सब्र और सहनशीलता
Al-Risala, March 2026, pp. 56–57
By Maulana Wahiduddin Khan
पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन की एक घटना है। एक अकाल पीड़ित इलाके में राहत कार्य के लिए आपने एक यहूदी व्यापारी से कुछ दीनार क़र्ज़ लिए। इस यहूदी का नाम ज़ैद बिन सअना था। ज़ैद बिन सअना से यह तय हुआ कि आप एक निश्चित समय के बाद 80 मिस्कल खजूरें अदा करेंगे। खजूरों की अदायगी के वक़्त में अभी दो-तीन दिन बाक़ी थे कि ज़ैद बिन सअना अचानक आए और बिगड़ते हुए अपने क़र्ज़ का तक़ाज़ा किया। उस समय आपके कंधे पर एक चादर थी। ज़ैद बिन सअना ने चादर को पकड़ कर ज़ोर से खींचा और कहा, “ऐ मुहम्मद, मेरा क़र्ज़ अदा क्यों नहीं करते। ख़ुदा की क़सम, मैं मुत्तलिब की औलाद को जानता हूं, वो सबके सब क़र्ज़चोर हैं।”
सिद्धांत है—जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। हैरानी की बात यह है कि लोग इस वर्तमान जीवन के लिए तो बहुत भाग-दौड़ करते हैं, लेकिन अगले जीवन के बारे में पूरी तरह बेपरवाह बने रहते हैं।