Al-Risala · January 2025

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Al-Risala, January 2025, pp. 1–17

By Maulana Wahiduddin Khan

वह बाहर से मिट्टी, पानी और गैस लता है और उन्हें पत्तों, फूलों और फलों की सूरत में सामने लाता है। इसी तरह किसी इंसानी समाज की बेहतरी इस बात पर निर्भर करती है कि उसके तमाम लोग यह सलाहियत रखते हों कि वे छोटे सलूक को ऊंचे सलूक में बदल सकें। इसी तरह इंसान के मानसिक अस्तित्व को भी वैसा ही होना चाहिए जैसा बनाने वाले ने उसके जिस्मानी अस्तित्व को बनाया है। इंसान जो चीजें खाता है, उनमें एक हिस्सा शक्कर (चीनी) का होता है। शक्कर अपनी पहली सूरत में इंसान के लिए बेफायदा होती है, इसलिए इंसान के जिस्म में लबलबा (Pancreas) का निज़ाम मौजूद है, जिसका काम है शक्कर को ताकत (एनर्जी) में बदल देना। इसी तब्दीली की सलाहियत पर इंसान की ताकत और सेहत का दारोमदार है। अगर किसी इंसान के जिस्म का यह निज़ाम खराब हो जाए तो शक्कर ताकत में नहीं बदलेगी, बल्कि खून में शामिल हो जाएगी या पेशाब के रास्ते बाहर आ जाएगी। इसके बाद इंसान बेहद कमजोर हो जाएगा इस तरह वो बीमारी पैदा होती है, जिसे डायबीटीज (diabetes) कहा जाता है। अगर एक इंसान डायबीटीज़ का शिकार हो जाए, यानी उसका जिस्म शक्कर को ताकत में बदलने की सलाहियत खो दे, तो उसकी जिंदगी बेमाने हो जाएगी। वह सब कुछ होने के बावजूद 'कुछ भी नहीं' हो जाएगा। इसी तरह अगर कोई समाज

ह कि लागा के बाच सांस्कृतिक फक हो इसका असल कारण यह ह कि हमार समाज के लोग मानसिक तौर पर डायबिटिक हो गए हैं। उनमें शक्कर को ताकत में बदलने की सलाहियत नहीं रही। उनमें यह ताकत नहीं रही कि वे 'कमज़ोरी' को अपनी ताकत बना सकें। सामाजिक जिंदगी में हमेशा ऐसा होता है कि इंसान के साथ नामुनासिब बातें पेश आती हैं। एक इंसान को दूसरे इंसान से शिकायत हो जाती है। किसी के फायदे दूसरे के नफे से टकरा जाते हैं। एक इंसान ऐसे अल्फाज़ कहता है जो सुनने वाले को महसूस होता है कि यह उसकी शख्सियत या समाजी हैसियत पर चोट कर रहे हैं। समाज में इस तरह के वाक्ये पेश आते हैं और हमेशा पेश आते रहेंगे। हमारे लिए यह मुमकिन नहीं है कि हम इन वाक्यों को रोक सकें। लेकिन हमारे लिए यह मुमकिन है कि हम इनसे कोई नेगेटिव (नकारात्मक) असर न लें। एक सेहतमंद इंसान अपने अंदर जाने वाली शक्कर को ताकत में बदल देता है। तब्दीली का यही अमल मानसिक तौर पर भी होना चाहिए। इस दुनिया में बेहतर समाजी जिंदगी बनाने का राज़ यह है कि लोगों की समझ को इस काबिल बनाया जाए कि वे नामुनासिब वाक्यों को अच्छे रवैये में बदल सकें। वे गुस्से के जवाब में माफी पेश करें और बुराई करने वाले के लिए भलाई का तोहफ़ा दें। मौजूदा समाज के लोग मानसिक तौर पर डायबिटिक हो गए हैं। उनकी इस मानसिक

अपन दायर से निकल कर दूसर दायर मे दाख़िल नही होता। यहा बात कुरान मे इन शब्दों में कही गई है:

