Al-Risala · September 2025

याद दिलाने वाली मौत

Al-Risala, September 2025, pp. 56–2

By Maulana Wahiduddin Khan

नसीर अहमद खान बनारसी गुडवर्ड बुक्स और अल-रिसाला बुक सेंटर के एक सदस्य थे। 16 मार्च 2008 को दिल्ली में उनका निधन हो गया। निधन के समय उनकी उम्र लगभग 50 वर्ष थी। उस समय वे पूरी तरह स्वस्थ थे। ज़ाहिर तौर पर मृत्यु के कोई संकेत नहीं थे, लेकिन 16 मार्च को उनके साथ एक हादसा पेश आया और अचानक उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु दो प्रकार की होती है— एक अपेक्षित मृत्यु (expected death) और दूसरी अनपेक्षित मृत्यु (unexpected death)।

खतरनाक वृद्धि हो रहा हो इस प्रक्रिया के कारण जो साचित ऊर्जा (pent-up energy) बाहर निकलेगी, उससे धरती पर भयावह भूकंप आएंगे:

"A new study has indicated that melting ice sheets can release pent-up energy and trigger massive earthquakes. According to a report in National Geographic News, as a result of global warming, ice sheets are melting worldwide, which is triggering off earthquakes. For the study, the researchers had taken into account a series of large earthquakes that had shook Scandinavia around 10,000 years ago, along faults that are now quiet." (p. 24) ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से पृथ्वी के हिमखंड (glaciers) बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे विनाशकारी भूकंप आ सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप धरती पर भूकंपों की एक श्रृंखला शुरू हो जाएगी, जैसा कि स्कैंडिनेविया (Scandinavia) क्षेत्र में 10,000 वर्ष पहले हुआ था। ग्लोबल वार्मिंग और उसके विभिन्न पहलुओं पर व्यापक अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर पहाड़ों के समान विशाल हिमखंड (glaciers) हैं। इन हिमखंडों के नीचे बड़े-बड़े ज्वालामुखी (volcanoes) दबे हुए हैं। ये ज्वालामुखी अपने भीतर भारी मात्रा में संचित ऊर्जा (pent-up energy) रखते हैं। इन पर जमी बर्फ एक प्राकृतिक ढक्कन की तरह थी, जो इस ज्वालामुखी को फटने से रोक रही थी। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ये बर्फीले ढक्कन बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं। उनकी बर्फ पिघलकर समुद्रों में मिल रही है। इस स्थिति से

इसका व्यावहारिक व्यवस्था इस प्रकार निर्धारित का गई ह कि यह इंसान के पूर जीवन को सकारात्मक रूप से संवारने का ज़रिया बन जाती है। एक दृष्टिकोण से, नमाज़ रब्बानी (ईश्वरीय) प्रशिक्षण है, और दूसरे दृष्टिकोण से यह दुनिया में एक संपूर्ण मानसिक विकास का कोर्स है। नमाज़ की शुरुआत वुज़ू से होती है, जो एक प्रकार से छोटा स्नान (गुस्ल-ए- ज़गीर) है। यह इंसान की पवित्रता (ततहीर) का एक स्थायी साधन है। इसके बाद नमाज़ का पहला कलिमा अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) होता है। अज़ान और नमाज़ मिलाकर यह वाक्य प्रतिदिन लगभग तीन सौ बार दोहराया जाता है। अल्लाहु अकबर का एक और अर्थ यह है कि मैं बड़ा नहीं हूँ। इस प्रकार, नमाज़ इंसान के अंदर विनम्रता (तवाज़ु`) को विकसित करती है, जो निस्संदेह वर्तमान दुनिया में सबसे अधिक मूल्यवान गुणों में से एक है। नमाज़ को दिन और रात में पाँच निश्चित समयों पर अदा करने का आदेश दिया गया है। यह समय प्रबंधन (टाइम मैनेजमेंट) की शिक्षा देता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि इंसान के पास सबसे मूल्यवान चीज़ समय है। समय का सुनियोजित उपयोग हर प्रकार की उन्नति के लिए एक अनिवार्य शर्त है, और नमाज़ इंसान को इसी समय अनुशासन के लिए तैयार करती है। नमाज़ को जमाअत (समूह) में अदा करने का आदेश दिया गया है, जो एकता (इत्तेहाद) की बेहतरीन तालीम है। जमाअत के दौरान एक व्यक्ति इमाम के रूप में आगे खड़ा होता है और बाक़ी सभी लोग पंक्ति बनाकर उसके पीछे खड़े

