Al-Risala · July 2025

जीवन के उस पार

Al-Risala, July 2025, pp. 8–17

By Maulana Wahiduddin Khan

इंसान के पास खाने के लिए मुँह है, लेकिन अगर बाहर भाजन का सामान न हो, तो वह खाने की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। अब एक ऐसे समय की कल्पना कीजिए, जब आप पूरी तरह से अपने इस अस्तित्व के साथ जीवित होंगे, लेकिन वहां आपकी जरूरत के सभी बाहरी साधन आपसे छिन चुके होंगे। आपके पास आँखें होंगी, लेकिन देखने के लिए बाहरी रोशनी मौजूद नहीं होगी। आपके पास मुँह होगा, लेकिन खाने की चीजें वहाँ से गायब हो चुकी होंगी। आपके पास पैर होंगे, लेकिन वहाँ संतुलित गुरुत्वाकर्षण वाली ज़मीन आपके पैरों के नीचे मौजूद नहीं होगी। और साथ ही, आप अकेले होंगे, आपके सभी अपने लोग आपका साथ छोड़ चुके होंगे। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। यही स्थिति हर महिला और पुरुष के साथ मौत के बाद सामने आएगी, और मौत हर महिला और पुरुष पर जरूर आनी है। जो भी व्यक्ति आज जीवित है, वह एक दिन मर जाएगा। और फिर मौत के बाद, वह अपने आप को जिस दुनिया में पाएगा, वह वही दुनिया होगी जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। यह आने वाला दिन हर किसी के लिए तेजी से नजदीक आ रहा है। हर महिला और पुरुष की पहली आवश्यकता यह है कि वह इस आने वाले दिन को समझे और इसके लिए तैयारी करे। वह दिन जब आएगा, तो वह "पॉइंट ऑफ नो रिटर्न" (point of no return) पर आएगा। इसके बाद आदमी को केवल भुगतना होगा, उस दिन के लिए तैयारी का अवसर उसे पुनः प्राप्त नहीं होगा।

तक बढ़ा चुका हो। हर कोई अपनी इच्छाओं का अनंत रूप से पूरा करना चाहता है। हर व्यक्ति चाहता है कि वह आराम और सुख की सारी चीजें अपने लिए और अपने बच्चों के लिए जमा कर ले। यह सांसारिक मोह की ओर एक पागल दौड़ है, लेकिन इसका परिणाम क्या निकल रहा है? हर व्यक्ति इस एहसास में जीता है कि उसकी इच्छाएं पूरी नहीं हुईं। जो संतोष वह चाहता था, वह उसे नहीं मिल सका। हर महिला और पुरुष इसी हताशा के एहसास में जीते हैं। इस स्थिति में उनका दिन और रात बीतता रहता है, जब तक कि उनकी इच्छाओं का घरोंदा कुछ स्थितियों के तूफान से टकराकर बिखर नहीं जाता। और यदि स्थितियां उसे न तोड़ें, तो मौत अपने समय पर आती है और हर किसी को मजबूर करती है कि वह मौत के निर्दयी फैसले को स्वीकार करे, जैसे दुनिया में पहले आने वाले सभी लोग इस फैसले को मजबूरी में स्वीकार कर चुके हैं। लोग मौत से पहले के अस्थायी जीवन के लिए प्रबंध करने में व्यस्त हैं, जबकि असली आवश्यकता यह है कि मौत के बाद के सदैव के जीवन के लिए खुद को तैयार किया जाए। मौत से पहले का जीवन एक परीक्षा का जीवन है। इस आधार पर यह अल्लाह की जिम्मेदारी है कि वह हर एक को वह सामान प्रदान करे, जिससे वह अपनी परीक्षा दे सके। लेकिन जहां तक मौत के बाद के जीवन का सवाल है, उसकी ज़िम्मेदारी अल्लाह ने नहीं ली है। मौत के बाद का जीवन पूरी तरह से आदमी के अपने कार्यों पर निर्भर करता है। वर्तमान जीवन का सिद्धांत यह है कि कुछ भी न करो, फिर भी तुम्हें ज़रूरत भर