"और सूरज, वह अपनी ठ ठहराई हुई राह पर चलता रहता है। यह प्रभुत्वशाली (अज़ीज़) व ज्ञानवान (अलीम) का बांधा हुआ अंदाज़ा है। और चांद के लिए हमने मंजिलें निर्धारित कर दीं, यहां तक कि वह ऐसा रह जाता है जैसे खजूर की पुरानी शाख़ा। न सूरज के वश में है कि वह चांद को पकड़ ले और न रात दिन से पहले आ सकती है। और सब एक-एक दायरे में तैर रहे हैं।" (36:38-40)

इन आयतों में उस आकाशीय सच्चाई की तरफ़ संकेत किया गया है कि इस क्रायनात के तमाम घूमने वाले सितारे और सैय्यारे (गृह व नक्षत्र) अपनी-अपनी दायरे (orbit) में ठीक-ठीक और सुनिश्चित ढंग से घूमते हैं। वे कभी अपनी हद को छोड़कर दूसरे की हद में दाख़िल नहीं होते। यही हदबन्दी या सीमाबद्धता इंसान के लिए भी आदर्श है। कुरान में कहा गया है कि जो लोग खुदा की क्रायम की हुई हदों को तोड़ते हैं वे खुदा की नज़र में ज़ालिम (अत्याचारी) हैं। (2:229)

यही बात हदीस में इन शब्दों में कही गई है:

"और अल्लाह ने हदें क्रायम कर दी हैं। तो तुम उन हदों का उल्लंघन न करो" (मुसतदरक अल-हाकिम, हदीस संख्या 7114)

ایک گھاڑ کی گردن م پانچ میٹر کا رسیو ہا وہ رسیو ایک خوٹ سے بندھا ھا تا گھوڑا اپنی عادت کے مطابق چاروں ترَف گھومیگا پر وہ رسی کی لمبائی سے زیادہ ن جا سکے گا۔ رسی اگر پانچ میٹر کی ہے تو اسکی حرکت کا دایرہ بھی پانچ میٹر تک سیمت رہیگا۔

آسمان کے ستارے ایک اندیکھی رسی میں بندھے ہوئے ہیں جو انہیں انکے تیشدا دایره (orbit) سے باہر نہیں جانے دیتی۔ اسی طرح انسان کو بھی ایک نیتک (اقلاتی) رسی میں باندھا گیا ہے۔ یہ رسی سہی اور غلت کی رسی ہے۔ اسکو سہی کام کرنا ہے پر غلت قدم نہیں اٹھانا ہے۔ انسان کو انصاف پر قائم رہنا ہے۔ ظلم اور اتیاچار کی اجازت نہیں اسکو جب بولنا ہے سچ بولنا ہے۔ بولنا اسکے لیے جابز نہیں۔ اسکو اپنی ترقی اور کامیابی کے لیے پرتن شیل رہنے کی اجازت ہے۔ پر اسکو یہ اجازت نہیں کہ وہ دوسروں کو نقصان پہنچانے کی قیمت پر اپنے لیے فایده حاصل کرے۔

اس ستھ کو سپسٹ کیا جا سکتا ہے۔ ایک دیش کو باہری گلابی سے آزادی اسکے بعد وہاں کا ایک ‘ناگریک سڑک پر نکلا۔ وہ خوشی سے جھمتا ہوا جا رہا تھا۔ اور اپنے دونوں ہاتھ زور زور سے ہلا رہا تھا۔ اسی بیچ اسکا ہاتھ ایک راہگیر کی ناک سے ٹکرا گیا۔ راہگیر نے غستا ہوکر پوچھا کہ تم اس طرح ہاتھ ہلاتے ہوئے کیوں چل رہے ہو؟ اس ناگریک نے جواب دیا: “آج میرے دیش کو آزادی مل چکی ہے۔ اب میں آزاد ہوں کہ جو چاہوں کروں۔ “ راہگیر نے اہستا سور میں کہا:

