Al-Risala · March 2026

एक बेहतर भविष्य की ओर

Al-Risala, March 2026, pp. 57–2

By Maulana Wahiduddin Khan

यह एक उच्च शिक्षित मुस्लिम व्यक्ति की कहानी है। उन्होंने एक विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद उन्हें एक अच्छी नौकरी मिली। वे इस नौकरी से खुश थे, लेकिन कुछ समय बाद उनके और उनके बॉस के बीच मतभेद हो गया। मतभेद इतना बढ़ गया कि उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद मेरी उनसे मुलाकात हुई। वे बहुत निराश और चिंतित थे। मैंने उन्हें समझाया और फिर उनकी डायरी में ये शब्द लिख दिए:

"कभी-कभी माली एक पेड़ को एक स्थान से उखाड़ता है, केवल इसलिए ताकि वह उस पेड़ को एक बेहतर स्थान पर लगा सके, जहाँ वह अधिक फल-फूल सके" (4 अक्टूबर, 1981)। इस सलाह के बाद उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी, और अंततः वे पहले से भी अधिक सफल हो गए। यह प्रकृति का एक नियम है। यह नियम हर चौबीस घंटे में खामोश भाषा में इंसान को बताया जाता है। हर कोई जानता है कि हमारी दुनिया में हर शाम के बाद फिर से

करत ह आर बाकी सभा लागा के प्रात उनक दिल म केवल नफरत हाता ह। हर व्यक्ति बिना थके बोल रहा है। हर व्यक्ति अपनी ज़रूरतों को अंतिम सीमा तक बढ़ा चुका है। हर कोई अपनी इच्छाओं को अनंत रूप से पूरा करना चाहता है। हर व्यक्ति चाहता है कि वह आराम और सुख की सारी चीजें अपने लिए और अपने बच्चों के लिए जमा कर ले। यह भौतिकता (materialism) की ओर एक पागल दौड़ है, लेकिन इसका परिणाम क्या निकल रहा है? हर व्यक्ति इस एहसास में जीता है कि उसकी इच्छाएं पूरी नहीं हुईं। जो संतोष वह चाहता था, वह उसे नहीं मिल सका। हर महिला और पुरुष इसी हताशा के एहसास में जीते हैं। इस तरह उनकी ज़िंदगी के दिन और रात यूँ ही गुज़रते रहते हैं, जब तक कि उनकी इच्छाओं का घरौंदा हालात के किसी तूफ़ान से टकराकर बिखर नहीं जाता। और अगर परिस्थितियाँ उसे न भी तोड़ पाएं, तो मृत्यु अपने तय समय पर आ ही जाती है और हर व्यक्ति को उसके कठोर निर्णय के सामने झुकने पर मजबूर कर देती है— जैसा कि इससे पहले दुनिया में आने वाले सभी लोगों को विवश हो कर दुनिया से जाना पड़ा। लोग मौत से पहले के अस्थायी जीवन के लिए प्रबंध करने में व्यस्त हैं, जबकि असली आवश्यकता यह है कि मौत के बाद के शाश्वत जीवन के लिए खुद को तैयार किया जाए। मौत से पहले का जीवन एक परीक्षा का जीवन है। इस आधार पर अल्लाह की यह ज़िम्मेदारी है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को वह साधन और परिस्थितियाँ प्रदान करे, जिनके माध्यम से वह अपनी परीक्षा दे सके। लेकिन जहाँ

