Al-Risala · January 2026

सादा ज़िन्दगी

Al-Risala, January 2026, pp. 54–2

By Maulana Wahiduddin Khan

इस्लामी ख़लीफ़ाओं के ज़माने में धन और सत्ता, दोनों में बेपनाह वृद्धि हुई थी। इसके बावजूद ख़लीफ़ा बिल्कुल सादा ज़िन्दगी गुज़ारते थे। सभी इतिहासकारों ने इसे माना है। मांटगोमरी वॉट (Montgomery Watt) ने लिखा है कि मुस्लिम ख़लीफ़ा जो एक विशाल साम्राज्य के शासक थे, वे अब भी मदीने में सादा तरीके से रहते थेः The ruler of what was now a vast empire still lived a very simple life in Medina, and had not so much as a bodyguard. The Majesty That Was Islam, (1984)

बट का घोड़ा भी शामिल था, पर जब दौड़ हुई तो एक मिस्त्री (ग़ैर-मुस्लिम) का घोड़ा आगे बढ़ गया। मिस्त्री ने विजय के जोश में कोई ऐसा वाक्य कहा जो गवर्नर के बेटे (मोहम्मद बिन अम्र बिन आस) को बुरा मालूम हुआ और उसने उस मिस्त्री को कोड़े से मार दिया। कोड़ा मारते हुए उसने कहा, "यह लो, और मैं शरीफ़ों की औलाद हूं। हज़रत अनस बिन मालिक इस घटना को बयान करते हुए कहते हैं कि मिस्त्री (ग़ैर-मुस्लिम) मिस्र से चलकर मदीना पहुंचा और ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ से शिकायत की कि गवर्नर के लड़के ने इस तरह उसको कोड़े से मारा। हज़रत उमर ने कहा, "तुम यहां ठहरो" और तुरन्त अपने एक ख़ास आदमी को मिस्र भेजा कि अम्र बिन आस और उनके बेटे मोहम्मद बिन अम्र जिस हाल में हों उनको लेकर मदीना आओ। लिहाज़ा वे लोग लाए गए। जब वे मदीना पहुंचे तो हज़रत उमर ने कहा, "मिस्त्री कहां है? ये कोड़ा लो और इस शरीफ़ ज़ादे

इसके बाद मिस्त्री ने कोड़ा लिया और मिस्र के गवर्नर के सामने उसके बेटे को मारना शुरू किया। वह मारता रहा, यहां तक कि उसको ज़ख़्मी कर दिया। हज़रत उमर बीच-बीच में कहते जाते थे कि "शरीफ़ ज़ादे को मारो" जब वह मार चुका तो हज़रत उमर फ़ारूक़ ने कहा, "इनके पिता अम्र बिन आस के सिर पर भी मारो, क्योंकि ख़ुदा की क़सम इनके बेटे ने सिर्फ़ अपने बाप की बड़ाई के ज़ोर पर तुमको मारा था।"

खुदा के अलावा किसी आर न पैदा किया हा। इसका मतलब यह ह कि हर आदमी के अन्दर वही फ़ितरत है जो किसी दूसरे के अन्दर है। हर आदमी के अन्दर अच्छे और बुरे की वही तमीज़ मौजूद है जो किसी दूसरे के अन्दर पाई इसके साथ ही हर इंसान के अंदर एक अहंकार भी छिपा होता है। यही अहंकार सारी परेशानियों की जड़ बनता है। लेकिन अल्लाह की एक खास रहमत यह है कि उसने हर इंसान के अहंकार को शुरुआत से ही दिल के अंदर सुला कर रखा है—वह जागा हुआ नहीं होता। समझदारी इसी में है कि हम उस अहंकार को सोया रहने दें, उसे कभी जगने न दें। जब इंसान का अहंकार सोया रहता है, तब वह अपनी असली, सीधी-सादी और नेचुरत हालत में होता है। उस समय वह वही करता है जो असली इंसानियत की मांग है। इंसान तभी बुरा बनता है जब उसका अहंकार जगा इंसान की समझदारी इसी में है कि वह किसी दूसरे के अहं को जगाने से पूरी तरह बचे। और अगर कभी किसी का अहंकार भड़क भी जाए, तो समझदारी से तुरंत उस आग को ठंडा कर दे। जो लोग अक्लमन्दी के इस तरीके को इख़्तियार कर लें, उनको कभी दूसरों की तरफ़ से शिकायत न होगी, चाहे वे एक मुल्क में रहते हों या दूसरे मुल्क में।