श्ख्श का नाक से टकरानि का हद शुरू हा वहा हाथ हिलान वाले का आज़ादी का हद भी ख़त्म हो जाती है। किसी ने कहा है, “अपने हक़ से ज़्यादा चाहना अपने आपको अपने वास्तविक हक़ से भी वंचित कर लेना है।” कोई आदमी जब उतना ही चाहे जिसका व सचमुच हक़दार है तो हर चीज़ उसकी मांग का समर्थन कर रही होती है। और जब वह अपने जाइज़ हक़ से ज़्यादा चाहने लगे तो हर चीज़ उसके ख़िलाफ़ हो जाती है। यही वजह है कि पहला आदमी हमेशा कामयाब होता है। और दूसरा आदमी हमेशा नाकाम। एक बड़ा संस्थान था, उसमें एक मैनेजर की ज़रूरत थी। एक आदमी के अन्दर मैनेजमेंट की सलाहियत थी। उसको वहां मैनेजर की हैसियत से रख लिया गया। संस्थान के डायरेक्टर ने मैनेजर के साथ काफ़ी रियायत का बर्ताव किया। अच्छी तन्ख़वाह, रहने के लिए मकान, आने-जाने के लिए एक जीप और दूसरी कई चीज़े उन्हें हासिल हो गईं। मगर कुछ दिनों के बाद उस आदमी के मन में ज़्यादा की चाह पैदा हो गई। 'मैनेजर' की हैसियत उसको कम लगी। उसने चाहा कि डायरेक्टर की सीट पर क़ब्ज़ा कर ले। अब मैनेजर ने चुपके-चुपके डायरेक्टर के ख़िलाफ़ मंसूबा बनाया। मगर मंसूबे की कामयाबी से पहले डायरेक्टर को उसकी ख़बर हो गई। उसने चटपट कार्रवाई करके उस आदमी को मैनेजर की पोस्ट से हटा दिया। मकान

तराक़ी इख़्तियार करता तो वह न सिर्फ़ कामयाब रहता, बल्कि और भी तरक़्क़ी करता। मगर ‘हिर्स’ का तरीक़ा इख़्तियार करके उसने अपने पाए हुए को भी खो दिया, और आइन्दा जो कुछ वह पा सकता था उसको भी। जब आप अपने हक़ के बराबर चाहते हैं तो आप वह चीज़ चाह रहे होते हैं जो सच में आपकी है, जो इन्साफ़ के मुताबिक़ आप ही को मिलनी चाहिए। मगर जब आप अपने वास्तविक हक़ से ज़्यादा चाहें तो मानो आप ऐसी चीज़ चाह रहे हैं जो इन्साफ़ के मुताबिक़ आपकी चीज़ नहीं है, बल्कि दूसरे की चीज़ है, फिर दूसरा शख़्स क्यों आपको अपनी चीज़ देने पर राज़ी हो जाएगा। जब भी आदमी अपने हक़ से ज़्यादा चाहे तो फ़ौरन उसका दूसरे से टकराव शुरू हो जाता है। दूसरे लोग उसकी राह में रुकावट बन कर खड़े हो जाते हैं। अब कशमकश और ज़िद पैदा हो जाती है। दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। इसके नतीजे में अक्सर ऐसा होता है कि आदमी अस्ल से ज़्यादा की चाह में अस्ल को भी खो अपने हक़ से ज़्यादा की चाह करते ही यह होता है कि आदमी विरोधाभास में घिर जाता है। वह अपने हिस्से की चीज़ लेने के लिए एक दलील देता है, और दूसरे के हिस्से की चीज़ पर कब्ज़ा करने के लिए दूसरी दलील इस्तेमाल करता है। इस तरह वह अपने मुक़द्दमे को ख़ुद ही कमज़ोर कर लेता है। वह अपना निषेध आप कर देता है। दो किस्म की दलीलों से वह साबित करता है कि पहली चीज़ अगर उसकी है तो दूसरी चीज़ उसकी नहीं है, और अगर दूसरी चीज़ उसकी है तो पहली चीज़ उसकी नहीं हो सकती।

