना ज्यादा अद्भुत यह सृष्टि है, जो हर इंसान को बिना किसी कीमत के हर पल मिल रही है। हर इंसान का मामला, बढ़े हुए स्वरूप के साथ, उसी अरब शेख के मामले जैसा है। सच तो यह है कि हर इंसान पूरी तरह से एक असहाय और वंचित प्राणी है। फिर उसे इस दुनिया के रूप में सब कुछ दिया गया है। प्रकृति अपने समस्त खजानों के साथ जीवनभर उसकी सेवा में लगी रहती है। इंसान का जन्म होना ही अपने आप में एक चमत्कार है। यदि इंसान इस पर विचार करे, तो वह एक-एक चीज़ पर आश्चर्यचकित हो जाएगा। एक ऐसा प्राणी जो जीवित है, जो देख और सुन सकता है, जो सोचता है और चलता है, जो योजना बनाता है और उसे अपने मनमुताबिक क्रियान्वित करता है। ये सभी इतनी अनूठी विशेषताएं हैं, जो इंसान को मुफ्त में मिली हुई हैं। यदि इंसान इस पर गहराई से सोचे, तो वह कृतज्ञता के भाव में डूब जाएगा।

यदि कोई व्यक्ति इस सच्चाई पर विचार करे, तो वह भी उस अरब शेख की तरह कृतज्ञता के भाव से सजदे में गिर पड़े। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसका कारण यह है कि इंसान दुनिया की चीजों को फॉर ग्रांटेड मान लेता है। वह जानबूझकर या अनजाने में यह समझता है कि जो कुछ है, वह होना ही चाहिए। जो कुछ उसे मिला हुआ है, वह उसे मिलना ही चाहिए। यही वह जगह है, जहां इंसान की इंसान को चाहिए कि वह इस मामले में अपनी चेतना को जागृत करे। बार- बार विचार करके इस सच्चाई को समझे कि वह सिर से पैर तक एक असहाय प्राणी है। उसे जो कुछ मिला है, वह पूरी तरह से ईश्वर की देन है। यदि ईश्वर न दे, तो उसे कुछ भी नहीं मिलेगा। जो चीजें इंसान को अपने आप मिलती हुई प्रतीत होती हैं, उन्हें वह इस तरह ले, जैसे वे हर समय सीधे ईश्वर की ओर से भेजी जा रही हों। वह मिली हुई चीजों को ईश्वर की देन के रूप में पहचानने की कोशिश करे। ईश्वर को वही इंसान प्रिय है, जो अपनी चेतना को इतना जागृत करे कि वह सामान्य रूप से मिलने वाली जीवन की चीजों को ईश्वर की असामान्य कृपा के रूप में देखे। वह सामान्य (Usual) को असामान्य (Unusual) के रूप में समझे। वह परोक्ष (अदृश्य) को प्रत्यक्ष के रूप में अनुभव करे। ऐसे ही लोग हैं, जिन्हें

ठरेंगे कि जन्नत की श्रेष्ठ दुनिया में जगह हासिल कर सकें? यह वह लोग होंगे, जिन्होंने मौत से पहले की अपनी जिंदगी में, विचार और कर्म के स्तर पर, खुद को जन्नत जैसी उच्चस्तरीय दुनिया में रहने के योग्य बनाया होगा। यह एक बड़ी भूल होगी यदि जन्नत की कीमत किसी और चीज को समझ लिया जाए। उदाहरण के लिए, यह मान लेना कि किसी बुजुर्ग का दामन पकड़ने से जन्नत मिल जाएगी; या किसी खास समूह से जुड़ जाना, कुछ औपचारिक कर्म कर लेना, किसी पवित्र स्थान की यात्रा कर लेना, धर्म के नाम पर दिखावा करना, स्टेज पर खड़े होकर हम्द और नात के गीत गाना, औराद और वज़ीफों में व्यस्त रहना, धर्म के नाम पर भव्य इमारतें बनाना, जलसे और जुलूसों का आयोजन करना, इस्लाम को केवल अपने गर्व का विषय बना लेना - इनमें से किसी चीज़ का जन्नत से कोई संबंध नहीं है। ऐसी कोई भी चीज़ किसी इंसान को हरगिज़ जन्नत में नहीं ले जा सकती। जन्नत में केवल वही लोग प्रवेश करेंगे, जो जन्नती व्यक्तित्व लेकर वहां पहुंचेंगे। कुरआन में जन्नती व्यक्तित्व को तज़किया याफ्ता शख्सियत (purified personality) कहा गया है (सूरह ताहा: 76)। जन्नती व्यक्तित्व वही है, जो जन्नत की आवश्यकताओं के अनुरूप एक तैयार शख्सियत (prepared personality) हो। इस व्यक्तित्व की तैयारी इसी दुनिया में होती है।