personality) पैदा करता है, जो किसी भी महिला या पुरुष के लिए आत्म- हत्या से कम नहीं। जहां सामान्य आत्म-हत्या शारीरिक (physical suicide) होती है, वहीं नकारात्मक सोच निःसंदेह मानसिक आत्म-हत्या (psychological suicide) है। अगर इस बारे में लोगों से पूछताछ की जाए, तो यह बात सामने आती है कि उनकी शिकायतें अक्सर किसी ऐसी घटना पर आधारित होती हैं, जिनका संबंध भूतकाल से है। लोगों की यह आदत विनाशकारी होती है कि जब भी उनके साथ कोई अप्रिय घटना घटती है, तो वे इसे दूसरों के साथ साझा करते हैं और हमेशा इसे अपनी स्मृति (memory) में जीवित रखते हैं। यही आदत उनके अंदर नकारात्मक व्यक्तित्व के निर्माण का सबसे बड़ा कारण बन जाती है। हर व्यक्ति को चाहिए कि जब भी उसके साथ कोई अप्रिय घटना घटे, तो वह उसी समय उसे भुला दे। उसे दूसरों से उसका ज़िक्र नहीं करना चाहिए, बल्कि यह कोशिश करनी चाहिए कि उस अप्रिय घटना में कोई सुखद पहलू खोजे। इस तरह वह एक नकारात्मक अनुभव को सकारात्मक अनुभव में बदल सकता है। ठीक वैसे ही जैसे एक यात्री के पैर में कांटा चुभ जाए, तो वह तुरंत उस कांटे को निकालकर बाहर फेंक देता है और उसे अपनी जीवित यादों का हिस्सा नहीं

था। मगर उन्होंने अपने खर्चों में इज़ाफा कर लिया, जिससे मुश्किल बढ़ गई। उन्होंने बैंक से कर्ज़ लिया ताकि आमदनी बढ़ सके, लेकिन कर्ज़ ने उनकी समस्याएँ और बढ़ा दीं। यह उनके लिए एक छलांग साबित हुई, जो नतीजे के लिहाज़ से उल्टी पड़ी। यदि वे अपने खर्चों पर काबू करते और धीरे-धीरे मेहनत कर तरक्की की कोशिश करते, तो कुछ सालों में कामयाब हो सकते थे। मगर अचानक तरक्की की कोशिश ने समस्या को हल करने के बजाय और बढ़ा छलांग का यह तरीका जैसे व्यक्ति के लिए नुक़सानदायक है, वैसे ही यह कौमों के लिए भी हानिकारक साबित होता है। 2003 में इराक पर अमेरिका का हमला भी इसी तरह की छलांग थी। अमेरिका के लिए यह हमला उल्टा साबित हुआ और उसके लिए कठिनाइयों का कारण बन गया। दो साल पहले, मैंने इसी विषय पर टाइम्स ऑफ इंडिया में एक इंटरव्यू में कहा था कि— "अमेरिका की यह आक्रामकता उसके लिए उल्टा नतीजा साबित होगी।"

काम का सही तरीका यह है कि हकीकत पसंदाना (यथार्थवादी) योजना के साथ कदम उठाए जाएँ, न कि भावनाओं के अधीन जाकर छलांग लगाई जाए। समझदारी से किए गए काम हमेशा कामयाब होते हैं, जबकि भावनाओं में किए गए काम का परिणाम अक्सर असफलता होता है। भूतकाल में जीना