का लाड-प्यार एक बड़ा चुनाती हो इस लाड-प्यार का पारिणाम यह होता ह कि बच्चों के मन में प्यार का एक काल्पनिक मापदंड बन जाता है। यह काल्पनिक मापदंड माता-पिता के व्यवहार पर आधारित होता है। धीरे-धीरे यह किसी व्यक्ति के मन में इतना गहराई से बैठ जाता है कि वे इसके ख़िलाफ़ सोच भी नहीं सकते। वे इस मापदंड को पूर्ण सत्य मान लेते हैं, और इसके विपरीत सोचना उनके लिए असंभव हो जाता है। इसका अंतिम परिणाम यह होता है कि व्यक्ति यह समझने लगता है कि केवल मेरे माता-पिता ही मुझसे प्यार करते हैं, माता-पिता के अलावा इस दुनिया में मुझसे प्यार करने वाला कोई नहीं है। प्यार का यह मापदंड व्यक्ति के लिए घातक साबित होता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि वह अपने माता-पिता के प्रति अत्यधिक पक्षपाती और सकारात्मक सोच रखता है, जबकि दूसरों के प्रति उसका रवैया बेहद नकारात्मक हो जाता है। वह अपने माता-पिता के बारे में भी सच्चाई से दूर रहता है और दूसरों के बारे में भी वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करता है। मनुष्य अपने बचपन का केवल एक छोटा सा हिस्सा अपने माता-पिता के साथ घर में बिताता है। इसके बाद वह बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है, एक ऐसी दुनिया में जहाँ चुनौतियाँ हैं, प्रतियोगिता है, और जहाँ कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपनी ज़िंदगी को बनाना होता है। ऐसे में, माता-पिता की ओर से अपने बच्चों के प्रति सबसे अच्छी शुभकामना यह

पास खान के लिए मुह है, लेकिन अगर बाहर भाजन का सामान न हो, तो वह खान की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। अब एक ऐसे समय की कल्पना कीजिए, जब आप पूरी तरह से अपने इस अस्तित्व के साथ जीवित होंगे, लेकिन वहां आपकी ज़रूरत के सभी साधन आपसे छिन चुके होंगे। आपके पास आँखें होंगी, लेकिन देखने के लिए रोशनी मौजूद नहीं होगी। आपके पास मुँह होगा, लेकिन खाने की चीजें वहाँ से गायब हो चुकी होंगी। आपके पास पैर होंगे, लेकिन वहाँ संतुलित गुरुत्वाकर्षण वाली ज़मीन आपके पैरों के नीचे मौजूद नहीं होगी। और साथ ही, आप अकेले होंगे, आपके सभी अपने लोग आपका साथ छोड़ चुके होंगे। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। यही स्थिति हर महिला और पुरुष के साथ मौत के बाद सामने आएगी, और मौत हर महिला और पुरुष पर जरूर आनी है। जो भी व्यक्ति आज जीवित है, वह एक दिन मर जाएगा। और फिर मौत के बाद, वह अपने आप को जिस दुनिया में पाएगा, वह वही दुनिया होगी जिसका वर्णन ऊपर किया यह आने वाला दिन हर किसी के लिए तेज़ी से नज़दीक आ रहा है। हर महिला और पुरुष की पहली आवश्यकता यह है कि वह इस आने वाले दिन को समझे और इसके लिए तैयारी करे। वह दिन जब आएगा, तो वह "पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न" (point of no return) पर आएगा। इसके बाद आदमी को केवल भुगतना होगा, और न ही पीछे लौट कर पुनः तैयारी करने का अवसर मिलेगा। जन्म के बाद ही हर महिला और पुरुष का काउंटडाउन (countdown) शुरू हो