हिन्दुआ म हमन जा अख़्लाक़ और शिष्टाचार पाया वह अख़्लाक़ हमन मौजूदा मुसलमानों में नहीं पाया। इसी तरह उन्होंने बताया कि 1982 में मैं 'तरावीह' सुनाने के लिए बंगलोर गया हुआ था। एक दिन मैं बंगलोर से कोरमहल्ली स्कूटर से जा रहा था। रास्ते में मेरे स्कूटर का पैट्रोल ख़त्म हो गया। कुछ दूर तक मैं स्कूटर को धकेल कर ले गया। फिर सड़क के किनारे नारियल का एक बाग़ दिखाई दिया। उसके अन्दर एक कार खड़ी हुई थी। मैं बाग़ के अन्दर गया। वहां एक हिन्दू बैठा हुआ था। मुझको देखते ही उसने अपने आदमी से कहा कि एक कुर्सी ले आओ। मुझको कुर्सी पर बिठा कर पूछा कि हज़रत क्या काम है? मैंने कहा कि मेरी गाड़ी में पैट्रोल ख़त्म हो गया है। यहां से आठ किलो मीटर दूर जाने पर मुझे पैट्रोल मिल सकेगा। मैं कार देख कर यहां आ गया कि शायद यहां से मुझे पैट्रोल मिल जाए। उस हिन्दू ने फ़ौरन अपने ड्राइवर से कहा कि देखो अगर बाहर पैट्रोल हो तो इन साहब की गाड़ी में डाल दो। और अगर बाहर न हो तो अपनी गाड़ी में से निकाल कर इनको पैट्रोल दे दो। पैट्रोल लेने के बाद मैंने अपनी जेब से बीस रुपए का नोट निकाला, ताकि पैट्रोल की क़ीमत अदा कर दूं। अब हिन्दू फ़ौरन हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। उसने कहा कि हमको माफ़ कीजिए। पैसे की ज़रूरत नहीं। हमको बस आपकी दुआ चाहिए।

नौजवान से कहा कि मौलाना अब चुप है और अपनी ग़लती मान रह है तो तुम क्यों उनके ख़िलाफ़ इतना ज़्यादा चीख रहे हो? उन्होंने मौलाना इकरामुद्दीन साहब से कहा कि आप घबराएं नहीं, यह आपका कुछ नहीं आख़िरकार हिन्दू नौजवान चुप हो गया। मौलाना इकरामुद्दीन साहब अपनी जगह पर बराबर खड़े रहे। कुछ देर के बाद नौजवान ने बेरुखी के साथ मौलाना इकरामुद्दीन साहब से पूछा, “आप कहां से आ रहे है?” उन्होंने बताया कि खड़क बाज़ार से। नौजवान ने कहा कि खड़क बाज़ार में एक मौलाना इकरामुद्दीन हैं। क्या आप उनको जानते हैं। वह बहुत अच्छे आदमी हैं। मेरी मां उनके पास गई थी और उनसे तावीज़ लाई थी। उस तावीज़ से बहुत फ़ायदा हुआ। मैं उनसे मिलना चाहता हूं। मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने मुसकराते हुए कहा कि अभी तो वह सफ़र में है। कल तक वह वहां पहुंच जाएंगे, उस वक़्त उनसे मुलाकात हो सकती है। हिन्दू नौजवान ने पूछा कि आपको कैसे मालूम कि वह सफ़र में हैं। उन्होंने जवाब दिया कि जिस मुसाफिर से तुम बात कर रहे हो वही मौलाना यह सुनते ही हिन्दू नौजवान ने मौलाना इकरामुद्दीन के पांव पकड़ लिए। उसने कहा कि मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत भारी ग़लती हो गई। इस ग़लती पर जी चाहता है कि मैं अपने आपको मारूं। वह नौजवान अपनी