कि वह अपन अतात का काम्या का फिर से भरपाई कर सका। हर तरफ़ बेखौफ़ी बहुत कम लोग ऐसे हैं जो यह मानते हों कि उनकी ज़िन्दगी सिर्फ मौत पर खत्म हो जाएगी और मौत के बाद उन्हें फिर से ज़िन्दगी नहीं मिलेगी। अधिकांश लोग, लगभग 99%, यह मानते हैं कि मौत हमारे जीवन का अंत नहीं है, बल्कि मौत के बाद भी जीवन है जो कि अनंतकाल तक रहेगा। इस विश्वास के बावजूद लगभग सभी लोग अगले जीवन के बारे में बेखौफ़ हैं। विश्वास के रूप में वे अगले जीवन को मानते हैं, लेकिन उनके व्यावहारिक जीवन में इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता। यह बेखौफ़ी इतनी आम है कि इसमें बहुत कम अपवाद पाया जा सकता है। इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति ने जीवन के बाद मौत के विश्वास के साथ एक और विश्वास अपना लिया है जो जीवन के बाद मौत के विचार को उसके लिए एक ऐसा विचार बना देता है जो सिर्फ एक पारंपरिक विश्वास से अधिक कुछ नहीं होता। यहूदी धर्म से संबंधित लोग जीवन के बाद मौत के विश्वास को मानते हैं, लेकिन इसी के साथ-साथ उनका यह विश्वास भी है कि यहूदी कौम, अल्लाह की विशेष

किया हो अब प्रत्येक मसाहा की मुक्ति निश्चित हा इस विश्वास न मसाहा लागा को भी परलोक के बारे में बेखौफ़ बना दिया है। इस मामले में ठीक यही स्थिति मुसलमानों की भी है। बेशक सभी मुसलमान, जीवन के बाद मौत के विश्वास को मानते हैं। वे जन्नत और जहन्नम पर विश्वास रखते हैं। लेकिन गहराई से देखा जाए तो आज के लगभग सभी मुसलमान, आखिरत के बारे में बेखौफ हैं, उन्हें अपनी जहन्नम में जाने का कोई डर नहीं है। इसका कारण फिर से यही है कि उन्होंने अपने आप ऐसे काल्पनिक विश्वास बना लिए हैं जिसके अनुसार, उन्हें अपनी आख़िरत की मुक्ति पूरी तरह सुनिश्चित उदाहरण के तौर पर, सभी मुसलमान, सचेत या अचेतन रूप से यह मानते हैं कि मुसलमान एक विशेष समूह होते हैं। जो कोई भी मुस्लिम परिवार में जन्म लेता है, उसकी जन्नत सुनिश्चित होती है। यह विश्वास निस्संदेह एक स्वयं-निर्मित विश्वास है। इसका कुरआन और हदीस से कोई संबंध नहीं है। लेकिन यह इतना सामान्य है कि यह सभी मुसलमानों के दिमाग में बसा हुआ है, चाहे वे मुस्लिम विद्वान हों या आम लोग, अमीर हों या गरीब, विशेष वर्ग से हों या आम जनता से, सभी इसे एक स्थापित सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। आखिरत का विश्वास इंसान को बुराई से रोकने के लिए एक शक्तिशाली प्रेरक शक्ति होता है, लेकिन जब इस विश्वास के साथ ऊपर वर्णित स्वयं-निर्मित विश्वास

तुम पर ऐसा दिन आएगा जिसका अज़ाब (दंड) सबका अपन घर म ले लेगा।" (सूरह हूद, 11:84)