का पालन करता है। वह हमेशा सच बोलता है। वह किए हुए वादों का पूरा करता है। न तो कोई असफलता उसे निराश करती है और न कोई सफलता उसे अहंकारी बनाती है। यही जन्नती व्यक्तित्व है, और ऐसे ही लोग जन्नत के बागों में स्थान पाएंगे। कुछ आदर्श महिलाएँ इतिहास में कुछ ऐसी महिलाएँ रही हैं, जिन्हें दूसरों के लिए आदर्श माना जा सकता है। इन महिलाओं में से कुछ का संक्षिप्त उल्लेख यहाँ किया जा रहा है। हज़रत हाजरा - हज़रत इस्माईल की माँ इन महिलाओं में से एक हाजरा (इस्माईल की माँ) हैं, जो पैगंबर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की पत्नी थीं। उनका समय लगभग चार हजार साल पहले का है। अल्लाह के आदेश के अनुसार, पैगंबर इब्राहीम ने यह योजना बनाई कि अरब के रेगिस्तान के प्राकृतिक माहौल में एक नई पीढ़ी तैयार की जाए, जो मूर्तिपूजा और उसके प्रभाव से मुक्त हो। इस उद्देश्य के लिए एक महिला की महान कुर्बानी की आवश्यकता थी, और हाजरा (ह. इस्माईल की मां) ने यह कुर्बानी दी। वे मक्का के निर्जन और बंजर रेगिस्तान में अपने बच्चे के साथ बस गईं।

इतिहास इस बात का गवाह देता है कि ऐसा ही हुआ। उनका संतान से एक ऐसी कौम उत्पन्न हुई, जिसे एक पश्चिमी लेखक ने "नायकों की कौम" (A Nation of Heroes) कहा है। इस घटना में सभी महिलाओं के लिए एक महान सबक़ हैः यदि वे अल्लाह पर भरोसा रखकर किसी नेक काम के लिए आगे बढ़ें, तो निश्चित रूप से उन्हें अल्लाह की मदद मिलेगी। नेक काम के लिए दी गई उनकी कुर्बानी कभी व्यर्थ नहीं जाएगी, बल्कि वह हमेशा फलदायी होगी। हज़रत आसिया बिन्ते मुज़ाहिम इसी प्रकार की एक मिसाल आसिया बिन्ते मुज़ाहिम की है। उनका समय लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले का है। उसी समय पैगंबर मूसा (अलैहिससलाम्) का आगमन हुआ। उस समय फिरौन मिस्र का राजा था। फिरौन पैगंबर मूसा का सख्त दुश्मन बन गया। लेकिन फिरौन की पत्नी आसिया बिन्ते मुज़ाहिम, पैगंबर मूसा के तौहीद (एकेश्वरवाद) के संदेश से प्रभावित हुईं और उन पर ईमान इस पर फिरौन बेहद नाराज हुआ और आसिया को मौत की सज़ा देने का हुक्म दिया। आसिया बिन्ते मुज़ाहिम ने मौत को कुबूल कर लिया, लेकिन तौहीद (एकेश्वरवाद) के धर्म को छोड़ने पर राज़ामंद नहीं हुईं। यह उनके लिए एक महान

फ़्रआन आर उसक कमा से छुटकारा द आर मुझ ज़ालिम क़ाम से मुक्ति प्रदान करा" (कुरान, 66:11)

