अपनी कमज़ोरी
Al-Risala, July 2026, pp. 56–2
By Maulana Wahiduddin Khan
रॉबर्ट एम्मियन (Robert Emmiyan) रूस के प्रसिद्ध एथलीट हैं। उन्हें लंबी कूद के चैंपियन (Top Long-Jumper) के रूप में जाना जाता है। वे 15 फरवरी 1965 को पैदा हुए और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीतकर असाधारण शोहरत हासिल की। एक भारतीय पत्रकार श्री वी. कृष्णास्वामी ने रॉबर्ट एम्मियन का विस्तृत इंटरव्यू लिया। यह इंटरव्यू टाइम्स ऑफ इंडिया (5 अप्रैल 1988) में प्रकाशित हुआ। श्री कृष्णास्वामी ने रॉबर्ट से पूछा कि अंतरराष्ट्रीय खेलों में सफलता पाने के लिए आप क्या करते हैं। रॉबर्ट एम्मियन ने जवाब दिया: "The most important is to get rid of the defects which prevent me from improving my performance. My
प्रसिद्ध वैज्ञानिक आंइस्टीन (Einstein) ने भौतिक विज्ञान के एक सिद्धांत को इस तरह बयान किया हैः "Energy can neither be created nor destroyed."
(ऊर्जा न उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की जा सकती है।)
यह तथ्य ईश्वर की असीम शक्ति का प्रमाण है। इंसान इस दुनिया को सिर्फ इस्तेमाल कर सकता है। वह इसे बदलने या मिटाने में सक्षम नहीं है। इससे यह भी पता चलता है कि इस दुनिया में इंसान की असली हैसियत क्या है। इंसान इस दुनिया का मालिक नहीं है, बल्कि एक अधीन व्यक्ति है। इसी स्थिति को धार्मिक शब्दों में "परीक्षा" कहा जाता है। इंसान इस दुनिया में इसलिए आता है ताकि वह सीमित समय के भीतर अपनी परीक्षा का उत्तर लिख सके। इसके बाद उसे यहां से चले जाना होगा। इसके अलावा किसी और चीज़ पर उसे कोई पूर्ण अधिकार नहीं। कुछ लोग दुनिया की परेशानियों से हार मानकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं। उन्हें लगता है कि खुद को मिटाकर वे अपनी समस्याओं का अंत कर देंगे। लेकिन यह सोचना एक भ्रांति है। जैसे भौतिक दुनिया की ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जा सकता—क्योंकि वह किसी न किसी रूप में बनी रहती है—उसी तरह उस ऊर्जा को भी समाप्त नहीं किया जा सकता जो एक इंसान के रूप में अस्तित्व में आई है। जीवन कोई मिटने वाली चीज़ नहीं, बल्कि एक निरंतरता है, जो इस दुनिया से आगे भी अपना स्वरूप बनाए रखती है।
جھگڑا ہواII اسکے بعد ٹائمس آف انڈیا (29 مئی 1990) کے مطابق جو ہوا، وہ یہ تھا:
"The accused Anant Ram, a habitual drunkard, was enraged when his wife refused to give him the money he asked for. Giving way to his tantrums, he dashed his son Arjun against the floor, thus killing him then and there."
अनंत राम, जो शराब का आदी था, जब उसकी पत्नी ने पैसे देने से मना कर दिया, तो वह गुस्से में आग बबूला हो गया। गुस्से में आपा खोकर उसने अपने 2 साल के बेटे (अर्जुन) को कई बार उठाकर ज़मीन पर पटक दिया। इसके नतीजे में बच्चा वहीं मौके पर मर गया। जब इंसान गुस्से में होता है, तो उस समय वह शैतान के क़ब्ज़े में होता है। उस वक्त वह किसी भी अमानवीय हरकत को अंजाम दे सकता है, यहां तक कि अपने ही बच्चे की निर्दयता से हत्या भी कर सकता है। यह एक ऐसी कमज़ोरी है जो हर इंसान के अंदर मौजूद होती है। समाज में सुरक्षित और कामयाब ज़िंदगी गुज़ारने का तरीका यह है कि इंसान दूसरों को गुस्सा दिलाने से बचे। समझदारी से कोशिश करे कि कोई भी व्यक्ति उस भावनात्मक स्थिति तक न पहुंचे, जब वह शैतान के क़ब्ज़े में चला जाए और पागलपन भरी हरकतें कर बैठे, जैसा कि ऊपर के वाक्य में देखा गया। गुस्सा और बदले की भावना किसी विशेष क़ौम या समुदाय से जुड़ी नहीं है।
लेकिन जापानी उद्योगपतियों ने इस "उकसावे" पर गुस्से का कोई इज़हार नहीं किया। उन्होंने सिर्फ़ एक काम किया — अपने कंप्यूटरों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में लग गए। और नतीजा यह हुआ कि टाइम मैगज़ीन (17 सितंबर 1990) के मुताबिक जापान कंप्यूटर उद्योग में पूरी दुनिया से आगे निकल गया। आज जापान की स्थिति यह है कि फुजित्सु (Fujitsu) कंपनी ने कहा कि उसके नए, बड़े कंप्यूटर प्रति सेकंड 600 मिलियन निर्देशों को पूरा कर सकते हैं, जबकि अमेरिकी आईबीएम के सर्वश्रेष्ठ कंप्यूटर की गति केवल 210 मिलियन निर्देश प्रति सेकंड है। Fujitsu said its largest new computer can perform up to 600 million instructions per second, compared with up to 210 MIPS for IBM's best. (p.47)