आदम का उसका पैदा करने वाल न इसी लिए पैदा किया ह कि वह एक कामयाब ज़िन्दगी हासिल करे। मगर हर आदमी की एक हद है। और हर आदमी को चाहिए कि वह अपनी हद को जाने। जब आदमी अपनी हद के अन्दर रहे तो दुनिया की तमाम ताक़तें उसको कामयाब बनाने के लिए उसका साथ देती हैं और जब वह अपनी हद से आगे बढ़ने लगे तो हर चीज़ उसका साथ छोड़ देती है। ऐसे आदमी के लिए नाकामी के सिवा और कोई अंजाम इस दुनिया में नहीं। कम्यूनिस्ट रूस के पहले शासक लेनिन की मृत्यु 1924 में हुई। उसके बाद जोज़ेफ़ स्टालिन रूस का प्रधान मंत्री बना। और मरते दम (1953) तक वो इस ओहदे पर रहा। उसने लगभग 30 साल तक कम्यूनिस्ट रूस के ऊपर निरंकुश हुकूमत की। इस दौरान उसने बेशुमार ज़ुल्म किए। यहां तक कहा जाता है कि उसने लगभग पांच करोड़ इन्सानों को विभिन्न तरीक़ों से मार डाला (टाइम्स आफ़ इंडिया 20 अप्रैल स्टालिन की हुकूमत के पूरे दौर में उसके ज़ुल्म इस तरह पूरी तरह छुपाए जाते रहे कि उसका एक लफ़्ज़ भी कम्यूनिस्ट रूस में कहीं भी छप नहीं सका। बाद के एक रूसी प्रधानमंत्री खुश्त्रेफ़ ने कम्यूनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में बन्द कमरे के अन्दर उसके भयानक जुर्मों पर एक लम्बी रिपोर्ट पेश की। यह घटना 25 फ़रवरी

1989 का खुश्फ़ का यह रिपाट पूरा का पूरा प्रकाशित का है, और उसका नाम है — व्यक्तिपूजा और उसके प्रभावः On the personality cult and its consequences. मौजूदा दुनिया में आदमी सरकशी करता है। वह अपनी बड़ाई क़ायम रखने की ख़ातिर हक़ को मानने से इन्कार कर देता है। फिर भी उसको अपनी अस्ल हैसियत पर पर्दा डालने के लिए ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ मिल जाते हैं। वह समझता है कि मैंने हमेशा के लिए अपने काले कारनामों को छुपा लिया। मगर जिस तरह स्टालिन के लिए “6 अप्रैल” की तारीख तय थी और उस तारीख के आते ही वह सारी दुनिया के सामने बेनक़ाब हो गया, उसी तरह हर इन्सान के लिए एक “6 अप्रैल” है। उसके आते ही हर आदमी की सच्चाई पहले पेज की ख़बर बन जाएगी, जिस तरह 6 अप्रैल 1989 को स्टालिन की सच्चाई पहले पेज की ख़बर बन गई। यह दिन बहरहाल हर इन्सान के लिए आने वाला है, चाहे वह आज आए या आज से 50 साल बाद। ग़रीबी का सबब टाइम्स आफ़ इंडिया ने 'सोसायटी' के नाम से एक परिशिष्ट (नवम्बर-दिसम्बर 1988) प्रकाशित किया था। उसमें टाइम्स आफ़ इंडिया (4 दिसम्बर 1880) की एक ख़बर नक़्ल की गई है। उस वक़्त हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की हुकूमत थी। एक

कि हिन्दुस्तान जो किसी वक़्त इतना ज़्यादा दालतमंद समझा जाता था, वह अब इतना ज़्यादा ग़रीब क्यों हो गयाः How come it that India was once held to be so rich and now proves to be so poor (p.34)? इतिहास बताता है कि हिन्दुस्तान मुस्लिम हुकूमत के दौर में निहायत ख़ुशहाल था। अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में पहली बार वह ग़रीब हुआ, और आज़ादी के बाद आज़ाद हुकूमत के ज़माने में भी वह ग़रीब है, बल्कि अब उसकी ग़रीबी में हमेशा से ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया है। इसकी वजह यह है कि मुस्लिम हुक्मरांनों ने मुल्क से जो दौलत हासिल की उसको उन्होंने मुल्क के अन्दर ही ख़र्च किया। इस तरह दौलत का सर्कुलेशन मुल्क के अन्दर ही रहा। अंग्रेजों ने यह किया कि मुल्क की दौलत को यहां से निकाल कर इंगलैंड ले गए। इस तरह दौलत का सर्कुलेशन अन्दर से बाहर की तरफ़ होने लगा। यही अस्ल वजह थी, जिसकी बुनियाद पर हिन्दुस्तान मुस्लिम दौर में ख़ुशहाल था और अंग्रेज़ी दौर में बदहाल हो गया। दौलत के उल्टे सर्कुलेशन की यही प्रक्रिया 'आज़ाद हिन्दुस्तान' में भी बहुत बड़े पैमाने पर जारी है। हिन्दुस्तान के देसी हुक्मरां और यहां के बड़े-बड़े व्यापारी- उद्योगपति मुल्क की दौलत बाहर ले जाकर यूरोप और अमरीका के बैंकों में जमा कर रहे हैं। इसी के साथ स्मगलिंग का कारोबार मौजूदा हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा कारोबार है। वह मुल्क की बेशुमार दौलत को विदेशों में पहुंचा रहा है। इस तरह जो दौलत बाहर जा रही है वह इतनी ज़्यादा है कि अंग्रेजों ने अपनी हुकूमत के दौर में भी शायद इतनी ज़्यादा दौलत बाहर नहीं भेजी।