यह दुआ इस्म-ए-आज़म (ईश्वर के सर्वोच्च नाम) के साथ की गई थी, जो उसी समय कबूल कर ली गई। इस घटना से यह सीख मिलती है कि यदि कोई महिला (या पुरुष) आसिया जैसी कुर्बानी का उदाहरण पेश करे, तो उसे इस्म-ए-आज़म के साथ दुआ करने की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) मिलती है और ऐसी दुआ को निश्चित रूप से स्वीकार किया जाता है। हज़रत मरियम, हज़रत मसीह की माँ ऐसी ही एक मिसाल हज़रत मरियम की है, जो पैगंबर हज़रत मसीह (अलैहिस्सलाम) की माँ थीं। उनका समय लगभग ढाई हज़ार साल पहले का है। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी को पूरी तरह से अल्लाह के काम और उसके ज़िक्र व दुआ के लिए समर्पित कर दिया था। इस समर्पण के फलस्वरूप, उन्हें अल्लाह की तरफ़ से यह विशेष इनाम मिला कि उनके लिए ख़ुदाई रिज़क़ (सूरह आले इमरान: 37) आने लगा। 'ख़ुदाई रिज़क़' का क्या मतलब है? यह अल्लाह की तरफ़ से दी जाने वाली आत्मिक खुराक (spiritual food) है। यह दिव्य दृष्टि (Divine Grace) है, जो वह अपने से करीब होने वाले बंदों को देता है। ऐसी महिलाएं (या पुरुष)

(सच्चाई और समर्पण) का सबूत दे, जैसा हज़रत मार्यम न दिया था। हज़रत खदीजा बिन्ते ख़ुवैलिड इसी प्रकार की एक और मिसाल हज़रत खदीजा बिन्ते ख़ुवैलिड (वफ़ात: 620 ईस्वी) की है। वे पैगंबर-ए-इस्लाम की पहली पत्नी थीं। उन्हें यह विशेष दर्जा प्राप्त है कि उन्होंने सबसे पहले पैगंबर-ए-इस्लाम के संदेश को मक्का का दौर पैगंबर-ए-इस्लाम के लिए अत्यधिक कठिनाई और मुसीबत का दौर था। इस पूरी अवधि में, हज़रत खदीजा ने खुले दिल से उनका साथ दिया। पैगंबर-ए-इस्लाम से निकाह के बाद उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी भी किसी शिकायत का इज़हार नहीं किया। वे हर हाल में सब्र और शुक्र की मिसाल बनी रहीं। रिवायत में आता है कि एक दिन हज़रत जिब्राइल उनके घर आए। पैगंबर-ए- इस्लाम ने जिब्राइल को देखा, लेकिन हज़रत खदीजा ने नहीं देखा। पैगंबर-ए- इस्लाम ने उनसे कहा कि यह जिब्राइल हैं, और वे तुम्हें अल्लाह की तरफ़ से सलाम पहुंचाने आए हैं। हज़रत जिब्राइल ने उन्हें यह खुशखबरी दी कि जन्नत में तुम्हारे लिए एक

जो महिला (या पुरुष) हज़रत खदाजा की तरह सब्र और शुक्र का प्रमाण दें, उन पर अल्लाह के फ़रिश्ते उतरेंगे और इसी दुनिया में उन्हें यह बशारत देंगे कि अगले जीवन में उनके लिए जन्नत, यानी खुशियों और सुकून की अनंत दुनिया तैयार है। हज़रत आइशा बिन्ते अबू बक्र इसी प्रकार की एक और मिसाल आइशा बिन्ते अबू बक्र अस्सिद्दीक़ (वफ़ातः 678 ईस्वी) की है। वे पैगंबर-ए-इस्लाम की पत्नी थीं। पैगंबर-ए- इस्लाम की वफ़ात के बाद वे लगभग पचास साल तक जीवित रहीं। इस दौरान उन्होंने इस्लाम की हिकमत और ज्ञानभरे संदेश को लोगों तक पहुँचाना जारी रखा। उस समय लिखित रिकॉर्ड नहीं होते थे, इसलिए वे पैगंबर की शिक्षाओं का एक जीवंत प्रमाण बनी रहीं। इस्लामी शिक्षा की समझ उनमें इतनी गहरी थी कि पैगंबर के साथी भी दूर-दूर से आकर उनसे धर्म का ज्ञान लिया करते थे। हज़रत आइशा की जिंदगी हर महिला के लिए एक बेहतरीन आदर्श है। उन्होंने बहुत ही साधारण और सादा जीवन जिया। सांसारिक चीजों और आर्थिक मामलों में उन्होंने संतोष (क़नाअत) को अपनाया। इसी सादगी ने उन्हें यह मौका दिया कि वे पैगंबर-ए-इस्लाम की संगत से पूरा लाभ उठा सकें। उन्होंने अपना

सकता है, जो हज़रत आइशा इसलाम के प्रारंभिक दौर में बना। मौत: एक अनुस्मारक (Reminder)

