سادگی کی اہمیت
Al-Risala, July 2025, pp. 50–3
By Maulana Wahiduddin Khan
کہا جاتا ہے کہ زندگی کا بیسٹ فارمولا ہے— سادہ زندگی اور اونچی سوچ: simple living high thinking سادہ زندگی اور اونچی سوچ دونوں کا ایک دوسرے سے نہایت گہرا تعلق ہے۔ جہاں سادہ زندگی ہے وہاں اونچی سوچ ہے، اور جہاں اونچی سوچ ہے وہاں سادہ زندگی ہے۔ دونوں ایک دوسرے کے ساتھ ہم رشتہ (interlinked) ہیں۔ ایک ہے تو دوسرا ہے، ایک نہیں تو دوسرا بھی نہیں۔ سادہ زندگی کا مطلب یہ ہے کہ زندگی کی ضروریات کے معاملے میں انسان بقدر ضرورت پر قناعت کرے، وہ لگژری (luxury) کے بجائے اشیائے ضرورت پر اکتفا کرے۔ غیر ضروری مسائل سے بچ جائے گا۔ وہ ڈسٹریکشن (distraction) سے محفوظ رہے گا۔ سادہ زندگی اور اونچی سوچ دونوں ایک دوسرے کا حصہ ہیں۔ جہاں سادہ زندگی ہوگی، وہاں اونچی سوچ پائی جائے گی، اور جہاں اونچی سوچ ہوگی، وہاں اپنے آپ زندگی میں سادگی اور قناعت پیدا ہو جائے گی۔ اونچی سوچ انسان کے لیے سب سے بڑی چیز ہے۔ لیکن اونچی سوچ کی شرط یہ ہے کہ آدمی سادگی پر قناعت کرے۔ سادگی آدمی کو اس نقصان سے بچاتی ہے کہ وہ اپنے پیسے یا اپنے ذرائع کو غیر ضروری چیزوں میں لگا دے اور پھر وہ مقصد کے حصول میں زیادہ کارگر جدوجہد نہ کر سکے۔ آدمی سادگی پر قناعت نہیں کرے گا، وہ غیر ضروری تکلفات میں پھنسار ہے گا۔ وہ ہمیشہ کے لیے اونچی سوچ سے محروم ہو جائے گا۔
زندگی کا لمحہ ایک محدود لمحہ ہے۔ انسان کو چاہیے کہ وہ اس محدود لمحہ کو بھر پور طور پر استعمال اس دنیا میں زندگی کسی کو صرف ایک بار ملتی ہے۔ یہ آدمی کے اوپر ہے کہ وہ چاہے تو وقت کو استعمال کرے، یاوہ اس کو کھودے۔ یہ ایک حقیقت ہے کہ کسی مرد یا عورت کے پاس جوسب سے زیادہ قیمتی سرمایہ ہے، وہ وقت ہے، اور وقت کا معاملہ یہ ہے کہ وہ کسی آدمی کو صرف ایک بار ملتا کسی نے درست طور پر کہا ہے: گیا وقت پھر ہاتھ آتا نہیں۔
सहाबा को नसीहत करते हुए फ़रमाया: "जो तुम्हे मिला, वह कभी तुमसे खान वाला नहीं था; और जो तुमसे खो गया, वह कभी तुम्हें मिलने वाला नहीं था।" (मुसनद अहमद, हदीस संख्या 21589)। इस हदीस पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि मौजूदा दुनिया में किसी इंसान को जो कुछ मिलता है, वह न तो इत्तेफ़ाक़न (संयोगवश) मिलता है और न ही इनाम के तौर परा इस दुनिया में जो कुछ इंसान को मिलता है, वह केवल इम्तिहान के पेपर के तौर पर मिलता है। ख़ुदा के फ़ैसले के तहत, हर औरत और मर्द को कुछ चीजें दी जाती हैं, ताकि उनमें आज़माकर देखा जाए कि इंसान का रवैया कैसा है। कभी ख़ुदा कोई चीज़ देकर इम्तिहान लेता है कि इंसान ने उस पर शुक्र किया या उसे पाकर घमंड में पड़ गया। इसी तरह कभी कोई चीज़ छीनकर ख़ुदा इंसान का इम्तिहान लेता है कि उससे महरूम होकर उसने सब्र किया या शिकायत की मानसिकता में फँस गया। यह ख़ुदा का तख़्लीकी नक्शा है। ऐसी स्थिति में इंसान की नज़र इस पर नहीं होनी चाहिए कि उसने क्या पाया और उससे क्या छीना गया। इसके बजाय उसका सारा ध्यान इस पर होना चाहिए कि जिन हालात में रखकर ख़ुदा ने उसका इम्तिहान लेना चाहा था, उसमें उसने मुनासिब (उपयुक्त) प्रतिक्रिया दिया या वह मुनासिब प्रतिक्रिया देने में नाकाम हो गया। यह ज़िंदगी का सकारात्मक नज़रिया है, और यह ज़िंदगी का सकारात्मक
उलझकर रह जाए और वह अपनी आख़िरी माज़ल तक न पहुँच सका। आत्महत्या: सबसे बड़ा पागलपन आत्महत्या सबसे बड़ा पागलपन है, क्योंकि यह वह कार्य है जो व्यक्ति तब करता है जब वह सबसे अधिक शक्ति के साथ कुछ करने की स्थिति में होता है। सच्चाई यह है कि आत्महत्या करना किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यंत कठिन काम है। सामान्य स्थिति में, कोई भी व्यक्ति खुद को मारने के लिए तैयार नहीं होता। तो फिर कोई आत्महत्या जैसा चरम कदम क्यों उठाता है? जब किसी इंसान को कोई बड़ा या दुखद झटका लगता है, तो उसका दिमाग अंदर जमा हुई ताकत या ऊर्जा को अपने आप बाहर निकाल देता है। इसके फलस्वरूप उस समय व्यक्ति की शक्ति बढ़ जाती है। यह बढ़ी हुई शक्ति इसलिए होती है कि व्यक्ति आने वाली समस्या का अधिक ताकत के साथ सामना कर सके, लेकिन वह इस ऊर्जा का गलत उपयोग करके आत्महत्या कर लेता है। यही कारण है कि जो लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं लेकिन किसी कारण से जीवित बच जाते हैं, वे अपनी बाद की जिंदगी में और भी बड़े काम करने में सक्षम हो जाते हैं। आत्महत्या के प्रयास का अनुभव उन्हें जानबूझकर या अनजाने में अपनी छिपी हुई शक्ति से परिचित कराता है। इसलिए, मौत से बचने
प्रकृति के नियम के अनुसार, इंसानी दिमाग में हमेशा सुरक्षित शक्ति मौजूद रहती है, जो किसी कठिन परिस्थिति के समय स्वचलित (automatic) रूप से छोड़ दी जाती है। यह वैसे ही है जैसे नदी में पानी की कमी होने पर बांध को खोलकर अतिरिक्त पानी छोड़ा जाता है। सच्चाई यह है कि यदि मनुष्य प्रकृति के नियमों को समझे, तो वह कई मूर्खताओं और असफलताओं से बच सकता है।