انسان کے اندر ہر طرح کی क्षमता स्वाभाविक रूप से होता है, लेकिन ये क्षमताएं उसमें संभावित रूप (potential) में होती हैं। इन क्षमताओं को वास्तविकता (actual) में लाना इंसान का अपना काम है। यह एक शानदार अवसर है जो हर व्यक्ति को मिलता है। यही इंसान की ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी संभावनाओं को वास्तविकता में बदल दे, अन्यथा एक असफल इंसान के रूप में मृत्यु को संभावनाओं को वास्तविकता में बदलना एक बराबर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जीवनभर चलती रहती है। इस प्रक्रिया की शुरुआत गहरे चिंतन- मनन से होती है। गहरे चिंतन के ज़रिए इंसान सच्चाई तक पहुँचता है। इसके बाद इंसान को हर दिन आत्ममंथन (introspection) करना होता है। उसे अपनी कमज़ोरियों और त्रुटियों की पहचान करनी होती है और उन्हें सुधार कर अपने अंदर मानसिक और आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया को जारी रखना होता है। शख्सियत की तामीर (व्यक्तित्व निर्माण) की इस प्रक्रिया को इंसान खुद अंजाम देता है, लेकिन इस प्रक्रिया को सही तरीके से जारी रखने के लिए उसे लगातार अल्लाह की मदद की ज़रूरत होती है। यह मदद दुआ के माध्यम से मिलती है। जो व्यक्ति दुआ के साथ जीता है, वही अपनी शख्सियत के निर्माण में कामयाब होता है। दुआ के बिना यह काम मुकम्मल नहीं हो सकता। इंसान जब पैदा होता है, तो वह कच्चे लोहे की तरह होता है। हर व्यक्ति को अपने

शिक्षाप्रद रिपाट छपा, जो भारत के मशहूर खिलाड़ी अभिनव बिंद्रा के बारे में थी। अभिनव बिंद्रा ने अगस्त 2008 में बीजिंग (चीन) में हुए ओलंपिक खेलों में शूटिंग में गोल्ड मेडल जीता। इस रिपोर्ट का शीर्षक था— “मैं एक हारा हुआ रिपोर्ट के अनुसार, अभिनव बिंद्रा ने कहा कि उन्हें लगता है कि वे ज़िंदगी में एक हारे हुए व्यक्ति हैं, क्योंकि उन्होंने शूटिंग के सिवा कुछ नहीं किया। उन्होंने बीबीसी के कार्यक्रम "एक मुलाक़ात" में कहा, "मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में बस शूटिंग की है। मैंने ज़िंदगी में और कुछ नहीं किया। मैं अपने आपको एक हारा हुआ इंसान मानता हूँ। मैं बस सोता हूँ, दौड़ता हूँ और शूटिंग के अलावा कुछ नहीं करता। खेल ज़िंदगी का केवल एक हिस्सा है। जीवन में और भी कई चीजें हैं, लेकिन मैंने और कुछ नहीं किया।"

इंसानी शख्सियत के दो हिस्से होते हैं—माद्दी (भौतिक) हिस्सा और रूहानी (आध्यात्मिक) हिस्सा। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने भौतिक हिस्से को संतुष्ट करता है, तो वह इसी तरह की कमी और निराशा का अनुभव करता रहेगा। लेकिन यदि वह अपने रूहानी हिस्से को भी पोषित करता है, तो उसे कभी भी ऐसी निराशा महसूस नहीं होगी। शख्सियत की तामीर (व्यक्तित्व निर्माण)

हो उनके पास कोई बड़ा शैक्षिक डिग्रो नही हो उन्होंने हावर्ड यूनीवासिंटा में पढ़ाई की थी, लेकिन बीच में ही छोड़ दी, फिर भी वे धरती के सबसे धनी व्यक्ति बन गए। 1999 में उनकी संपत्ति का अनुमान सौ बिलियन डॉलर से उन्होंने कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में कई उपलब्धियाँ हासिल कीं, और दुनिया भर में उनका व्यवसाय इतना बढ़ा कि उन्हें "कंप्यूटर किंग" कहा जाने लगा। लेकिन यह समृद्धि उन्हें आंतरिक शांति नहीं दे सकी। इसलिए उन्होंने मानवता की सेवा (philanthropy) को अपने जीवन का नया उद्देश्य बनाया। उन्होंने "बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन" की स्थापना की और अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा इसमें दान कर दिया। 27 जून 2008 को, 52 वर्ष की आयु में उन्होंने कंप्यूटर व्यवसाय से ख़ुद को अलग करने का एलान कर असल में, कोई भी भौतिक सुविधा या प्रगति व्यक्ति को सच्ची शांति नहीं दे सकती। इस संसार को उसके सृजनकर्ता ने इस उद्देश्य के लिए नहीं बनाया है कि यहाँ व्यक्ति अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति करे और पूर्ण संतोष प्राप्त करे। यह एक सीमित दुनिया है जो केवल व्यक्ति को उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने का अवसर देती है ताकि वह अपनी ऊर्जा को ऊँचे आध्यात्मिक उद्देश्य में लगा सके और आख़िरत में अल्लाह के अनन्त इनाम का हक़दार

मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी पा ली। उन्होंने इस नौकरी के आधार पर लोन लेकर घर और कार हासिल की। परन्तु कुछ समय बाद वे मुझसे मिले और नाराज़गी भरे लहज़े में बोले कि कंपनी ने उनके एक जूनियर को प्रमोशन दे दिया, जबकि उन्हें नहीं। मैंने कहा, "इस कंपनी की नौकरी के कारण ही आपको घर और कार मिले। आपने इसका कभी आभार व्यक्त नहीं किया, लेकिन आपका प्रमोशन नहीं हुआ तो आप नाराज़ हो रहे हैं।"

अधिकतर लोगों का स्वभाव यही होता है। वे अपने अनुकूल घटनाओं का उल्लेख नहीं करते, लेकिन उनके विरुद्ध कुछ हो जाए तो उसका खूब चर्चा करते हैं। यह प्रवृत्ति इंसान की मानसिकता को प्रभावित करती है और एक नकारात्मक व्यक्तित्व का निर्माण करती है। इंसान का स्वभाव यह है कि यदि सौ में निन्यानवे सकारात्मक बातें हों, तो वे उसकी शख्सियत का हिस्सा नहीं बनतीं। लेकिन एक नकारात्मक बात उसकी शख्सियत में पूरी तरह से घुल जाती है। एक गिलास पानी में अगर आप रंग डालें तो वह पूरे पानी में फैल जाएगा। यही मामला इंसान का है। जब वह किसी घटना से नकारात्मक प्रभाव लेता है, तो वह उसकी पूरी शख्सियत में फैल जाता है। इसके विपरीत, कोई सकारात्मक घटना जल्दी से भुूला दी जाती है।

bomb) कहा जा सकता है। सामान्य पारिस्थितियों में यह बम सोया हुआ रहता है, लेकिन यदि इसे उकसाया जाए, तो अचानक यह उग्र रूप ले लेता है। यह एक वास्तविकता है कि हर इंसान में नफ़रत के इस बम के जगने की संभावना इसका अर्थ यह है कि हर व्यक्ति एक अत्यधिक विस्फोटक (highly inflammable) पदार्थ है। यदि किसी समाज में दस हज़ार लोग हैं, तो वे दस हज़ार चलते-फिरते ज्वलनशील पदार्थों का समूह हैं। सामान्य रूप से, यह उनका निजी हित है जो उन्हें शांत बनाए रखता है, भले ही वे स्वभाव से उग्र हों। इस स्थिति में नेतृत्व करना बहुत कठिन कार्य होता है। यदि किसी नेता के पास केवल शिकायत और विरोध का नारा है, तो उसे सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहिए, क्योंकि उसका नकारात्मक नारा समाज में उथल-पुथल मचाएगा। एक नेता का यह कर्तव्य है कि यदि उसके पास प्रेम का संदेश है, तो ही वह समाज में अपनी मुहिम लेकर आए। यदि उसके पास केवल नफ़रत और शिकायतें हैं, तो बेहतर यही है कि वह खुद को सीमित रखे। सामाजिक आंदोलनों के दो प्रकार होते हैं— सकारात्मक आंदोलन और नकारात्मक आंदोलन। सकारात्मक आंदोलन वह है जो कर्तव्य के आधार पर उठाया जाए; यह एक सही आंदोलन होता है। जबकि नकारात्मक आंदोलन वह

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