एकता की मिसाल
Al-Risala, November 2025, pp. 61–2
By Maulana Wahiduddin Khan
एक व्यक्ति ने अपना एक अनुभव लिखा है कि एक मछुआरे ने एक बार मुझे
इसक उलट, बुरा बात वह है जो अपन अहंकार का बढ़ाْن, ज़ालिम का ताक़त देने या बुरी नीयत से कही जाए। ऐसी बातें दबे हुए झगड़ों को फिर भड़का देती हैं और आख़िरकार धरती पर फ़साद और अवव्यवस्था फैल जाती है। अल्लाह पर और आख़िरत पर यक़ीन आदमी को संजीदा और ज़िम्मेदार बनाता है। और जो शख़्स सच्चे अर्थों में संजीदा और ज़िम्मेदार हो जाए उसका बोलना वैसा ही हो जाएगा, जिसका उपरोक्त हदीस में ज़िक्र हुआ है। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि अल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: तुम में से कोई शख़्स ईमान वाला नहीं हो सकता यहां तक कि उसकी इच्छाएं उसके अधीन न हो जाएँ जिसे मैं लेकर आया हूँ। (अल-सुन्नह इब्ने आसिम, हदीस संख्या 15) इस हदीस से मालूम होता है कि दुनिया में अमल (कर्म) करने के दो तरीक़े हैं। एक है अपनी ख़्वाहिश पर अमल करना और दूसरा है पैगम्बर के लाए हुए दीन पर अमल करना। आपके सामने एक हक़ आया। आपके दिल ने गवाही दी कि यह हक़ (सत्य) है। लेकिन इसी के साथ चेतन या अवचेतन रूप से यह एहसास पैदा हुआ कि अगर
उसम मजबूरन पड़े जाए वह आत्म-विकास के काम का जारा रखन का ख़ातिर टकराव से बच कर निकल जाता है। जानवर तो ये तरीक़ा अपनी फितरत से अपनाते हैं, लेकिन इंसान को इसे अपनी समझ-बूझ से अपनाना बोलने की शर्त अबू हरैरा रज़ि अल्लाहु अनु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो आदमी अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता हो उसको चाहिए कि वह बेहतर बोले वरना चुप रहे। (सहीह अल- बुख़ारी, हदीस संख्या 6019)
जो इंसान अल्लाह की बड़ाई, ताक़त और उसकी महानता को मानता है, और जिसे यक़ीन है कि क़यामत के दिन अल्लाह उसकी हर बात का हिसाब लेगा - वह बोलते समय बहुत संभलकर बोलता है। यह स्वभाव उसको अपने आप पर नज़र रखने वाला बना देता है। उसकी ज़ुबान पर ख़ामोशी का ताला लग जाता है। वह सिर्फ़ उस वक़्त बोलता है, जबकि बोलना वाक़ई ज़रूरी हो गया हो और जहां सच्ची ज़रूरत न हो वहां वह चुप रहना पसंद करता है। जो आदमी अपनी मानसिकता के स्तर पर ऐसा बन जाए, उसकी ज़बान जब
जानवर के लिए यह लम्हा सख़्त कष्टदायक होता है, पर वह एक एस दुश्मन के मुक़ाबले में अपने को बेबस पाता है जो खुद उसके पेट में घुसा हुआ हो। इस तरह लार्वा ज़ोर लगाता रहता है, यहां तक कि वह अपने मेज़बान जानवर के जिस्म को फाड़ कर बाहर आ जाता है। यह सारा कुछ इतना ज़्यादा कष्टदायक होता है कि इसके दौरान मेज़बान जानवर मर जाता है। क़ुदरत के सिखाए हुए जीव-जन्तुओं में बचाव के जो उपाय पाए जाते हैं, वही इन्सान के लिए भी पूरी तरह कारगर हैं। इन्सान के लिए भी अपने दुश्मन के मुक़ाबले में बेहतरीन तरीक़ा