رہن وال ها | 7 फ़रवरी 1990 का मुलाक़ात में उन्होंने अपन कुछ अबुभव बताए, जिनमें बहुत बड़ा सबक़ है। 1966 की बात है। मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने गंगा को स्टीमर से पार किया। वह बरारी रेलवे स्टेशन पर भागलपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रैन पर सवार हो गए। ट्रैन में भीड़ थी। एक जगह सीट पर डालडा का डिब्बा रखा हुआ था। वह डिब्बे को खिसका कर वहां बैठ गए। थोड़ी देर के बाद एक हिन्दू नौजवान आया। यह डिब्बा उसी का था। वह उसको सीट पर रख कर बाहर चला गया था। जब उसने देखा कि डिब्बा अपनी जगह से हट गया है तो उसने पूछा कि उसको किसने हटाया है? मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने कहा कि मैंने हटाया है। यह सुनते ही वह सख़्त गुस्सा हो गया। क्योंकि उसकी आस्था के मुताबिक एक मुसलमान ने उसको छू कर अपवित्र कर दिया था। उसने कहा कि इस डिब्बे में गंगा जल था। इसको लेकर मैं देवघर जा रहा था। इसको तुमने अपवित्र कर दिया। अब वह ले जाने के क़ाबिल नहीं रहा। वह गुस्से में आपे से बाहर था और बहुत गर्म लेहजे में बार-बार कह रहा था कि तुमने मेरे गंगाजल को अपवित्र कर दिया। मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने इन बातों का कोई असर नहीं लिया। वह ख़ामोशी से उठ कर खड़े हो गए और सीट नौजवान के लिए ख़ाली कर दी। उन्होंने कहा कि मैं नहीं जानता था कि

She belives that women reacted to war in a completely different way from men. The men were more matter-of-fact and casual about the experience, whereas the women reacted in an overwhelmingly मौजूदा ज़माने में औरतों की प्रकृति और उनकी पैदाइशी योग्यता के बारे में बहुत सी तहक़ीक़ात की गई हैं। औरत की सिन्फ़ (लिंग) को शुद्ध साइन्टिफिक लिहाज़ से समझने की कोशिश की गई है। इन शोध के ज़रिए जो बातें मालूम हुई हैं वे हैरतअंगेज़ तौर पर औरत के बारे में इस्लाम के नज़रिए की पुष्टि करती हैं। नई खोजों ने बताया है कि औरत पैदाइशी तौर पर अति संवेदनशील है। वह मर्द के मुक़ाबले में जज़्बाती और भावुक (emotional) होती है। यह खोज साफ़ तौर पर बताती है कि औरत को ज़िन्दगी के ऐसे क्षेत्रों में दाखिल करना दुरुस्त नहीं जहां ठंडे ज़ेहन के तहत फैसला करने की ज़रूरत हो, जहाँ परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना राय बनानी पड़ती है, और जहाँ जज़्बात के बजाय यथारवादी फैसले की ज़रूरत होती है। औरत और मर्द में पैदा होने के वक़्त से से ही कुछ फ़र्क़ होते हैं। इसी वजह से इस्लाम में दोनों के काम और जिम्मेदारियाँ अलग-अलग रखी गई हैं। यह कोई दर्जे या बराबरी का मसला नहीं, बस काम के बँटवारे की बात है। असल में तो यह फर्क वही है जो साइंस भी बताती है। सच तो यह है कि इस मामले में कुछ लोग जो “महिला आज़ादी” का नारा लगाते हैं, उनका तरीका ही साइंस के ख़िलाफ़ है—इस्लाम के नहीं।

रूसी भाषा में एक किताब आरर्ता के बारे में छपा है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद मास्को से छपा है। किताब की तफ़सील यह है:

