जनता और शासक के बीच क़ानूनी बराबरी
Al-Risala, November 2025, pp. 54–61
By Maulana Wahiduddin Khan
हज़रत अली बिन अबी तालिब इस्लाम के चौथे खलीफ़ा थे। उन्हें असाधारण
बन ता आपन सबा का दूसर सरकारी कामा म लगा दिया आर कहा, "मेरा हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह ही काफ़ी है।" यह उस शख्स् का हाल था जिसके साम्राज्य की सीमाएं सिन्ध से लेकर फ्रांस तक फैली हुई थीं। आप की ख़िलाफ़त के ज़माने की एक और घटना है। समरकंद के निवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल आपसे मिलने आया। उसने एक फौजी सरदार कुतैबा बिन मुस्लिम बाहली के बारे में शिकायत की कि इस्लामी नियम के मुताबिक़ उन्होंने हमकों पूर्व सूचना नहीं दी। और हमारे शहर में अचानक अपनी फौजें भेज दीं लिहाज़ा हमारे साथ इंसाफ किया जाए। समरकंद की विजय हज़रत उमर बिन अब्दुल अजीज़ से पहले हुई थी और अब उसके सात साल बीत चुके थे पर आपने इंसाफ के तकाज़े को पूरा करना ज़रूरी समझा। हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने ईराक के हाकिम को लिखा कि समरकंद के लोगों के मुकद्दमों की सुनवाई के लिए एक विशेष न्यायाधीश नियुक्त किया जाए। इराक के प्रशासक ने तुरन्त आदेश का पालन किया और जमी बिन हाजिर अल बाहली को इसका काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर दिया उनकी अदालत में मुकद्दमा पेश हुआ। दोनों पक्षों ने खुलकर अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं अन्त में काज़ी (जज) ने समरकंद वालों की शिकायत को सही ठहराते हुए फैसला सुनाया: मुसलमानों की फ़ौज समरकंद को छोड़कर बाहर आ जाए। समरकंद वालों को उनका किला और अन्य चीजें वापस कर दी जाएं। इसके बाद इस्लामी
वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहता है कि सफ़वान बिन मुअत्तल मेरे शौहर हैं। जब मैं नमाज़ पढ़ती हूं तो वह मुझको मारते हैं और जब मैं रोज़ा रखती हूं तो मेरा रोज़ा खुलवा देते हैं। औरत की बात सुनकर पहली नज़र में वह सही और उसका शौहर ग़लत दिखाई देता था। लेकिन जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने शौहर से पूछताछ की, तो असलियत इसके उलट निकली। चूँकि सफ़वान बिन मुअत्तल ख़ुद मौजूद थे, इसलिए आपने उस शिकायत के बारे में उनसे भी सवाल किया। उन्होंने कहा कि ऐ ख़ुदा के रसूल, नमाज़ के लिए मारने की हक़ीक़त यह है कि वह दो-दो सूरतें पढ़ती है, हालांकि इससे मैं उसको मना कर चुका हूं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि एक ही सूरः काफ़ी है। फिर सफ़वान ने कहा कि रोज़ा खुलवाने की हक़ीक़त यह है कि वह लगातार रोज़ा रखती है और मैं जवान आदमी हूं, सब्र नहीं कर सकता। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि किसी औरत के लिए ठीक नहीं कि वह अपने शौहर की इजाज़त के बिना नफ्ल (फ़र्ज़ के अलावा) रोज़ा रखे। किसी के ख़िलाफ़ शिकायत की बात मालूम हो तो सिर्फ़ सुन कर उसको नहीं मान लेना चाहिए, बल्कि तहक़ीक़ करनी चाहिए। हो सकता है कि तहक़ीक़ के बाद शिकायत ग़लत साबित हो।