यह है कि वह सीधे टकराव से बचे और कतरा कर निकलने की कोशिश करे। दुश्मन को भी यह महसूस करने का मौक़ा न दिया जाए कि आप उसके 'दायरे' में प्रवेश कर रहे हैं। अगर दुश्मन का सामना हो जाए तो उसके मुक़ाबले में अपने को निष्क्रिय और बेजान जाहिर करके अपने को उसकी पकड़ से हटा लिया जाए, अपने दायरे में सिमट कर उसको यह अहसास दिलाया जाए कि मेरी वजह से तुम्हारा किसी किस्म का कोई नुकसान नहीं। इसी के साथ ऐसा उपाय भी किया जाए जिसके ज़रिए संकट की घड़ी में दुश्मन का वार ख़ाली जा सके। जानवरों ने अपने बचाव के ये उसूल खुद नहीं बनाए, वे उनको ख़ुदा ने सिखाए हैं। इनको ख़ुदाई पुष्टि हासिल है। फिर जानवरों की दुनिया में इस तरह के बचाव व सुरक्षा के तरीक़े 'बुज़दिली' की वजह से नहीं हैं, बल्कि ख़ालिस हक़ीक़त पसंदी (यथार्थवाद) पर आधारित हैं। इसका मतलब यह होता है कि ग़ैरज़रूरी
तरह इस हद के बटवार का निभात हो बहुत कम ऐसा होता है कि दो सांड आपस में लड़ जाएं। आप नीली घोड़ी या बीर बहूटू को छुएं तो वह पैर समेट कर मुर्दा-सी बनकर जानवर बिलों के अन्दर रहते हैं। उनके लिए हमेशा यह ख़तरा होता है कि एक बहुत छोटा कीड़ा है। वह अपने दुश्मन-कीड़े को ख़त्म करने के लिए बहुत
ख़याल रखना पड़ता है। जानवरों में बचाव के जो तराक़ पाए जात ह व इन्सान के लिए भी बहुत अहमियत रखते हैं, क्योंकि जानवरों का तरीक़ा दर-असल कुदरत का तरीक़ा है। जानवर जो कुछ करते हैं अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति (natural instincts) के तहत करते हैं। दूसरे शब्दों में वे सीधे कुदरत के सिखाए हुए हैं। जानवर सृष्टि की पाठशाला में सीखे हुए विद्यार्थी हैं। उनका अमल या कर्म कुदरत का बताया हुआ सबक है। उनके काम करने के ढंग को, पैदा करने वाले की पुष्टि हासिल है। इस सिलसिले में कुछ मिसालें पेश हैं: 1. हाथी और शेर जंगल के दो सब से बड़े जानवर हैं। अगर दोनों में टकराव हो जाए तो यह टकराव दोनों के लिए ख़तरनाक और प्राणघातक होता है। हाथी और शेर दोनों इस सच्चाई से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं। इसलिए वे हमेशा यह कोशिश करते हैं कि एक-दूसरे से कतरा कर निकल जाएं। बहुत ही कम ऐसा होता है कि दोनों यह नौबत आने दें कि उनके बीच सीधे जंग शुरू हो जाए। दो ऐसे दुश्मनों की जंग, जिनमें दोनों में से कोई दूसरे को ख़त्म करने की ताक़त न रखता हो हमेशा दोतरफ़ा तबाही पर ख़त्म होती है। शेर और हाथी अपनी पूरी ज़िन्दगी में इस टकराव से बचते रहते हैं। 2. यही मामला सांड का है। दो सांड (भंसे या बैल) अगर एक दूसरे से लड़ जाएं तो ऐसा बहुत कम मुमकिन है कि एक-दूसरे को ख़त्म कर दें। सांड ऐसे बेफ़ायदा टकराव से बचने के लिए यह तरकीब करते हैं कि अपनी-अपनी
BOOKS FOR UNDERSTANDING THE LIFE OF WISDOM AND SPIRITUAL LEGACY OF THE PROPHET Understanding the Spiritual Essence of Islam