यह पैग़ाम हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम का था, जो उन्होंने लगभग साढ़े तीन हज़ार साल पहले मद्यन की क़ौम को दिया। मद्यन, प्राचीन अरब में बहर-ए-अहमर (Red Sea) के किनारे बसा हुआ एक शहर था। हज़रत इब्राहिम (1985-2160 क़बल मसीह) की बीवी क़तूरा से उनके एक बेटे पैदा हुए जिनका नाम मद्यन था। उन्हीं की संतान यहाँ आबाद हुई, और उन्हीं के नाम पर इस शहर को "मद्यन" कहा गया। इन्हीं में हज़रत इब्राहिम के लगभग 5 सौ साल बाद हज़रत शुऐब पैदा हुए। उस समय तक मद्यन की क़ौम में काफी बिगाड़ आ चुका था। अल्लाह तआला ने हज़रत शुऐब को नबूवत अता की और उन्हें हुक्म दिया कि वे हज़रत इब्राहिम की इस बिगड़ी हुई औलाद को हक़ का पैग़ाम सुनाएँ। अब यह सवाल पैदा होता है कि मद्यन की क़ौम में कौन सी बुराई थी जिस की वजह से उन्हें यह चेतावनी दी गई कि "अपने आज के अच्छे हालात पर मत इतराओ, आने वाले समय में सख़्त अज़ाब आ सकता है"? क़ुरआन के मुताबिक़, उनकी बुनियादी बुराई यह थी कि वे नाप-तौल में धोखाधड़ी करते थे, यानी जब खुद कुछ लेते तो पूरा-पूरा लेते और जब दूसरों को देते तो उसमें कमी कर देते। (7:85)

घटा दत हो क्या उन्हें यह मालूम नहीं कि एक दिन ऐसा आएगा जब उन्हें उठाकर (हिसाब के लिए) लाया जाएगा? उस दिन जब सारे लोग अल्लाह, मालिक-ए-कायनात के सामने खड़े होंगे?" (83:1-6) “अपने लिए भरपूर लेना और दूसरों को देने में कमी करना" - एक वो है जो दुकानदारों के यहाँ मिलता है। जो दुकानदार खुद के लिए तो नाप और तौल में ज़्यादा लेने की कोशिश करता है, लेकिन जब किसी ग्राहक को कुछ देना होता है, तो किसी न किसी बहाने उसे कम देने की कोशिश करता है – जैसे नाप- तौल में गड़बड़ी करना, मिलावट करना या घटिया चीज़ देना – तो ऐसा इंसान अल्लाह के नज़दीक मलऊन (शापित) है और उसकी पूरी कमाई हराम की है। चाहे वह दुनिया में कितना ही मुनाफ़ा कमा ले, लेकिन आख़िरत के दिन वह सबसे बड़े घाटे में होगा। लेकिन यह सोच केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह एक ज़ेहनी रवैया है, जो इंसानी ताल्लुक़ात (रिश्तों) के हर पहलू पर लागू होता है। साहिब-ए-रूहुल मआनी (प्रसिद्ध व्याख्याकार) लिखते हैं:

"जो अहले-इल्म (विद्वान) अपने समकालीन विद्वानों के आदर सम्मान का हक़ अदा नहीं करते, वे भी इस आयत के दायरे में आते हैं।"

ایک ہوائی ماٹر کا پردشن کیا گیا تھا۔ اسکا وشیشتا یہ تھا کہ وہ زمین پر دوڑ بھی سکتی تھی اور ہوا میں ساٹھ میل پرتی گھنٹے کی رفتار سے اُڑ بھی سکتی تھی۔

جب ایک یوا سادھو، پردشنی کے وبھنن ادھت اور رنگین نظاروں کو دیکھتے ہوئے امریکی پویلین کے پاس پہنچا اور اسنے اس جادئی گاڑی کو اڑتے اور دوڑتے ہوئے دیکھا، تو اسکے من میں ایک نیا سوال پیدا ہو گیا—"کیا میں تیاگ اور بلیدان کی زندگی چھوڑکر بھوتک وکاس کی دنیا میں اپنے جذبات کے لیے سکون تلاش کروں؟

گےء کپڑوں میں لپٹا ہوا اور لمبے بکھرے بالوں والا یہ بھارتی یوبک بیس منٹ تک اس امریکی موٹر کو دیکھتا رہا، جسے پردشنی کے ذمہ داروں نے "بھویشی کی کار" کا نام دیا تھا۔