मौत मरने वाले के लिए इस दुनिया से एक अंत होता है, लेकिन जीवित लोगों के लिए यह एक याद दिलाने वाला संदेश है। जब कोई मरता है, तो देखने में यह बस एक आवाज़ के खामोश हो जाने जैसा लगता है। मगर उस खामोशी में एक गहरा संदेश छिपा होता है— "जो समय उस पर आया, वही एक दिन हमारे ऊपर भी आएगा। अपने उस समय के लिए हमें तैयार रहना है।"

यह आम बात है कि जब किसी की उम्र का एक साल पूरा होता है, तो उसका जन्मदिन मनाया जाता है। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी ज़िंदगी का एक और साल कम हो गया है और हम अपनी मृत्यु के एक कदम और क़रीब आ गए हैं। वास्तविकता यह है कि हर इंसान की उम्र हर पल घट रही है। हर जन्मदिन यह बताता है कि तुम्हारी ज़िंदगी का एक और साल कम हो गया। मौत, दरअसल, इसी घटती हुई उम्र की अंतिम सीमा है। लोग अपने जन्मदिन को खुशी के मौके के रूप में मनाते हैं, लेकिन अगर हम

यह कि वह अपना तमाम इच्छाओं को अधूरा छोड़कर जाता ही यह इस बात का इशारा है कि यह दुनिया इच्छाओं को पूरा करने की जगह नहीं है। सच्ची और पूरी संतुष्टि केवल अगली दुनिया में ही संभव है। बुद्धिमान वह है, जो इस संकेत को समझे और वर्तमान जीवन को एक तैयारी का चरण मानते हुए खुद को अगली दुनिया के योग्य बनाए। जीवन कर्म का एक चरण है और मृत्यु अल्लाह की अदालत में पेशी का समय। यह हर व्यक्ति के लिए अत्यंत गंभीर मामला है। समझदार वही है, जो इस मामले को समझे और इसे अपनी सबसे बड़ी चिंता (Supreme Concern) बनाए। शुक्र: एक कुर्बानी का अमल शुक्र (कृतज्ञता) सबसे बड़ी इबादत है। यह जन्नत की कीमत है, क्योंकि बिना शुक्र के ईमान अधूरा होता है। अगर दिल में कृतज्ञता नहीं है, तो अल्लाह की सच्ची इबादत मुमकिन नहीं। शुक्र हमें उन ऊँचे आध्यात्मिक एहसासों तक पहुँचने में मदद करता है, जिन्हें कुरआन में "रब्बानियत" (आले इमरान: 79) कहा गया है। इसका मतलब है, अल्लाह से गहरा जुड़ाव और आध्यात्मिक समझ।

सच्चा शुक्र वही महसूस कर सकता है, जो अपन समय, संसाधन, और इच्छाओ को अल्लाह को राज़ी करने के लिए समर्पित करने का हौसला रखता है। यही वह कृतज्ञता है जो अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद है। असल में, इस दुनिया में हर इंसान किसी न किसी रूप में यह महसूस करता है कि उसे कुछ न कुछ कम मिला है। हर किसी के दिल में कहीं न कहीं शिकायतें या नकारात्मक भावनाएँ छिपी रहती हैं। लोग अक्सर दूसरों से असंतुष्ट रहते हैं और नफरत या नाराज़गी के माहौल में जीने लगते हैं। यही वह स्थिति है, जो इंसान के लिए सच्चा शुक्र (कृतज्ञता) करना सबसे ज़्यादा मुश्किल बना देती है। कई बार इंसान ज़ुबान से "शुक्र है" कहता है, लेकिन उसके दिल में कृतज्ञता का सच्चा एहसास नहीं होता। उसका मन शिकायतों से भरा रहता है, और वह अपनी मिली नेमतों को भूल जाता है। ऐसे माहौल में सच्चा शुक्र वही इंसान कर सकता है, जो अपनी सोच को इतना जागरूक बनाए कि नकारात्मक हालात के बावजूद शुक्र करने का जज़्बा रखे। वह नफरत और शिकायतों के अंधेरे में भी उम्मीद और संतोष की रोशनी जलाए रखे। उसे चाहिए कि वह अपने दिल से शिकायतों और नकारात्मकता को एक- एक करके निकालता रहे और अंदर से सच्चे शुक्र की भावना को विकसित करे।

خصوصی شمارہ: اختلاف ایک مثبت ظاہرہ جیت کے ساتھ ہار کو بھی تسلیم کرنا، اپنی رائے کے ساتھ دوسرے کی رائے کا احترام کرنا— یہی سماجی ترقی کا راز ہے۔

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