S. Alexiyerich, War's Unwomanly Face, Progress Publishers, Moscow दूसरा विश्व युद्ध (1941) छिड़ा तो रूसी हुकूमत ने अपने नागरिकों से जज़्बाती अपीलें कीं और मातृभूमि (Mother Land) को बचाओ का नारा दिया। इसके असर से जो रूसी नौजवान फौज में भर्ती हुए उनमें आठ लाख औरतें थीं, जिनकी उम्र 15-16 साल के बीच थी। यह किताब इन्हीं औरतों के बारे में जानकारी जुटाती है, जिसमें गहरा सबक़ है। मसलन किताब में बताया गया है कि जंग के बाद ज़्यादातर औरतों ने इस हक़ीक़त को छुपाना शुरू किया कि वे जंग में शरीक हुई थीं। “हमने चाहा कि दोबारा आम लड़कियों की तरह हो जाएं, शादी के क़ाबिल लड़कियां। We wanted to become ordinary girls again. किताब की लेखिका जंग में शरीक होने वाली एक पढ़ी-लिखी महिला से मिलीं, जिनका नाम वेरा सफमोवना डोडवा (Vera Safrmovna Davdova) था। उन्होंने जो बातें कहीं उनमें से एक बात किताब के के मुताबिक यह थी कि वह यक़ीन रखती हैं कि जंग में औरतों की प्रतिक्रिया पूरी तरह मर्दों से अलग थी। मर्दों का फ़ैसला किसी तजुर्बे के बारे में ज़्यादा

बनाने के लिए अपन आपका न पान पर राज़ी करना पड़ता है। अपना बात को दूसरे की नज़र में क़ाबिले- कुबूल (स्वीकार्य) बनाने के लिए अपने आपको दूसरे के मुक़ाम पर खड़ा करना पड़ता है। अपने और दूसरे के बीच सुनने और सुनाने की माहौल बनाने की ख़ातिर एकतरफ़ा तौर पर उन तमाम झगड़ों को ख़त्म कर देना पड़ता है जो दोनों के बीच की सामान्य फ़िज़ा को नष्ट किए हुए हों। इल्म का सदक़ा सबसे बड़ी कुर्बानी की कीमत पर दिया जाता है। यह देना उस वक़्त मुमकिन होता है जबकि आदमी ख़ुद को पीछे करने पर तैयार हो जाए। इस दुनिया में देने वाला बनने के लिए खोने वाला बनना पड़ता है। चूंकि लोग खोने वाला बनने के लिए तैयार नहीं होते, इसलिए वे देने वाले भी नहीं बनते। अल्लाह के यहाँ घमंड की माफ़ी नहीं सुफ़ियान सौरी (रह०) ने कहा: "जो गुनाह मन की इच्छा से मजबूर होकर होता है, उसकी माफ़ी की उम्मीद रहती है। लेकिन जो गुनाह घमंड से होता है, उसकी माफ़ी की उम्मीद नहीं। क्योंकि इब्लीस का गुनाह घमंड से था और आदम की ग़लती इच्छा से थी। आदम को तौबा के बाद माफ़ कर दिया गया, लेकिन इब्लीस हमेशा के लिए

म थे मगर उन्होंने अपने निकाह में कोई धूम-धाम नहीं की। यहाँ तक कि रसूलुल्लाह को और अपने करीबी साथियों को भी शादी में नहीं बुलाया। सादा तौर पर महज ईजाबो-कुबूल के जरिए निकाह कर लिया। और तयशुदा महर अदा करके दाम्पत्य जीवन गुजारने लगे। इल्म का सदक़ा रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया कि सबसे अच्छा सदक़ा (दान) है कि मुसलमान एक इल्म सीखे, फिर उसको अपने भाइयों को सिखाए। (सुनन इब्न माजा, हदीस संख्या 243)