डॉक्टरों ने उन्हें देख कर बताया कि वह अस्पताल पहुंचन से पहल ही मर चुका है। उन्होंने आत्महत्या क्यों की, इसकी वजह ख़बर में इन लफ़्ज़ों में बताई गई है:

Padma committed suicide after hearing that the family has lost a case in Supreme court to retain their flat. पदमा ने यह ख़बर सुनने के बाद आत्महत्या कर ली कि उनका ख़ानदान अपने फ़्लैट को क़ब्ज़े में रखने का केस सुप्रीम कोर्ट में हार गया है (हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ़ इंडिया, 17 नवम्बर 1984)। 1977 में जनता पार्टी की कामयाबी के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। प्रधान मंत्री बनने के ढाई साल के अर्से में उनके बेटे शान्ति देसाई ने कई मामले किए। उनमें से एक यह फ़्लैट भी था। मैरिन ड्राईव (बम्बई) में एक बड़ी बिल्डिंग जिसका नाम ओशियाना (Oceana) है। उसकी पांचवी मंज़िल पर यह फ़्लैट था। जनता सरकार के ख़त्म होने के बाद अदालत में यह केस चला कि कान्ति देसाई ने यह फ़्लैट ग़ैर कानूनी तौर पर हासिल किया था। अदालत ने इसके पक्ष में फ़ैसला दिया। श्रीमती पदमा देसाई को इस फ़ैसले की ख़बर टेलीफ़ोन से मिली। उसके बाद उन्होंने छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली। पदमा देसाई ने समझा कि वह आत्महत्या करके हमेशा के लिए अदालत के फ़ैसले से छुटकारा पा रही हैं। लेकिन अगर उन्हें मालूम होता कि वह आत्महत्या करके अपने को ज़्यादा बड़ी अदालत में पहुंचा रही हैं, जहां आत्महत्या करने का भी मौक़ा

इसक अलावा वह ख़ुद बच्चा का नमाज़ की ताकाद करता वह राज़ाना अपन बच्चा को लेकर बैठते। उनको कलिमा और दुआएं याद कराते, उनको बताते कि ख़ुदा की इबादत करो। बड़ों का एहतराम और अदब करो। लोगों के साथ अख़्लाक़ से पेश आओ। वग़ैरह !

मगर उनके बच्चे बड़े होकर वैसे ही शरीर और दुनियादार निकले जैसे आम लोगों के बच्चे होते। इसकी वजह यह थी कि वह साहब अपनी ज़ुबान से तो बच्चों को दीनी तालीम देते और अपने अमल से बेदीनी का नमूना पेश करते। अल्फाज़ के लिहाज से वह दीनदार थे, मगर उन्होंने अपने घर में अमली तौर पर दीनदारी की फ़िज़ा नहीं बनाई। मसलन उन्हें अपने मुहल्ले के एक शख़्स से ज़िद हो गई। यह ज़िद महज़ अहंकार के कारण थी। उनके ख़्याल के मुताबिक़ उस शख़्स ने एक बार उनकी तौहीन कर दी थी। इसके बाद क्रे से उनके अन्दर उसके ख़िलाफ़ इन्तिकामी जज़्बा भड़क उठा। घर में उसकी बुराियां करते। उन्होंने उसको हर तरह बदनाम करने की कोशिश की। उसको नुक़सान पहुंचाने की कोशिशे कीं। यहां तक कि उसके ख़िलाफ़ झूठे मुक़द्मे क़ायम किए, वग़ैरह। यह सिलसिला तक़रीबन पन्द्रह साल तक जारी रहा। बच्चे उन साहब की ज़ुबान से दीन की बातें सुनते। और घर के बिगड़े माहौल की वजह से बेदीनी की फ़िज़ा में सांस लेते और मनोविज्ञान का फ़ैसला है कि जहां इस किस्म का दोरंगापन पाया