गया हा अमरार लोग सोच कि उनके हज म तक़वा का भावना है या सिफ़्र सर-तफ़्राह (outing) की भावना। आम लोग यह सोचें कि वे दीनी फ़ायदे के लिए हज करने जाते हैं या व्यापारिक फ़ायदे के लिए। आलिम यह सोचें कि वे अब्दियत (बंदगी) का सबक़ लेने के लिए बैतुल्लाह (काबा) जाते हैं, या अपनी पेशवाई (नेतृत्व) को ऊँचा करने के लिए। इसी तरह ग़रीब लोग यह सोचें कि हज को उन्होंने अल्लाह से माँगने का ज़रिया बनाया है, या इंसानों से माँगने का। इस हदीस-ए-रसूल में भविष्यवाणी के अंदाज़ में बताया गया है कि जब उम्मत पर ज़वाल (पतन) आएगा, तो उस समय लोगों की स्थिति कैसी होगी। दौर-ए-उरूज (विकास के दौर) में उम्मत की हालत यह होती है कि दीन का अध्यात्मिक पहलू प्रमुख रहता है और उसका मादी (भौतिक) पहलू दबा हुआ रहता है। पतन के दौर में इसके विपरीत स्थिति हो जाती है कि लोगों के बीच दीन का अध्यात्मिक पहलू दब जाता है और भौतिक पहलू प्रमुख हो जाता है। पहले दौर में तक़वा (अल्लाह का भय) को मूल स्थान प्राप्त होता है और भौतिक चीजें केवल आवश्यकता के स्तर पर रहती हैं। इसके उलट, दौर-ए-ज़वाल में भौतिक चीजें ही मूल बन जाती हैं और कुछ ज़ाहिरी व दिखावटी बातों को तक़वा का नाम दे दिया जाता है। यही स्थिति हज और उमरा के साथ भी पेश आती है और इस्लाम की दूसरी इबादतों के साथ भी। जीवन के उस पार

जिसका सफल अदायगी के लिए कुरबानी की आत्मा अत्यंत आवश्यक है। इस कुरबानी की आत्मा को लगातार ज़िंदा रखने के लिए, हज के दौरान मिना में और ईद-उल-अज़हा के रूप में दुनिया भर के मुसलमानी अपने-अपने स्थानों पर कुरबानी करते हैं और अल्लाह को गवाह बनाकर इस आत्मा को जीवित रखने का संकल्प हज और ईद-उल-अज़हा के मौक़े पर जो जानवर की कुरबानी की जाती है, वह असल में किसी मक़सद के लिए दी जाने वाली कुरबानी के इरादे की निशानी है। यह भीतर की भावना का बाहर दिखाई देने वाला रूप है। "It is an external manifestation of internal spirit." इंसान के अंदर पाँच तरह की इंद्रियाँ होती हैं। मानव व्यवहार और मानसिक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जब कोई काम ऐसा हो, जिसमें इंसान की सभी इंद्रियाँ शामिल हों, तो उसकी छाप मन में कहीं अधिक गहराई से बैठ जाती है। अगर इंसान केवल विचार के स्तर पर कुरबानी की भावना पर सोचे, तो यह बात उतनी गहराई तक असर नहीं डाल पाती। कुरबानी इसी कमी को पूरा करने का माध्यम है। हज: एक चेतावनी हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: "लोगों पर एक ऐसा ज़माना आएगा जब अमीर लोग सैर-

हाजरा और इस्माइल का रेगिस्तान में इस तरह बसाने का मक़सद एक नई नस्ल तैयार करना था। उस ज़माने की शहरी आबादियों में मूर्तिपूजक संस्कृति पूरी तरह छा चुकी थी। उस माहौल में जो भी पैदा होता, वह मूर्तिपूजक मानसिकता से प्रभावित हो जाता। इस वजह से, उसके लिए तौहीद के संदेश को समझना मुमकिन न रहता। सभ्य नगरों से दूर रेगिस्तान में हाजरा और इस्माइल को इसलिए बसाया गया, ताकि यहाँ प्राकृतिक वातावरण में उनके ज़रिए एक नई नस्ल तैयार हो—एक ऐसी नस्ल जो मूर्तिपूजक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त हो। पीढ़ी दर पीढ़ी यह प्रक्रिया जारी रही, यहाँ तक कि बनू इस्माइल क़बीला अस्तित्व में आ गया। इन्हीं के अंदर 570 ईस्वी में पैग़ंबर-ए-इस्लाम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब पैदा हुए। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को 610 ईस्वी में अल्लाह ने नबी नियुक्त किया। इसके बाद, आपने तौहीद के मिशन का आरंभ किया। बनू इस्माइल की संतानों में से वही कीमती व्यक्तित्व उभरे, जिन्हें असहाब-ए-रसूल (पैग़ंबर के साथी) कहा जाता है। इन्हीं लोगों को साथ लेकर पैग़ंबर ने इतिहास में पहली बार तौहीद (एकेश्वरवाद) के संदेश को वैचारिक स्तर से आगे बढ़ाकर सामाजिक बदलाव के स्तर तक पहुँचा दिया। हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए ईश्वरीय संदेश की जो महान योजना अंजाम पाई, हज की इबादत दरअसल उसी का एक रिहर्सल है। ज़ुल-हिज्जा महीने की निर्धारित तारीख़ों में दुनिया भर के मुसलमान एक साथ इकट्ठा होकर रिहर्सल के रूप में उस इतिहास को दोहराते हैं, जो हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) और उनकी

