अपना देवा के नाम पर बलिदान करने का इरादा किया।
Al-Risala, May 2026, pp. 54–3
By Maulana Wahiduddin Khan
ह्वेन त्सांग ने बहुत विरोध किया। उसने कहा कि वह एक बौद्ध साधु है और केवल सत्य की तलाश में निकला है। लेकिन डाकुओं ने उसकी एक न सुनी। ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब उसकी मौत यक़ीनी है। उस वक़्त वह नाव में सवार था। आख़िर में वह ख़ामोश हो गया और ध्यान व प्रार्थना में लीन हो गया। जब वह पूरी तरह ध्यान और प्रार्थना में मग्न था, समुद्र में एक भयंकर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। लहरों ने नाव को पूरी तरह घेर लिया। यह दृश्य देखकर डाकू इस क़दर डर गए कि उन्होंने ह्वेन त्सांग को छोड़ दिया और शर्मिंदा होकर उससे माफ़ी माँग्ने लगे। जैसा कि वर्णन किया गया है:
"While he was absorbed in meditation, a violent storm arose that buffeted the boat. The pirates were so terrified that they freed the holy monk and asked for forgiveness and repentance." (8/1126) चीनी यात्री के साथ जो यह वाक़या पेश आया, वह बिल्कुल कुरआन के इस बयान के मुताबिक़ है:
महान सहाबा का यह घटना हम बताता है कि दीन में जिस चीज़ का "ज़िक्र" कहा गया है, वह असल में क्या है। ज़िक्र केवल ज़ुबान से अल्फ़ाज़ दोहराने का नाम नहीं, बल्कि वह एक अंदरूनी तूफ़ान होता है, जो एक बंदे के दिल में उस वक़्त उठता है जब वह अपने रब को सच्चे दिल से याद करता है। जो व्यक्ति अल्लाह पर सच्चा ईमान रखता हो, जब वह उसे याद करता है, तो उसकी अजमत से उसका दिल कांप उठता है, और उसके सामने पेशी का ख़्याल उसे हिला देता है। उस वक़्त उसकी दिली हालत ख़ुद-बख़ुद शब्दों के रूप में बाहर निकलने लगती है — यही असली ज़िक्र है। ख़ुदा का ज़िक्र असल में ख़ुदा को अपने दिल में उतारने का नाम है — ऐसे अल्लाह को, जिसकी महिमा को पहाड़ भी सहन नहीं कर सकते—उस तूफ़ानी छण में, जो रब्बानी शब्द इंसान की ज़ुबान से निकलते हैं, वही ज़िक्र ज़िक्र का मक़सद कुछ शब्दों को पा लेना नहीं है, बल्कि ख़ुदा को पा लेना है। ख़ुदा की याद या उससे दुआ, इंसान और ख़ुदा के बीच संपर्क का ज़रिया है। जब इंसान दिल से पुकारता है, उसी वक़्त ख़ुदा की तरफ़ से उसका जवाब भी आ जाता है। ह्वेन त्सांग (Hsuan Tsang) एक चीनी बौद्ध साधु था। उसका जन्म 602
का निशाना बन जाता हो। अगर आदमी सब्र और सूझबूझ से काम ल आर मुक़ाबले के पहले ही चरण में प्रतिद्वंद्वी के वार को ख़ाली जाने दे तो बहुत जल्द ऐसा होगा कि प्रतिद्वंद्वी ख़ुद अपनी कार्रवाइयों के नतीजे में अपने को शस्त्रहीन कर चुका होगा। याद रखिए, कोई भी शख़्स जो आपके मुक़ाबले में आता है उसके पास हमेशा 'तीन' ही गोलियां होती है। अनगिनत गोलियां किसी के पास नहीं होतीं। अगर आप यह होशियारी दिखाएं कि मुक़ाबले की शुरूआत में किसी तरह अपने को निशाने