تعلیمی پیغام
Al-Risala, March 2026, pp. 50–53
By Maulana Wahiduddin Khan
(زیر نظر پیغام مولانا وحید الدین خاں صاحب نے مدینہ ٹیکنیکل کالج، حیدر آباد، کے سوینیر کے لیے لکھا تھا) تعلیم صرف روزگار کا سرٹیفکٹ نہیں۔ اس کا اصل مقصد قوم کے افراد کو باشعور بنانا ہے۔ کو باشعور بناناملت کی تعمیر کی راہ کا پہلا قدم ہے۔ ملت کا سفر جب بھی شروع ہوگا یہیں سے شروع اس کے سوا کسی اور مقام سے ملت کا سفر شروع نہیں ہوسکتا۔
باشعور بنانا کیا ہے۔ باشعور بنانا یہ ہے کہ ملت کے افراد ماضی اور حال کو ایک دوسرے سے وہ زندگی کے مسائل کو کائنات کے ابدی نقشہ میں رکھ کر دیکھ سکیں۔ وہ جانیں کہ وہ کیا ہیں، اور کیا نہیں ہیں۔ وہ اس راز سے واقف ہوں کہ وہ اپنے ارادہ کو خدا کے ارادہ سے ہم آہنگ کر کے ہی خدا کی اس دنیا میں کامیاب ہو سکتے ہیں۔ باشعور انسان ہی حقیقی معنوں میں انسان ہے۔ نہیں وہ انسان بھی نہیں۔
باشعور آدمی اپنے اور دوسرے کے بارے میں صحیح رائے قائم کرنے کے قابل ہو جاتا ہے۔ جان لیتا ہے کہ اس کی کون سی رائے جانب دارانہ رائے ہے اور کون سی غیر جانب دارانہ۔ کوئی موقع آتا ہے تو وہ پہچان لیتا ہے کہ یہاں کون سی کارروائی ردعمل کی کارروائی ہے اور کون سی وہ شر کو خیر سے جدا کرتا ہے اور باطل کو الگ کر کے حق کو پہچانتا ہے۔ ایک آنکھ وہ ہے جو ہر آدمی کی پیشانی پر ہوتی ہے۔ تعلیم آدمی کو ذہنی آنکھ عطا کرتی ہے۔ عام آنکھ آدمی کو ظاہری چیزیں دکھاتی ہے، تعلیم کی آنکھ آدمی کو اس قابل بناتی ہے کہ وہ معنوی چیزوں کو دیکھ سکے۔ جس طرح ایک کسان بیج کو درخت بناتا ہے، اسی طرح تعلیم گاہ کا کام یہ ہے کہ وہ انسان کو فکری حیثیت سے اس قابل بنائے کہ وہ ارتقائے حیات کے سفر کو مکمل کر سکے۔ تعلیم آدمی کو ملازمت بھی دیتی ہے۔ مگر یہ تعلیم کا ثانوی فائدہ ہے۔ تعلیم کا اصل پہلو یہ ہے کہ وہ آدمی کو زندگی کی سائنس وہ آدمی کو حقیقی معنوں میں آدمی بنادے۔ (الرسالہ، مئی 1985)
मालिक हो। जो ज़िंदगी के मामले में निर्णय लेने की क्षमता रखता हो। जो 'हाँ' के साथ 'नहीं' कहने की ताक़त रखता हो। जो अपने लक्ष्य की राह में दूसरों से समझौता न करे। ऐसा ही इंसान कोई बड़ा काम करने में सफल होता है। बड़ा काम करने के दौरान हमेशा ऐसे हालात पैदा होते हैं, जो इंसान के रास्ते में रुकावट (obstacles) डालते हैं। कमज़ोर संकल्प वाला व्यक्ति ऐसे समय पर हिम्मत हारकर बैठ जाता है। इसके विपरीत, मज़बूत संकल्प वाला व्यक्ति हर हाल में अपना सफर जारी रखता है, यहाँ तक कि वह अपनी मंज़िल तक पहुँच जाता है। ज़िंदगी के सफर में हमेशा ऐसा होता है कि रास्ते में कुछ नकारात्मक (negative) अनुभव सामने आते हैं। ये नकारात्मक अनुभव हमेशा अस्थायी (temporary) होते हैं। जो लोग प्रकृति के इस रहस्य को नहीं समझते, वे नकारात्मक अनुभव को अंतिम समझ लेते हैं और इस आधार पर वे हिम्मत हार बैठते हैं। सही यह है कि इंसान इन अनुभवों को अस्थायी माने। ऐसे अनुभव सामने आने पर वह भविष्य पर नज़र रखते हुए अपना सफर जारी रखे। वह यक़ीन रखे कि प्रकृति के नियम के मुताबिक, रुकावट केवल एक अस्थायी चीज़ बनकर रह जाती है और आगे के चरणों में अपने आप दूर होती चली जाती है। जो लोग प्रकृति के इस नियम को नहीं समझते, वे कमज़ोर संकल्प वाले बन जाते हैं। और जो लोग इस रहस्य को समझ लेते हैं, वे मज़बूत संकल्प के साथ काम लेते हुए आख़िरकार सफलता की मंज़िल तक पहुँच जाते हैं।
