Al-Risala · May 2026

और ताला खुल गया

Al-Risala, May 2026, pp. 52–53

By Maulana Wahiduddin Khan

उसकी नाकाम कोशिश अब झुंझलाहट में बदल चुकी थी। वह काफ़ी देर से ताले पर ज़ोर लगा रहा था। "चाबी तो देखने में सही है। ज़रूर ताले के अंदर कोई ख़राबी है जिसकी वजह से ताला खुल नहीं रहा है," उसने सोचा। उसका गुस्सा अब इस हद तक पहुँच चुका था कि अगला क़दम बस यही रह गया था कि ताला खोलने के लिए वह चाबी की जगह हथौड़े का इस्तेमाल शुरू कर दे।

इस तरह का घटनाएँ एक तरफ़ ख़ुदा के वुजूद का ज़िंदा सुबूत है, और दूसरा तरफ़ यह भी बताती हैं कि इस दुनिया में इंसान तन्हा नहीं है - उसका एक पासबान (रक्षक) है, जो हर मुश्किल वक़्त में उसकी मदद करता है। व्यक्ति के स्तर पर एक व्यक्ति साइकिल पर यात्रा कर रहा था। अचानक उसकी ब्रेक जाम हो गई। वह उतरकर साइकिल मिस्त्री के पास गया। उस साइकिल वाले का ख्याल था कि जिस जगह पर ब्रेक जाम हुई है, मिस्त्री वहीं हाथ लगाएगा और उसे ठीक कर देगा। मगर मिस्त्री ने हथौड़ी उठाई और बिल्कुल दूसरी जगह ठोकना शुरू कर दिया। यात्री अभी अपनी हैरानी ज़ाहिर भी नहीं कर पाया था कि मिस्त्री ने कहा, "बस ठीक है, ले जाइए।" अगले ही पल साइकिल अपने सवार को लेकर फिर से सड़क पर दौड़ रही थी। ठीक यही मामला इंसानी ज़िंदगी का भी है। अक्सर ऐसा होता है कि आदमी ज़ाहिरी कारणों को देखकर समझ लेता है कि खराबी यहीं है। वह उसी जगह पर ज़ोर आजमाना शुरू कर देता है, मगर खराबी दूर नहीं होती। इसकी वजह यह है कि ख़राबी की असली जड़ कहीं और होती है, और जब तक असली जड़ को ठीक न किया जाए, तब तक ख़राबी दूर नहीं हो सकती। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी गिरोह के अंदर एकता नहीं है, उस पर जुल्म

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