से हटा लें तो इसके बाद निश्चित रूप से ऐसा होगा कि दुश्मन अपनी 'तीन गोलियों' को ख़त्म करके ख़ाली हाथ हो चुका होगा। अब ज़्यादा बेहतर तौर पर वह वक़्त आ जाएगा कि आप उसको हर देश और हर मुल्क के मुसलमान भी ऐसा ही करते हैं कर सकें। यह कामयाबी हर प्रतिद्वंद्वी और हर शत्रु के ऊपर हासिल की जा सकती है। बशर्ते कि मुक़ाबले के दौरान आदमी अपने होशोहवास न खोए। ख़ुदा का ज़िक्र क़ैस बिन अभी हाज़िम से روایت है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा (रज़ियल्लाहु अन्हु) अपनी बीवी की गोद में सिर रखे हुए थे कि अचानक वे रोने लगे। उनकी बीवी भी उनके साथ रोने लगीं। उन्होंने पूछा, "तुम क्यों रोईं?" बीवी ने कहा, "मैंने आपको रोते देखा तो मैं भी रोने लगी।" अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने कहा, "मुझे अल्लाह तआला का यह कथन याद
इस छोटा-सा घटना में बहुत बड़ा सबक़ है। ज़्यादातर प्रातद्वंद्री से मुक़ाबिल का बेहतरीन तरीक़ा यह होता है कि शुरू में उसके वार को ख़ाली कर दिया जाए, यहां तक कि उसके हथियार की 'तीन गोलियां' ख़त्म हो जाएं। फिर उससे मुक़ाबला करना निहायत आसान होगा। मसलन एक व्यक्ति आपसे ज़्यादा ताक़तवर है और वह आपकी किसी बात पर उत्तेजित हो जाता है। जब वह आप पर बिगड़ना शुरू करे तो पहले आप उसके वार को ख़ाली करने की कोशिश करें, यानी बिल्कुल चुप होकर उसकी बात सुनते रहें, यहां तक कि जब उसके शब्द ख़त्म हो जाएं और उसकी भड़ास निकल जाए उस वक़्त गंभीरता के साथ स्थिति के बारे में उसको बताएं। अगर आप शुरू में इस क़िस्म का सब्र दिखाएं तो आप निश्चित रूप से सफल रहेंगे क्योंकि अब वह अपने हथियार की तीन गोलियां ख़त्म कर चुका हैं और अब बहुत आसानी के साथ उसका मुक़ाबला किया जा सकता है। इसी तरह कुछ लोग हैं, जो आपके ख़िलाफ़ एकजुट होकर आ गए हैं और आपको मिटा देना चाहते हैं। ग़ौर कीजिए तो यह एकजुटता सिर्फ़ इस आधार पर होगी कि आप उनके सामने उनके प्रतिद्वंदी बनकर खड़े हुए हैं। अगर आप सूझ-बूझ का तरीक़ा इख़्तियार करें और कुछ देर के लिए अपने को निशाने से हटा दें तो आप देखेंगे कि उनकी एकजुटता टूट रही है। उनकी एकजुटता के हथियार की गोली आपका प्रतिद्वंदी बनकर खड़ा होना था। जब आपने अपने को प्रतिद्वंदी के मुक़ाम से हटा दिया तो जैसे आपने उनकी तीनों
(peaceful) दुनिया बन जाएगा। उस समय शांति का स्थान सामान्य (rule) का होगा और हिंसा का स्थान केवल अपवाद (exception) का। सब्र का हथियार 6 सितंबर 1980 की बात है। श्रीमती कमलेश (22 साल) शाहदरा (दिल्ली) की एक सड़क पर चल रही थीं। उनके गले में सोने की जंजीर थी। अचानक अशोक नाम का एक व्यक्ति जिसकी उम्र 25 साल थी झपटा और श्रीमती कमलेश की जंजीर खींच कर भागा। पुलिस कांस्टेबल किशन चंद त्यागी (42 साल) उस वक़्त ड्यूटी पर घूम रहे थे। किसी ने उनको इस घटना की सूचना दी। वह तलाश करते