उकसावे पर भड़क उठना प्रतिक्रिया (reaction) है, और उकसावे को नज़रअंदाज़ कर अपने निर्माण और मज़बूती पर ध्यान देना कर्म (action) है। इस दुनिया का नियम साफ़ है — जो लोग कर्म पर ध्यान देते हैं, वे तरक्की करते हैं; और जो प्रतिक्रिया में उलझे रहते हैं, वे बर्बाद हो कर रह जाते हैं। गुस्सा न दिलाओ 29 मई 1990 को दिल्ली के अखबारों में एक सीख देने वाली खबर प्रकाशित
का अथ ह नागवार बातो का बदश्त करना, गुस्म के बावजूद शांत रहना, दूसरों के अनुचित व्यवहार पर भी बदले में बुरा व्यवहार न करना, निराशाजनक परिस्थितियों में भी हौसला न खोना, नुक़सान के बाद भी उम्मीद बनाए रखना, अंधेरे हालात में भी रोशनी की किरण देख लेना । सबसे बड़ी कुर्बानी यह है कि इंसान के सीने में ग़ुस्से और बदले की आग भड़क उठे, मगर वह उसे अपने भीतर ही बुझा दे। कोई उसे तकलीफ़ दे, फिर भी वह उसके बारे में बदगुमान न हो। अगर इंसान का सामना नकारात्मक परिस्थितियों से हो, तब भी वह सकारात्मक सोच पर क़ायम रहे – हालात से ऊपर उठकर जिए, हालात के भीतर नहीं। कर्म, न कि प्रतिक्रिया अमेरिका की कंपनी आईबीएम (IBM) कंप्यूटर के क्षेत्र में इतनी आगे थी कि उसे कंप्यूटर की दिग्गज कंपनी (computer giant) कहा जाता था। कुछ साल पहले इसके अधिकारियों ने जापान की कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था – “जब आईबीएम छींकती है, तो जापान के कंप्यूटर निर्माता उड़ जाते हैं।”
When IBM sneezes, Japanese computer makers are
तरक़्क़ी है— इसके सिवा और कोई तरक़्क़ी इस दुनिया में असरदार नहीं। क़ीमत का मसला मौलाना फ़रीद अल-वहीदी जद्दा में रहते हैं। उन्होंने 1 नवंबर 1991 की एक मुलाक़ात में एक बहुत अर्थपूर्ण वाक्य कहा: जो व्यक्ति माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करना चाहता है वह कभी अपने जूतों की क़ीमत नहीं देखता। One who wants to conquer the Mount Everest never counts the cost of his shoes. अगर आपके सामने छोटा मक़सद हो तो आप उसे मामूली कोशिश से हासिल कर सकते हैं। लेकिन अगर आपने अपने लिए कोई बड़ा लक्ष्य चुना है, तो यह भी समझना होगा कि बड़ा लक्ष्य बड़ी क़ीमत भी माँगता है। जो व्यक्ति बड़ा मक़सद पाना चाहता है, उसे बड़ी क़ीमत चुकाने के लिए भी तैयार रहना बड़ी कामयाबी किसी की जागीर नहीं। हर इंसान बड़ी कामयाबी तक पहुँच सकता है। इसके बावजूद हम देखते हैं कि बहुत कम लोग बड़ी कामयाबी हासिल करते हैं, और इसकी वजह यही है कि वे उस कामयाबी की क़ीमत नहीं देते। बाज़ार में कम कीमत पर कम चीज़ मिलती है और ज़्यादा कीमत पर
अपना आंख पूरी तरह खुला रखो, लेकिन शादी के बाद आधा बंद कर लो। Keep your eyes open before marriage, half shut afterwards. इसका मतलब यह है कि विवाह से पहले अपने जीवन साथी के बारे में पूरी जानकारी हासिल करो, मगर विवाह के बाद बातों को कम से कम जानने की कोशिश करो, अधिक छानबीन न करो। इसी बात को किसी ने सरल शब्दों में यूँ कहा कि “शादी से पहले परखो, और शादी के बाद निभाओ।” कोई भी व्यक्ति पूर्ण या आदर्श नहीं। इसलिए रिश्ता तय करने से पहले जाँच-पड़ताल ज़रूर करनी चाहिए, लेकिन रिश्ता होने के बाद अपने जीवन साथी की अच्छाइयों को देखना चाहिए और उसकी कमियों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए। इस दुनिया में पूर्णता या आदर्श प्राप्त करना असंभव है। साथ ही यह भी ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ एक व्यक्ति को आदर्श लगे, वही दूसरे को भी वैसी ही लगे। इस आधार पर चाहे कोई व्यक्ति कितना भी सही हो, वह दूसरे को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सकता। दोनों पक्षों को एक-दूसरे में कुछ न कुछ कमियाँ ज़रूर दिखेंगी। अब एक रास्ता यह है कि दूसरे की कमी पर झगड़ो और रिश्ता तोड़ लो, लेकिन
कथन शामिल था। उदाहरण के तौर पर एक कथन यह थाः “Our attitude determines our altitude.”
