दुनिया से भरे हुए और दीन से ख़ाली
Al-Risala, November 2025, pp. 52–54
By Maulana Wahiduddin Khan
क़ाज़ी शुरह न कहा, "वह अलग बात है। दुनियावी मामला में इस्लाम का उसूल यह है कि पिता के पक्ष में उसकी सन्तान की गवाही विश्वसनीय नहीं।" हज़रत अली ख़लीफ़ा थे। वह काज़ी को निलम्बित करने का अधिकार रखते थे पर उन्होंने काज़ी के फ़ैसले के आगे सिर झुका दिया और अपना दावा वापस ले लिया। नसरानी यह देखकर हैरान रह गया। वह चीख उठा और बोला, “मैं गवाही देता हूं कि यह पैग़म्बरों के आदेश हैं कि अमीरुल मोमिनीन एक आम आदमी की तरह काज़ी की अदालत में आएं और काज़ी उसके ख़िलाफ़ फ़ैसला करें। मैं गवाही देता हूं कि ख़ुदा के सिवा कोई मा'बूद (उपास्य) नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।" फिर उसने कहा, “यह ज़िरह सचमुच अली की है। एक बार यह अली के ऊंट से गिर गई थी। और मैंने उसे उठा लिया था।" (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 4, पृष्ठ 139)
अब हज़रत अली ने वह ज़िरह उसी व्यक्ति को दे दी और उसको और भी सात सौ दिरहम दिए और उसके बाद वह मुसलमान होकर हज़रत अली के साथ रहा, यहां तक कि सिफ़्फ़ैन की लड़ाई में शहीद हो गया। यह घटना उस उसूल की श्रेष्ठतम मिसाल है कि शासक और आम आदमी दोनों
कूफ़ा के बाज़ार की तरफ़ गए। उन्होंने देखा कि एक इसाई ज़िरह बेच रहा हो पास जाकर देखा तो यह वही ज़िरह थी, जो उनसे खो गई थी। हज़रत अली उस समय इस्लामी साम्राज्य के ख़लीफा (शासक) थे। वह चाहते तो उसी समय ज़िरह अपने क़ब्ज़े में ले सकते थे लेकिन उन्होंने अपने आपको कानून से ऊपर न समझा। उन्होंने नस्रानी से कहा, "यह ज़िरह मेरी है तुम इसको लेकर क़ाज़ी (न्यायाधीश) के पास चलो। वह मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला करेगा। उस समय मुसलमानों के क़ाज़ी शुरैह बिन हारिस थे। दोनों बाज़ार से चलकर क़ाज़ी शुरैह के पास पहुंचे। शुरैह ने क़ाज़ी की हैसियत से पूछा, “अमीरुल मोमिनीन, आप क्या चाहते हैं?" हज़रत अली ने कहा, "यह ज़िरह मेरी है और मुझे वापस दिलाई जाए।" शुरैह ने नस्रानी से पूछा कि "तुम क्या कहते हो ?"
उसने कहा, 'अमीरुल मोमिनीन झूठ बोल रहे हैं। यह ज़िरह मेरी है।" काज़ी शुरैह ने हज़रत अली से कहा, "महज़ आपके दावे के आधार पर मैं ऐसा नहीं कर सकता कि ज़िरह उससे लेकर आपको दे दूं। आप अपने दावे के पक्ष में
हज़रत अली ने कहा, "शुरैह का निर्देश सही है।" इसके बाद उन्होंने अपने पक्ष में दो गवाह पेश किए। एक अपने गुलाम क़म्बर को और दूसरे अपने लड़के हसन
बहस किए बिना उसका मान लिया। उसने तुरन्त फ़ौज का हुक्म दिया कि पूरी फ़ौज समरकंद छोड़कर निकल आए। यह अलग बात है कि इसकी नौबत समरकंद के लोगों ने जब देखा कि मुसलमान इतने ज़्यादा उसूल पसंद और न्यायप्रिय हैं तो वे हैरान रह गए। इससे पहले कभी उन्होंने ऐसा निष्पक्ष न्याय नहीं देखा था। उन्होंने महसूस किया कि मुस्लिम फ़ौज का आना उनके लिए शुभ है। और यह रहमत का आना है। उन्होंने अपनी मर्जी और ख़ुशी से मुस्लिम हुकूमत को स्वीकार कर लिया। वह कह उठेः स्वागत है। हम आपके प्रशंसक, आज्ञाकारी और फ़रमाबरदार हैं। यह घटना न्याय और इंसाफ़ का जो नमूना पेश कर रही है, उसकी मिसाल पूरे इतिहास में मुश्किल से मिलेगी। इस घटना में न्याय का उसूल अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में और चरम सीमा पर है। इंसाफ़ और न्याय बेशक श्रेष्ठतम मानवीय मूल्य हैं और यह घटना इस मूल्य (कद्र) के सम्मान की बेहतरीन व्यावहारिक मिसाल है।