बनाएंग जस दुनिया का साज़ा-सामान जमा करने के सिवा ज़िन्दगी का कोई मक़्सद नहीं। अल्फ़ाज़ के ज़रिए वे नेकी की चर्चा करेंगे मगर अपनी कमाई को नेकी की राह में देने के बजाय उसको सिर्फ़ बच्चों के दुन्यवी हौसले पूरे करने में ख़र्च करेंगे। यह दीनी तरबियत नहीं, बल्कि दीनी तरबियत का मज़ाक है। दीनी तरबियत दीनी अल्फ़ाज़ बोलने का नाम नहीं, बल्कि दीनी माहौल बनाने का नाम है। जिस घर का अमली माहौल दीन के मुताबिक़ न हो, उस घर में कुछ दीनी बातें बोल कर आप दीनी नतीजा पैदा नहीं कर सकते। हक़ीक़त यह है कि घर की बातचीत, घर का पैसा, घर की दिलचस्पी, घर की सरगर्मी, घर के दिन-रात, हर चीज़ को दीन पर ढालना होगा। उसके बाद ही यह मुमकिन है कि बच्चों के अन्दर दीनी मिज़ाज पैदा हो। क़ौल और अमल यानी कथनी और करनी का यह फ़र्क़ आम है। ऐसी हालत में सवाल पैदा होता है कि इस फ़र्क़ का सबब क्या है। इसका सबब यह है कि बात करना सादा तौर पर सिर्फ़ अल्फ़ाज़ बोलना है, जबकि अमल का ताल्लुक़ दूसरी बहुत-सी चीज़ों से जुड़ा हुआ है। आदमी अगर उन दूसरे पहलुओं का ध्यान रखने के लिए तैयार न हो तो वह कभी अमल का सबूत नहीं दे सकता। एक शख़्स जब स्टेज पर खड़ा होकर बोलता है तो वह बात को बात की हैसियत से कहता है। मसलन वह इस्लाम के नैतिक उसूलों पर बोल रहा हो तो वह किताबों में लिखी हुई बातों को शानदार अल्फ़ाज़ में दोहरा देगा। किताबी मालूमात और अल्फ़ाज़ का ज़खीरा एक अच्छी तक़रीर करने के लिए काफ़ी है।

उसके लिए उस अमल का वक़्त आता है कि वह अपना ज़ुबान से यह कह कि “मन ग़लती की।” “ऊपरी तौर पर यह सिर्फ़ चन्द लफ़्ज़ों का बोलना है, मगर इस क़्रिस्म का ‘मानना’ आदमी की पूरी शख़्सियत से जुड़ा हुआ होता है। ऐसी स्वीकारोक्ति अपनी प्रतिष्ठा को ख़त्म करने की तरह है। यही वजह है कि हम यह दृश्य देखते हैं कि दूसरों की ग़लती बयान करने वाले बेशुमार हैं मगर अपनी ग़लती मानने वाला आप इस्लाम की महान शख़्सियतों की सच को मानने की घटनाएं अपनी तक़रीर में शानदार तौर पर बयान कर सकते हैं, क्योंकि इससे आपकी अपनी ज़ात पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मगर जब ख़ुद अपनी एक ग़लती को मानने का मामला हो तो उस वक़्त ख़ुद अपनी ज़ात ज़द में आ जाती है। और एक मैदान का कामयाब इन्सान दूसरे मैदान में नाकाम साबित होता है। यही वह ख़ास वजह है, जिसकी वजह से आदमी उसूल को बयान करता है, मगर वह उसूल पर अमल नहीं करता। क्योंकि उसूल पर अमल करते हुए वह महसूस करता है कि उसके स्वार्थों को चोट पहुंच रही है। कहीं उसको अपने अहं पर चोट पड़ती हुई दिखाई देती है। कहीं एक उसूल पर अमल करने का मतलब होता है कि दूसरों की तरफ़ से पेश आने वाली नाख़ुशगवारियों को एकतरफ़ा तौर पर बर्दाश्त कर लिया जाए, बुराई के जवाब में भलाई का रवैया इख़्तियार कर लिया जाए। इसी तरह कभी इसका मतलब यह होता है कि एक मिली हुई चीज़ को बिना शर्त