का हो उन्होंने मेरा हथेली और मेरा उंगलियां से खून निकाल दिया। आर तुम उल्टा मुझको मुजरिम ठहरा रहे हो। उसका साथी बोला, मेरे दोस्त, यह पौधे के कांटों का मामला नहीं, यह कुदरत की प्रबंधन व्यवस्था का मामला है। कुदरत ने दुनिया की व्यवस्था इसी तरह बनाई है कि यहां फूल के साथ कांटे हों। मेरी और तुम्हारी चीख और पुकार ऐसा नहीं कर सकती कि इस व्यवस्था को बदल दे। फूल के साथ कांटे की यह व्यवस्था तो बहरहाल इसी तरह दुनिया में रहेगी। अब मेरी और तुम्हारी कामयाबी इसमें है कि हम इस सच्चाई को मानते हुए इससे बचने की तदबीर तलाश करें। और वह तदबीर यह है कि कांटों से बच कर फूल को हासिल करें। कांटों में न उलझते हुए फूल तक पहुंचने की कोशिश करें। फूल के साथ कांटे का होना कोई सादा बात नहीं। यह फ़ितरत और कुदरत की जुबान में इंसान के लिए सबक़ है। यह प्रकृति की भाषा में इन्सानी हक़ीक़त का ऐलान है। यह उस फ़ितरी मनसूबे का परिचय है, जिसके मुताबिक़ ख़ुदा ने मौजूदा दुनिया को बनाया है। इसका मतलब यह है कि इस दुनिया में वही क़दम कामयाब होता है जो बच कर चलने के उसूलों के मुताबिक़ हो। जहां बचने की ज़रूरत हो वहां उलझना, जहां तदबीर की ज़रूरत हो वहां एजीटेशन करना सिर्फ़ अपनी अयोग्यता का ऐलान करना है। ख़ुदा ने जिस मौक़े पर बच कर चलने का तरीक़ा इख़्तियार करने का हुक्म दिया हो, वहां उलझने का तरीक़ा इख़्तियार करना ख़ुद अपने आपको मुजरिम बनाना है। चाहे आदमी
खिदमत नहीं था। वह मुझको अपन पास बिठाते और मेरी इज़्ज़त करते थे। एक दिन मैं उनके घर में तन्हाई में उनके साथ था। अचानक उन्होंने इतने ज़ोर की आह भरी कि मुझे लगा कि उसी के साथ उनकी जान निकल गई। मैंने पूछा, “क्या आपने किसी डर की वजह से आह भरी है” उन्होंने कहा, “हां,” मैंने कहा, “वह डर क्या है?” फ़रमाया, “मेरे क़रीब आ जाओ।” मैं क़रीब हो गया। फिर फ़रमाया, “इस काम (ख़िलाफ़त) के लिए मैं किसी को नहीं पाता।” मैंने छः आदमियों का नाम लेकर कहा, “क्या आपने फ़ुलां और फुलां के बारे में नहीं सोचा?” मैं एक-एक नाम लेता जाता था और वह हरेक के बार में कुछ न कुछ कहते जाते थे। आख़िर में फ़रमायाः इस काम का अहल (पात्र) सिर्फ़ वही शख़्स है जो शदीद (कठोर) हो बिना अकड़ के। नर्म हो बिना कमज़ोरी के, सख़ी (दानी) हो बिना फ़िज़ूलखर्ची के, माल रोकने वाला हो बिना कंजूसी के। (कंजुल उम्माल, असर संख्या 14262) अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहाः “यह अच्छाइयाँ और खूबियाँ उमर रज़ि० के सिवा किसी और में जमा नहीं हुईं। एक आदमी को गुलाब का फूल तोड़ना था। वह शौक़ के तहत तेज़ी से लपक
जब तक उसका यह हाल न हो जाए कि वह अपने भाई के लिए वही पसंद करे जो वह अपने लिए पसंद करता है। (सही अल-बुखारी, हदीस संख्या 13)। किसी आदमी के साथ बदजुबानी की जाए, तो उसे बुरा लगेगा और उसके साथ नर्म बोल बोले जाएं तो उसको अच्छा लगेगा। इसी निजी तजुर्बे को सामने रखते हुए वह दूसरों से भी बर्ताव करे। वह दूसरों से कड़वे अन्दाज़ में बात न करे, वह हमेशा उनके साथ नर्म अन्दाज़ में बात करे। अगर किसी को उसका जायज़ हक़ न मिले, तो वह उसे बुरा लगेगा। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह दूसरों के हक़ अदा करे और किसी का हक़ मारने से पूरी तरह बचे। किसी के साथ वादा किया जाए और फिर उसको पूरा न किया जाए तो उसको बेहद तकलीफ़ पहुंचेगी। आदमी इसी से दूसरों के बारे में सबक़ ले। वह किसी से वादा करे तो ज़रूर उसको पूरा करे, वह किसी के साथ वादाख़िलाफ़ी का व्यवहार न करे। उसको नुकसान पहुंचाया जाए तो उसको फ़ौरन गुस्सा आ जाता है। इस निजी तजुर्बे को ध्यान में रखते हुए वह दूसरों के बारे में जान ले। वह कभी दूसरों को नुक़सान न पहुंचाए, वह हमेशा यह कोशिश करे कि उससे हमेशा दूसरों को लाभ
A fisherman once told me that one doesn't need a cover for a crab basket. If one of the crabs starts climbing up the side of the basket, the others will reach up and pull it back down. (Charles Allen, The Miracle of Love)
केकड़े की यह प्रकृति यक़ीनन ख़ुदा ने बनाई है। दूसरे शब्दों में केकड़े का यह तरीक़ा एक ख़ुदाई तरीक़ा है। केकड़े की मिसाल से ख़ुदा इन्सानों को बता रहा है कि उन्हें सामूहिक ज़िन्दगी को किस तरह चलाना चाहिए। सामूहिक ज़िन्दगी में एकता की बेहद अहमियत है और एकता क़ायम करने का बेहतरीन उपाय वही है जो केकड़ों की दुनिया में ख़ुदा ने क़ायम कर रखा है। किसी मानव-समूह के लोगों को इतना चेतनापूर्ण होना चाहिए कि अगर उनमें से कोई शख़्स मतभेद का शिकार हो और अपने समूह से जुदा होना चाहे तो दूसरे लोग उसको पकड़ कर दोबारा अन्दर की तरफ़ खींच लें। टोकरी के लोग अपने एक आदमी को टोकरी के बाहर न जाने दें। इस्लामी इतिहास में इसकी एक शानदार मिसाल हज़रत सा'द बिन उबादा अन्सारी की है। रसूलुल्लाह (सल्ल०) के देहांत के बाद, ख़िलाफ़त के मुद्दे पर उनमें आपसी मतभेद पैदा हो गया। ज़्यादातर सहाबी इससे सहमत थे कि कुरैश क़बीले के किसी शख़्स को ख़लीफ़ा बनाया जाए। लेकिन सा'द बिन उबादा के ज़ेहन में यह आया कि ख़लीफ़ा अन्सार का कोई शख़्स हो या फिर दो ख़लीफ़ा बनाए जाएं- एक मुहाजिरों में से दूसरा अन्सार में से। लेकिन इतिहास बताता है कि सा'द बिन उबादा के क़बीले के तमाम लोग अपने सरदार की राह में रुकावट बन गए।
विनम्रता के साथ लोगों के बीच रहा। अब यदि आपने आलोचना का जवाब विनम्रता से दिया, तो यह पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल होगा; लेकिन यदि आपने जवाब अहंकार और घमंड के साथ दिया, तो यह आपका अपनी इच्छाओं का पीछा करना कहलाएगा। एक व्यक्ति के किसी रवैए से आपको शिकायत पैदा हुई। आप उत्तेजित हो गए। उस वक़्त आपके सामने रसूल (सल्ल०) की लाई शरीअत का यह हुक्म आया कि लोग भड़काएं तब भी तुम सब्र और नज़रअन्दाज़ करने का तरीका अख़्तियार करो। अब अगर आपने उत्तेजना के बावजूद सब्र किया तो आपने पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल किया। और अगर आप उत्तेजित होकर उस व्यक्ति से लड़ने लगे तो आपने अपनी इच्छा की पैरवी की। यही मामला पूरी ज़िन्दगी का है। हर मामला जो आदमी के साथ घटता है, उसमें उसके लिए दो में से एक रवैया इख़्तियार करने का मौक़ा होता है। एक रवैया अपनाने के बाद वह ख़ुदा के यहां ईमान वाला लिख दिया जाता है और दूसरा रवैया इख़्तियार करने के बाद बे-ईमान।