(हमारा मानसिक रवैया हमारी ऊंचाई को निर्धारण करता है।) इसी तरह, इस स्टॉल पर कई प्रेरणादायक पोस्टर भी थे। एक पोस्टर में ऊपर माचिस की एक तीली दिखाई गई थी। उसके नीचे लिखा था कि माचिस की तीली का एक सिर होता है, लेकिन उसमें दिमाग नहीं होता। इसलिए जब भी रगड़ होती है, वह तुरंत जल उठती है। हमें इस छोटी सी माचिस की तीली से सीखना चाहिए। हम और आप सर रखते हैं और इसी के साथ दिमाग भी, इसलिए हमें चाहिए कि हम भड़कें नहींः “A match-stick has a head, but it does not have a brain. Therefore, whenever there is a friction, it flares up immediately. Let us learn from this humble match-stick. You and we have heads as well as brains. Therefore, let us not react on impulse.” एक इंसान वह है जो भड़काने वाली बात पर तुरंत भड़क उठता है। वह फौरन भावनाओं में आकर प्रतिक्रिया देता है। ऐसा इंसान हमेशा नाकाम रहेगा। दूसरा इंसान वह है जो भड़काने वाली बात के बावजूद संयम में रहता है। वह ठंडे दिमाग से सोचता है, फिर कार्रवाई करता है। ऐसा इंसान हमेशा कामयाब रहेगा। दूसरा इंसान वास्तव में "इंसान" है, जबकि पहला सिर्फ माचिस की एक तीली है।
کے ویاپاری جاپانی سامان اپنی دکانوں پر رکھنا اپمان سمجھتے تھے پھر صرف 40 वर्षों में जापान ने इतनी क्रांतिकारी तरक्की कैसे हासिल कर ली? एक अमेरिकी विद्वान विलियम ओयूची (William O'uchi) के अनुसार, इसका रहस्य उनके कर्मचारियों के अंदर "प्रेरणा" (motivation) पैदा करना है। जापानियों ने अपनी प्राथमिक शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा किया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षकों को ऊंची तनख्वाह और प्रोफेसर्ज़ जैसी इज़्ज़त दी, ताकि बेहतरीन शिक्षक उनकी नई पीढ़ी को शिक्षा दे सकें। उन्होंने अपने लोगों में गहराई से यह चेतना पैदा की कि उद्योग में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ "गुणवत्ता" आधुनिक जापान में हर जगह क्वालिटी कंट्रोल सर्कल स्थापित हैं। 1980 तक एक लाख क्वालिटी कंट्रोल सर्कल पंजीकृत हो चुके थे। इसके अलावा, कहा जाता है कि जापान में दस लाख गैर-पंजीकृत क्वालिटी सर्कल भी मौजूद हैं। फरवरी 1992 में दिल्ली में किताबों की प्रदर्शनी (book fair) आयोजित हुई। 7 फरवरी को मैं भी इसे देखने गया। अलग-अलग स्टॉल देखते हुए एक जगह पहुंचा, तो वहां के बोर्ड ने मेरा ध्यान खींच लिया। बोर्ड पर लिखा था: "थिंक इनकॉर्पोरेटेड" (Think Incorporated)।
पक्ष का विरोध आपके सफर को तुरंत रोक देता है। तब सफर को टाल कर सारी ऊर्जा विवाद में खर्च होने लगती है। इसलिए बेहतर और कामयाब तरीका ये है कि दूसरे पक्ष की बात का ध्यान रखते हुए जो भी रास्ता निकल रहा हो, उसे अपना लिया जाए। वर्तमान को भविष्य पर छोड़ते हुए अपना सफ़र जारी रखा जाए। दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारने का यही समझदारी भरा तरीका है।