नही हा यह सिर्फ एक बबुनयाद बात है, जा अघावश्वासी मानसक्ता (superstitious conditioning) के परिणामस्वरूप पैदा हुई है। इसके पीछे कोई वैज्ञानिक या बौद्धिक आधार नहीं है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिससला्म) ने एक बार ख़्वाब में देखा कि वे अपने बेटे इस्माईल (अलैहिससला्म) को अपने हाथ से ज़िब्ह (कुर्बान) कर रहे हैं। इस ख़्वाब के मुताबिक़, हज़रत इब्राहीम (अलैहिससला्म) अपने बेटे को ज़िब्ह करने के लिए तैयार हो गए। लेकिन यह एक तम्सीली (symbolic) ख़्वाब था, यानी इसका मतलब यह था कि अब ख़ुदाई योजना के मुताबिक़, अपने बेटे को तौहीद के मिशन के लिए समर्पित कर दो, एक ऐसा मिशन जो अरब के बंजर रेगिस्तान में शुरू होने कुरआन में हज़रत इब्राहीम (अलैहिससला्म) के इस ख़्वाब का ज़िक्र सूरह नंबर 37 में आया है। इसमें बताया गया है कि जब पैगम्बर इब्राहीम (अलैहिससला्म) ने ख़्वाब के बाद अपने बेटे को कुर्बान करना चाहा, तो उस वक़्त अल्लाह के फ़रिश्ते ने उन्हें बताया कि वे बेटे के बदले में एक मेंढा (दुम्बा) ज़िब्ह कर दें। चुनांचे, हज़रत इब्राहीम (अलैहिससला्म) ने ऐसा ही किया। इस बारे में कुरआन में फ़रमाया गया है: “और हमने एक महान कुर्बानी के बदले उसे छुड़ा लिया।” (अस-साफ़्फ़ात,

जैसा कि सहीह अल-बुख़ारी की रिवायत से मालूम होता है, इसके बाद हज़रत इब्राहीम

उल्लिखित नाजवाना न अपना कुर्बानी का प्रताकात्मक (symbolic) इज़हार 25 हज़ार पैसों के रूप में किया। 25 हज़ार पैसे खुद असल कुर्बानी नहीं थे, बल्कि वे असल कुर्बानी का सिर्फ एक प्रतीक (token) थे। यही मामला जानवर की कुर्बानी का है। कुर्बानी के अमल में जानवर की हैसियत सिर्फ प्रतीकात्मक होती है। जानवर की कुर्बानी के ज़रिए एक मोमिन (सच्चा ईमान वाला) प्रतीकात्मक रूप से इस बात का संकल्प करता है कि वह इसी तरह अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की राह में पूरी तरह लगा देगा। इसीलिए कुर्बानी के समय यह कहा जाता है:

"ऐ अल्लाह, यह तूने ही दिया था, अब मैं इसे तेरे सुपुर्द करता हूँ।" जहाँ तक कुर्बानी की आत्मा का सवाल है, उसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो यह सामान्य रूप से स्वीकार की गई सच्चाई है कि ऐसी भावना के बिना कभी कोई बड़ा काम संभव नहीं हो पाता। लेकिन जहाँ तक कुर्बानी के बाहरी रूप का संबंध है—यानी जानवर के ज़िब्ह (कुर्बान) करने का—इस पर कुछ लोग संदेह प्रकट करते हैं।

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