مٹھاس کا اضافہ
Al-Risala, September 2025, pp. 50–52
By Maulana Wahiduddin Khan
ٹائمس آف انڈیا کے ضمیمہ (The Neighborhood Star) بابت 24-18 مارچ 1989 (صفحہ 6) پر ایک سبق آموز واقعہ شائع ہوا ہے۔ ایران کے پارسی جب پہلی بار ہندوستان میں آئے تو وہ ہندوستان کے مغربی ساحل پر اترے۔ اس وقت یا دورانا گجرات کا راجہ تھا۔ پارسی جماعت کا پیشوا راجہ سے ملا اور اس سے یہ درخواست کی کہ وہ ان لوگوں کو اپنی ریاست میں ٹھہرنے کی اجازت راجہ نے اس کے جواب میں دودھ سے بھرا ہوا ایک گلاس پارسی پیشوا کے ہاتھ پر رکھ دیا۔ مطلب یہ تھا کہ ہماری ریاست پہلے ہی سے آدمیوں سے بھری ہوئی ہے۔ اس میں مزید لوگوں کو ٹھہرانے کی گنجائش نہیں۔
پارسی پیشوا نے لفظوں میں اس کا کوئی جواب نہیں دیا۔ اس نے صرف یہ کیا کہ ایک چمچہ شکر لے کر دودھ میں ملایا اور گلاس کو راجہ کی طرف لوٹا دیا۔ یہ اشاراتی زبان میں اس بات کا اظہار تھا کہ ہم لوگ آپ کے دودھ پر قبضہ کرنے کے بجائے اس کو میٹھا بنائیں گے، ہم آپ کی ریاست کی زندگی میں شیرینی کا اضافہ کریں گے۔ اس کے بعد راجہ نے انھیں گجرات میں قیام کی اجازت دیدی۔
اس واقعہ پر اب ایک ہزار سال کی مدت گزر چکی ہے۔ تاریخ بتاتی ہے کہ پارسیوں کے رہنما نے جو بات کہی تھی اس کو پارسی قوم نے پورا کر دکھایا۔ پارسی اس ملک میں مطالبہ اور احتجاج اور ایجی ٹیشن کا جھنڈا لے کر کھڑے نہیں ہوئے بلکہ انھوں نے اپنی خاموش محنت سے اس ملک کی ترقی میں اضافہ پارسیوں نے دوسروں سے زیادہ محنت کی۔ وہ تعلیم اور تجارت اور صنعت میں آگے بڑھے۔ نے ملک کی دولت اور ملک کی ترقی کو بڑھایا۔ اس ملک میں جہاں بہت سے لوگ لینے والے گروہ (taker group) کی حیثیت رکھتے ہیں، پارسیوں نے عمل کے ذریعہ اپنے لیے دینے والے گروہ (giver group) کا درجہ حاصل کیا ہے۔ یہی زندگی کا راز ہے۔ اس دنیا میں دینے والا پاتا ہے۔ یہاں اس آدمی کو باعزت جگہ ملتی ہے جو لوگوں کے ”دودھ“ میں اپنی طرف سے ”مٹھاس“ کا اضافہ اس کے برعکس، جن لوگوں کے پاس دوسروں کو دینے کے لیے صرف کڑوا پن ہو، انھیں بھی اس دنیا میں وہی چیز ملتی ہے جو انھوں نے دوسروں کو دی ہے۔ (الرسالہ، جنوری 1989)
कुरआन में इस लागा का छांव इन शब्दा म प्रस्तुत का गई ह:
اَلَّذِیۡنَ یُؤۡتُوۡنَ مَاۤ اٰتَوۡا وَّ قُلُوۡبُہُمۡ وَجِلَۃٌ اَنَّہُمۡ اِلٰی رَبِّہِمۡ رَاجِعُوۡنَ "वे लोग जो देते हैं, और उनका दिल कांपता है, क्योंकि वे जानते हैं कि उन्हें अपने रब की ओर लौटना है।" (मुमिनून जो व्यक्ति इस अर्थ में परहेज़गार होता है, उसका हाल यह होगा कि जब वो कोई अच्छा कर्म करेगा तो उसे गर्व महसूस नहीं होगा। वो अच्छे से अच्छा कर्म करेगा फिर भी वह उसे बहुत छोटा कर्म समझेगा और उसे अपर्याप्त मानेगा। वह अपने कर्म को इतना तुच्छ समझेगा कि अगर अल्लाह उसे स्वीकार कर लेता है, तो यह अल्लाह की कृपा है। उसकी सोच यह होगी कि यह मामला यहीं समाप्त नहीं होता, बल्कि उसकी अंतिम उपस्थिति अल्लाह के पास होगी। अल्लाह ही है जो अगर उसके कार्य को मूल्यवान मानते हैं तो उसका कार्य मूल्यवान है, अन्यथा उसका कार्य कोई महत्व नहीं रखता। ऐसे व्यक्ति का हाल यह होता है कि एक ओर वह अच्छा कार्य कर रहा होता है, और दूसरी ओर, उसकी आँखों से विनम्रता के आँसू बह रहे होते हैं। सच्चाई यह है कि यही विनम्रता का अहसास किसी कार्य को स्वीकार्य बनाता है। जिस कार्य में विनम्रता की भावना नहीं होती, वह कार्य कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। अल्लाह की दृष्टि में मात्रा का महत्व नहीं है, बल्कि गुणवत्ता का महत्व है। अल्लाह किसी व्यक्ति के कार्य को उसकी बाहरी स्थिति के आधार पर नहीं
ख़ास गुण किसी भी व्यक्ति की सम्भावित क्षमता (potential) को वास्तविक क्षमता (actual) में परिवर्तित करने का नाम है। हर व्यक्ति प्राकृतिक रूप से अपने भीतर कोई न कोई अतिरिक्त योग्यता (additional quality) लेकर जन्म लेता है। अपनी इस विशेष योग्यता को पहचानिए और विशेष परिश्रम के माध्यम से इसे विकसित कीजिए। इसके बाद आप एक ख़ास क्षमता के मालिक बन जाएँगे। और जो व्यक्ति किसी ख़ास योग्यता का मालिक होता है, वह स्वतः ही समाज में मान्यता प्राप्त कर लेता है। वास्तविकता यह है कि जन्म से ही प्रत्येक व्यक्ति का एक ख़ास व्यक्तित्व होता है। लेकिन यह ख़ास व्यक्तित्व हमेशा संभावित होती है। इसे वास्तविक बनाना स्वयं व्यक्ति का कार्य है। प्रत्येक स्त्री और पुरुष को चाहिए कि वह अपनी प्राकृतिक संभावनाओं को पहचानने और अपनी समस्त ऊर्जा लगाकर इस संभावना को वास्तविकता में परिवर्तित करे। इसी प्रक्रिया में किसी व्यक्ति की ख़ास सफलता का रहस्य छिपा हुआ है। इसी कार्य में असफल होना असफलता कहलाता है, और इसी कार्य में सफल होना