हुए एक वाल्मीकि मंदिर में पहुंचे, जहां मुजरिम मौजूद था। पुलिस की वर्दी देखते ही वह उठ खड़ा हुआ। किशन चंद ने उसका पीछा किया। मुजरिम के पास एक रिवाल्वर था। उसने फ़ायर किया तो उसकी गोली किशन चंद की आंख के नीचे उनके चहरे और गर्दन को ज़ख्मी करती हुई गुज़र गई। उन्होंने चिल्ला कर कहा, "एक बार तूने मुझे मार दिया, पर दोबारा तू नहीं मार सकता। मुझे मालूम नहीं था कि तेरे पास रिवाल्वर है।" अब वह चौकन्ना हो गए। मुजरिम ने दोबारा गोली चलाई। पर हर बार वह निहायत फ़ुर्ती के साथ बैठ गया और उसके वार को ख़ाली कर दिया। किशन चंद बिना किसी डर के अकेले मुजरिम का पीछे करते रहे, जबकि 'दुश्मन' के पास रिवाल्वर था और उनके अपने पास लाठी भी नहीं थी। दौड़ते-दौड़ते आख़िरकार साढ़े चार फुट की एक चारदीवारी सामने आ गई। मुजरिम उस पर कूद गया। किशन चंद ने भी फौरन छलांग लगाई और दूसरी तरफ़ जाकर उसको पकड़ लिया। "एक सशस्त्र मुजरिम को दौड़ाते हुए आपको डर नहीं लगा?" एक अख़बार के
यह है कि मर बाद इतिहास में एक ऐसा दौर आने वाला है जो पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता (religious freedom) का युग होगा। आस्थावान लोग स्वतंत्र होंगे कि वे धरती के जिस हिस्से में चाहें धार्मिक गतिविधियाँ कर सकें, चाहे वह इबादत की गतिविधि हो या दीन की शिक्षा को लोगों तक पहुँचाने की वर्तमान युग में पैग़म्बर-ए-इस्लाम की यह भविष्यवाणी पूरी तरह सत्य साबित हो चुकी है। आज की दुनिया में आस्थावान लोग हर धार्मिक गतिविधि के लिए स्वतंत्र हैं। अब केवल एक गतिविधि वर्जित है, और वह है धर्म के नाम पर हिंसा। हिंसा का बड़ा रूप युद्ध है और हिंसा का छोटा रूप यह है कि आप दूसरों के लिए समस्या (problem) बन जाएँ। 'पूरी धरती मस्जिद बन जाएगी' का अर्थ यह है कि पूरी धरती और उस पर रहने वाले सभी लोग व्यावहारिक रूप से धर्म के समर्थक (supporter) बन जाएँगे। दुनिया की सभी जातियाँ या तो धर्म की समर्थक बन जाएँगी या कम से कम तटस्थ (indifferent)। इक्कीसवीं सदी व्यावहारिक रूप से इसी प्रकार की आज जो लोग नफ़रत और हिंसा में जी रहे हैं, वे यह घोषणा कर रहे हैं कि वे हर दृष्टि से अनभिज्ञ हैं – न तो वे समय की परिस्थितियों से वाक़िफ़ हैं और न ही अपने पैग़म्बर की बताई हुई बातों से।
शुरू कर दत ह ताकि जा चीज़ व शांतिपूर्वक हासिल नहा कर सक, उस हिस्सा के ज़रिए हासिल कर लें। असल बात यह है कि संतोष से इंसान के अंदर शांति का स्वभाव पैदा होता है, और असंतोष से हिंसा का। संतोष इंसान को यह एहसास देता है कि वह पहले से ही बहुत कुछ पा चुका है, और जो खुद को पाया हुआ समझता है, वह कभी झुंझलाहट या हिंसा का शिकार नहीं होता। इसके विपरीत, वह इंसान जो असंतोष की मानसिकता में ग्रस्त हो, वह हमेशा हीनभावना का शिकार रहेगा। उसका यह एहसास उसे लगातार उकसाता रहेगा कि जो कुछ उसने नहीं पाया, उसे किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश करे। यदि वह देखता है कि वह उस चीज़ को शांतिपूर्ण तरीके से नहीं पा सकता, तो वह हिंसक तरीकों का सहारा लेकर उसे हासिल करना चाहेगा। वह उन सभी लोगों को अपना दुश्मन समझेगा, जिन्हें वह अपनी इच्छा की राह में रुकावट समझता है। वह उन लोगों से नफ़रत करेगा, उनके ख़िलाफ़ हथियार जमा करेगा। जबकि हक़ीक़त यह है कि यह सब कुछ इसलिए होगा क्योंकि वह अल्लाह द्वारा दिए गए पर राज़ी नहीं हो सका, वह संतोष के बजाय असंतोष का शिकार हो गया। पूरी धरती मस्जिद बन गई
उस समय स्थिति इतना ख़राब था कि मक्का से निकल कर सीधे मदाना जाना ख़तरे से खाली न था। इसलिए आप जब मक्का छोड़ कर निकले तो तीन दिन तक आप सौर नामक गुफ़ा में छुपे रहे, जो एक कठिन रास्ते वाले पहाड़ के ऊपर तंग जगह पर स्थित थी। फिर भी आपके दुश्मन आपको खोजते हुए वहां भी पहुंच गए। आप अपने दोस्त अबू बक्र के साथ गुफ़ा में थे और आपके दुश्मन तलवारें लिए हुए गुफ़ा के इतने पास खड़े थे कि आप उनके पैरों को देख सकते थे। मौत आपके बिल्कुल क़रीब पहुंच चुकी थी। हज़रत अबू बक्र यह देख कर बहुत घबराए। उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कहा कि वे तो यहां भी आ गए। आपने बहुत इत्मीनान के साथ जवाब दिया, "ऐ अबू बक्र, उन दो के बारे में तुम्हारा क्या विचार है, जिनका तीसरा अल्लाह हो?" (सहीह अल- बुखारी, हदीस संख्या 4663)
यह वाक्य तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) और विश्वास का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। इस वाक्य में इन्सान 'तवक्कुल' के सर्वोच्च और अंतिम शिखर पर नज़र आता है। कट्टरता का कारण असंतोष पैग़म्बर-ए-इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की एक हदीस इन शब्दों में आई है: "قد افلح من أسلم ورزق كفافاً وقنعه الله بما آتاه" (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1054)
अर्थात, वह व्यक्ति सफल हुआ जिसने इस्लाम अपनाया, जिसे आवश्यकता के
कि उन्हें इससे भी ज़्यादा मिल रहा है। व्यापारियों ने कहा, "कौन आपका इससे ज़्यादा दे रहा है, जबकि मदीने के जितने "व्यापारी हैं सब यहां जमा हैं।" हज़रत उस्मान ने कहा, "मुझे हर एक दिरहम के बदले दस दिरहम मिल रहा है। क्या तुम मुझे इससे ज़्यादा दे सकते हो?" उन्होंने कहा, "नहीं।" हज़रत उस्मान बोले, "अल्लाह ने अपनी किताब में फ़रमाया है कि जो शख्स नेकी लेकर आएगा तो उसके लिए इसका दस गुना बदला है। (सूरःअल- अनआम, 160) तो ऐ मदीने के व्यापारियो, गवाह रहो कि मैंने यह तमाम खाने का सामान अल्लाह के लिए शहर के ज़रूरतमंदों पर सदक़ा (दान) कर दिया।" (अल-शरीअह, अल-आजुरी, खण्ड 3, पृष्ठ 2012)