सकत हता है, और बुद्धिमान हस्तक्षेप स्वयं एक बुद्धिमान सृष्टिकर्ता (intelligent Creator) के अस्तित्व का सबूत है। उदाहरण के लिए, विशाल ब्रह्मांड में सौरमंडल (solar system) एक अपवाद है। सौरमंडल में ग्रह पृथ्वी (planet earth) एक अनूठा अपवाद है। पृथ्वी का अत्यंत संतुलित आकार, उसका अपने अक्ष (axis) पर घूमना, पृथ्वी पर जीवन समर्थन तंत्र (life support system) और जीवन की उपस्थिति – ये सभी अपवाद हैं। यहां तक कि पृथ्वी पर मनुष्य का होना भी एक अपवाद है। इस प्रकार के विभिन्न अपवाद, जो हमारी दुनिया में देखे जाते हैं, केवल आकस्मिक नहीं हैं, बल्कि अत्यंत अर्थपूर्ण (meaningful) हैं। विशाल ब्रह्मांड में ऐसे अर्थपूर्ण अपवाद यक़ीनी तौर पर ये साबित करते हैं कि कायनात का एक सृष्टा है। सृष्टिकर्ता ने एक सोचे-समझे और योजनाबद्ध ढांचे के तहत कायनात को रचा है। जहाँ चाहा, उसने चीज़ों में एकरूपता (uniformity) लाई, और जहाँ चाहा, किसी चीज़ को अन्य से विशिष्ट और अलग बना दिया। उदाहरण के लिए, जानदारों की बनावट में समानता मिलती है, लेकिन सभी जानदारों का पीढ़ीगत कोड (genetic code) एक-दूसरे से अलग होता है। सबके हाथों की उंगलियाँ मिलती-जुल्ती हैं, पर हर व्यक्ति का अंगूठे का निशान अलग होता है। इन समानताओं के बीच यह अपवाद साफ बताता है कि यह एक बुद्धिमान रचना (intelligent creation) है, केवल संयोग का नतीजा नहीं। संकल्प शक्ति का महत्व
एक जीवंत और संवेदनशील अस्तित्व रखता है, लेकिन पिछला दुनिया में प्राप्त सारा सुविधाएँ उससे छूट जाती हैं। फिर उसे इस बात की आवश्यकता होती है कि उसे सभी चीजें नवीनीकरण के साथ पुनः प्राप्त हों, ताकि वह सुरक्षा और शांति भरी जिंदगी बिता सके। इंसान को पहली जिंदगी का अनुभव इसलिए कराया जाता है ताकि उसके दिल से यह दुआ निकल पड़ेः “ऐ मेरे रब, जिस तरह तूने पहली जिंदगी में बिना किसी योग्यता के मेरी सारी जरूरतें पूरी कर दीं, उसी तरह दूसरी जिंदगी में भी तू अपनी रहमत से मुझे मेरी जरूरतों से बढ़कर अता फ़रमा।”
पहली जिंदगी में मैंने तेरी कृपाओं का प्रारंभिक स्वाद पाया था; अब दूसरी जिंदगी में तू उन्हें मेरे लिए पूर्ण और परिपूर्ण कर दे। पहली जिंदगी में तूने मुझे बिना किसी योग्यता या हक़ के जो कुछ भी दिया, वह सब तेरी ही दया थी—उसी तरह दूसरी जिंदगी में भी, मेरी अयोग्यता के बावजूद, तू मुझे सब कुछ अता कर दे। यदि पहली जिंदगी मेरे लिए तेरी बख्शिशों की शुरुआत थी, तो दूसरी जिंदगी में तू उन बख्शिशों की पूर्णता का प्रबंध कर दे।