جب اسسے اس بارے میں رائے پوچھی گئی، تو اسنے گہرے اثر کے ساتھ جواب دیا: "اسنے مجھے اس سوچ میں ڈال دیا ہے کہ دونوں دنیاؤں میں سے وہ کون- سی دنیا ہے، جسے میں اپنے لیے بہتر سمجھوں" (ہندوستان ٹائیمس، اسی طرح کی ایک اور گھٹنا پڑھیے:

और बीमार माँ, जिन्हे दिल्ली लाने वाला ये उम्मीद था कि उसका दामाद यहाँ रिक्शा चलाकर अपना रोज़गार कर रहा है। ज़ाहिर है कि रिक्शा चलाने वाला एक आदमी दो परिवारों का गुज़ारा कैसे कर सकता था। शरीफ़ को रोज़गार तलाशना पड़ा। शुरू में कुछ दिन वह एक मामूली होटल में बर्तन धोने का काम करता रहा। इसके बाद एक संपन्न मुस्लिम परिवार में उसे घरेलू कामों के लिए पचास रुपये माहवार पर जगह मिल गई। शरीफ़ एक अत्यंत ग़रीब परिवार का लड़का था। इस दुनिया में आँख खोलने के बाद उसे जो बिस्तर मिला वह ज़मीन पर बिछा हुआ एक टाट था। अब तक की ज़िंदगी उसने इस तरह गुज़ारी कि न तो कभी उसके पैरों में जूता पड़ा और न ही उसके शरीर पर कभी पूरा कपड़ा आया। सर्दियों की रातों का मतलब उसके लिए बस इतना था कि लकड़ी के टुकड़े और सूखी पत्तियाँ जमा करके कुछ देर आग और धुएँ के सहारे गुज़ारा किया जाए, और फिर एक फटा हुआ टाट नीचे बिछा लिया जाए और दूसरा फटा हुआ टाट ऊपर ओढ़ लिया जाए। दिसंबर की एक सुबह की बात है, जब शरीफ़ मकान मालकिन का बिस्तर समेट रहा था। अचानक एक ख़याल उसके ज़हन में रेंगा। मसहरी पर बिछा हुआ मोटा और मुलायम गद्दा, उसके ऊपर सुंदर चादर और मखमली कपड़े से बना हुआ शानदार लिहाफ़ – इन चीज़ों ने उसे थोड़ी देर के लिए स्तब्ध कर दिया। “आपा,” वह मालकिन की बेटी से बोला, “क्या अल्लाह मियाँ के यहाँ ऐसा बिस्तर होगा?”

म डूबा हुआ नज़र आता है — छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, पढ़-लिख हों या अनपढ़ — सभी लोग दुनिया की चमक-दमक पर टूटे पड़ते हैं। लज़्ज़त, दौलत, शोहरत, इज़्ज़त, रुतबा, इख़्तियार — यानी दुनिया की चीज़ों में से अगर किसी एक का छोटा-सा हिस्सा भी किसी के सामने आ जाए, तो वह उसकी ओर ऐसे दौड़ता है... मानो बिना बोले वो ये कह रहा हो कि — “अल्लाह के यहाँ भला ऐसी शानदार चीज़ें कहाँ मिलेंगी! तो फिर क्यों न इस दुनिया में जो कुछ भी हासिल हो सकता है, उसे ही हासिल कर लिया जाए।”

सबसे ज़्यादा अजीब बात यह है कि इस मामले में धार्मिक लोगों का हाल भी वही है जो अन्य दुनियादारों का है। आज के दौर में जो दुनियावी संभावनाएँ उनके लिए खुली हैं, उनकी तरफ़ दौड़ने में वे भी दूसरों से एक क़दम भी पीछे पदों और ओहदों की धूम, सदर और नाज़िम के सम्मान, जलसों और जुलूसों की दिखावट, अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंसों के लिए हवाई सफ़र, भाषण और स्वागत के तमाशे, अख़बारों की सुर्खियों में छपने की चाह और इसी तरह की दूसरी चीज़ों का शौक़ — उन्हें भी उतना ही है जितना किसी आम दुनियादार को हो

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