सदक़ा क्या है? सदक़ा दरअसल उस खैरख्वाही का नाम है, जो एक भाई की तरफ से अपने दूसरे भाई के लिए जाहिर होती है। इस खैरख्वाही का इजहार कभी माल की सूरत में होता है कभी एक अच्छी नसीहत की सूरत में और कभी किसी दूसरी सूरत में खैरख्वाही इन्सान के सीने में जारी होने वाला रब्बानी चश्मा है और इल्म का सदक़ा इस रब्बानी सरचश्मे का बाहर इल्म (सच्चाई की पहचान) बेशक इस कायनात (सृष्टि) की सबसे बड़ी चीज़ है। और यही वजह है कि इल्म सबसे बड़ा सदक़ा (दान) है। आसमान के नीचे जो कुछ भी होता है, उनमें सबसे अद्भुत यह है कि इंसान किसी दूसरे के हित

किसी भी किस्म की कोई नुमाइशा बात नहीं की गई। मसलन आप का एक बीवी सौदा बिन्त ज़म्आ थीं। हज़रत ख़दीजा की वफ़ात के बाद मक्का में उनके साथ आपका निकाह हुआ। हज़रत सौदा विधवा थीं। आपकी तरफ़ से ख़ौला बिन्त हकीम निकाह का पैग़ाम लेकर गईं। उन्होंने पहले सौदा से इसका ज़िक्र किया। सौदा ने कहा कि अगर मेरा बाप राज़ी हो तो मुझे कोई एतराज़ नहीं। तब ख़ौला ने सौदा के बाप से बातचीत की। उन्होंने इस रिश्ते के लिए 'हां' कर दी। इसके बाद आप सौदा बिन्त ज़म्आ के मकान पर गए और वहां सादा तौर पर निकाह पढ़ा दिया गया। रसूलुल्लाह के सहाबा (साथियों) का तरीक़ा भी हमेशा यही रहा। यहां तक कि सहाबा में जो लोग मालदार थे, उन्होंने भी हमेशा सादा और बेखर्च अन्दाज़ में निकाह किया। मिसाल के तौर पर हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ एक व्यापारी थे। वह उन चंद सहाबा में थे, जो मालदार माने जाते थे। उन्होंने मदीना में एक ख़ातून से निकाह किया। इमाम अहमद ने हज़रत अनस के वास्ते से नक़्ल किया है कि हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ का भाईचारा मदीने में एक ऐसे मुसलमान के साथ था जो बहुत मालदार थे। उन्होंने अपने आधे माल की पेशकश की। लेकिन अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने उनके माल में से कुछ नहीं लिया। उन्होंने मदीने में कारोबार शुरू कर दिया। यहां तक कि वह खुद एक मालदार शख़्स हो गए।

इसका एलान भी किया गया हो, और निकाह करने वाला मद न निकाह करने वाली औरत को जरूरी महर अदा कर दी हो। इससे अन्दाज़ा किया जा सकता है कि इस्लाम में निकाह और शादी का मामला कितना ज़्यादा सादा और मगर मौजूदा ज़माने में मुस्लिम शादियों में ऐसे ग़लत रिवाज शामिल हो गए हैं, जिन्होंने एक जायज़ काम को नाजायज़ काम में तब्दील कर दिया है। एक यह कि शादी को ख़ानदानी सम्मान का मसला समझा जाता है। इसके नतीजे में निकाह का सादा इस्लामी आयोजन बनावटी धूम और बेजा नुमाइश की चीज़ बन गया है। इस धूम और नुमाइश को क़ायम रखने के लिए लोग लुट जाते हैं। जायदादें बेच देते हैं और हमेशा के लिए क्रज़ की लानत में फंस जाते हैं। एक दिन की धूमधाम के दिखावे की खातिर वह अपनी पूरी ज़िन्दगी को बे-धूम बना लेते हैं। ये तमाम चीजें सरासर ग़ैर-इस्लामी है हैं। हक़ीक़त यह है कि निकाह का आयोजन बेहद सादा और बेखर्च होना चाहिए। वह ऐसा होना चाहिए जैसे नमाज़ का वक़्त आया और आदमी ने मसजिद में जाकर नमाज़ पढ़ ली। निकाह और शादी को एक संजीदा कर्तव्य की अदायगी का दिन होना चाहिए, न कि निजी या खानदानी शानो शौकत के इज़हार का दिन। हज़रत आयशा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमायाः

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