यह घटना ख़ुदा के वादे पर यक़ीन की बेहतरीन मिसाल है। ख़ुदा पर ईमान (विश्वास) आदमी में इसी तरह का यक़ीन और विश्वास पैदा करता है। और जिस आदमी में इस तरह का यक़ीन और विश्वास पैदा हो जाए वह स्वार्थ और लाभ-हानि से ऊपर उठ जाता है। उसके हौसले इतने बुलंद हो जाते हैं कि बड़ी से बड़ी कुर्बानी भी उसके लिए मुश्किल नहीं लगती। विश्वास और तवक्कुल पैग़म्बरे इस्लाम (सल्ल०) मक्का में पैदा हुए। आपने अपनी तब्लीग़ (इस्लाम का संदेश लोगों तक पहुँचाने) के आरम्भिक बारह साल इसी शहर में गुज़ारे।
इल्म है और यह घटना इस सच्चे इल्म की आख़िरी शानदार मिसाल है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) बयान करते हैं: अबूबक्र (रज़ि०) के ज़माने में अकाल पड़ा और लोग सख्त परेशान हो गए। अबूबक्र (रज़ि०) ने कहा, "तुम लोग न घबराओ, अल्लाह जल्द ही तुम्हारे लिए खुशहाली पैदा कर देगा।" इसके बाद ऐसा हुआ कि उस्मान (रज़ि०) का व्यापारिक क़ाफ़िला सीरिया से आया। इसमें एक हज़ार ऊंट थे और सब के सब गेहूं और अन्य खाने की चीज़ों से लदे हुए थे। यह ख़बर मदीने में फैली तो शहर के व्यापारी उस्मान (रज़ि०) के घर पहुंचे। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया। वह बाहर आए। उनके पास एक चादर थी, जिसको वह अपने कंधे पर इस तरह डाले हुए थे कि उसका एक सिरा सामने की तरफ़ लटक रहा था और दूसरा सिरा पीछे की तरफ़। उस्मान (रज़ि०) ने पूछा कि तुम लोग क्यों आए हो और मुझसे क्या चाहते हो? व्यापारियों ने कहा "हम को यह बात पता चली है कि आपके पास एक हज़ार ऊंट गेहूं और खाने का सामान आया है। हम उनको खरीदना चाहते हैं। आप हमें यह खाद्य सामग्री बेच दें, ताकि हम इसको मदीने के ज़रूरतमंदों तक पहुंचा सकें।" उस्मान (रजि.) ने कहा कि अंदर आओ और घर में बैठ कर बात करो। वे लोग घर में दाखिल हुए तो देखा कि खाद्य सामग्री के एक हज़ार ढेर घर के अंदर पड़े हुए हैं।
बैठकर अपने सेनापात सअद बिन अबी वक्कास (रज़ि०) के पास पहुचा जब सअद (रज़ि०) को पता चला तो उन्होंने कहा:
"ख़ुश हो जाओ! ख़ुदा की क़सम, अल्लाह ने हमें इनके राज्य की चाबियाँ दे दी हैं। (यानि इसे उनकी ज़मीन जीतने की निशानी समझो)" (अल-बिदाया व अल-निहाया, खंड 7, पृष्ठ. 42)। एक ही मा'बूद रसूलुल्लाह (सल्ल०) की वफ़ात 63 साल की उम्र में मदीने में हुई। उस समय लोगों में अजीब दीवानगी छा गई। बहुत से लोगों को यह विश्वास ही नहीं होता था कि आपका इन्तक़ाल हो सकता है या इन्तक़ाल हो गया। हज़रत उमर फ़ारूक़ इस दीवानगी में सबसे आगे थे। वह मदीने की मस्जिद नबवी में तलवार लेकर खड़े हो गए और कहने लगे कि जो शख़्स कहेगा कि रसूलुल्लाह नहीं रहे मैं इस तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दूंगा। मस्जिद नबवी में ज़बरदस्त तनाव और सन्नाटा था लोग बहुत हठात् और परेशान नज़र आ रहे थे। इतने में हज़रत अबूब्रक वहां आए और उन्होंने इस स्थिति को भांपा और इसके बाद मस्जिद के एक तरफ़ भाषण करने को खड़े हो गए। अपने भाषण में उन्होंने यह ऐतिहासिक वाक्य कहा: “जो शख़्स