बचा नही सकता, चाह आप सुबह-शाम अपने घर में कुरआन का तिलावत करत हों और चाहे आपने अपने बच्चों और बच्चियों को दारुल-इस्लाह और जामियातु- स्सालिहात में तालीमी सनद (शैक्षिक प्रमाण पत्र) के लिए भेज रखा हो। महमूद आलम साहब (श्रीनगर) ने अपना एक वाक़या लिखा है। उसका ख़ूलासा उन्हीं के लफ़्ज़ों में अख़बार दावत (10 अप्रैल 1990) से यहां नक़्ल किया जाता है। "हम चन्द दोस्त एक होटल में बैठे बातचीत कर रहे थे। यह होटल लेखकों, शायरों और पत्रकारों के लिए एक क्लब का काम करता था। रोज़ाना शाम को उसके हाल में जमा होकर लोग एक कप गर्म चाय के साथ दुनिया की सियासत से लेकर मुल्क के मसलों पर गर्मा-गर्म बहस कर सकते थे। हम में से हरेक वहां अपनी क़ाबलियत का जौहर दिखता था। जिस तरह मदारी की डुगडुगी पर मजमा लग जाता है, हमारी असरदार बातचीत से लोगों की भीड़ जमा होने लगी। आज हमारी बातचीत अरब और इस्राईल के दरम्यान होने वाली जंग के बारे में थी। हम जोश और जज़्बे से अपनी मालूमात पेश कर रहे थे। हमारे एक फ़ाज़िल दोस्त ने अपने अन्देशों का इज़हार करते हुए कहा कि अगर मुसलमानों की हालत यही रही तो बैतुलमक़्दिस का मिलना तो दूर रहा, अजब नहीं कि ख़ान-ए-काबा पर भी ग़ैरों का क़ब्ज़ा हो जाए। अभी हमारे दोस्त ने जुमला पूरा नहीं किया था कि एक देहाती मुसलमान बिगड़ गया, 'कुरआन पढ़ा है आपने?

कि हमन अब तक कुछ नहीं पढ़ा। पढ़ लिख कर भी हम जाहिल रह गए।" मौजूदा ज़माने की मुस्लिम तहरीकों का यह निहायत सही नक्शा है। जिन चीज़ों की ज़िम्मेदारी खुदा ने ले रखी है, उनके नाम पर वे हंगामा करने में लगे हुए हैं और जिस चीज़ की ज़िम्मेदारी खुद उन पर डाली गई है, उसके लिए ये तहरीकें कुछ नहीं करतीं। "इस्लाम और इस्लामी प्रतीकों व चिन्हों पर हमला" जैसे मुद्दों पर हर आदमी जोश दिखा रहा है, हालांकि उनकी हिफाज़त करने वाला खुद खुदा है। इल्म और तालीम की अहमियत इस्लाम में इतनी ज़्यादा है कि हर दूसरी मसलहत पर इसको बड़ाई हासिल है। मौजूदा ज़माने में मुसलमान तालीम के मैदान में दूसरी कौमों से पीछे हो गए। और इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि मौजूदा ज़माने में जो तालीमी इदारे (शिक्षा-संस्थाएं) कायम हुए उनमें पढ़ाने वाले ज़्यादातर गैरमुस्लिम थे। मुसलमानों के लीडरों ने कहा कि ये गैरमुस्लिम उस्ताद हमारे बच्चों को खराब कर देंगे, इसलिए इन इदारों में मुसलमानों को दाखिल करना दुरुस्त नहीं। उसके नतीजे में मुसलमान तालीम में बहुत पीछे हो गए। यह सोच दुरुस्त न थी। इसका सबूत यह है कि इस्लाम की तारीख में जो सबसे पहला स्कूल खोला गया, उसके तमाम उस्ताद गैरमुस्लिम थे। यह स्कूल मदीना में मक्का के कैदियों के ज़रिए खोला गया जो सब के सब गैरमुस्लिम थे। कुछ लोग सुफ्फा को

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