जन्नत, जहन्नम
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۶
इस्तेमाल करत हुए सज्दा करना, फिर चेहरे को दाएं-बाएं घुमा कर सलाम करना, दोनों हाथ उठा कर अल्लाह से दुआ करना, वग़ैरह। ये सारी चीज़ें इन्सान के जिस्म से इतना ज़्यादा अनुकूलता रखती हैं, और इन हरकतों में इन्सान के तमाम हिस्से इस तरह शामिल हो जाते हैं कि ऐसा मालूम होता है जैसे इन्सान का पूरा जिस्म इसीलिए बनाया गया था कि वह नमाज़ की शक्ल में रब की इबादत करे। तमाम इन्सान अल्लाह की फ़ितरत पर पैदा किए गए हैं। ख़ुदाई फितरत यह है कि आदमी अल्लाह की तरफ़ ध्यान लगाए और नमाज़ की सूरत में उसकी इबादत करे। कुरआन में कहा गया हैः तो फिर तुम एकाग्र होकर अपना रुख इस दीन की तरफ़ सीधा रखो। अल्लाह की फ़ितरत जिस पर उसने लोगों को बनाया है। उसके बनाए हुए को बदलना नहीं। यही सीधा दीन है। लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते। उसी की तरफ़ लौ लगाओ और उसी से डरो और नमाज़ कायम करो और मुश्रिकों में से न बनो। नमाज़ की यही ख़ास ख़ूबी है, जिसकी बदौलत इतिहास में इस तरह की मिसालें मिलती हैं कि बहुत से लोगों ने सिर्फ़ मुसलमानों को नमाज़ पढ़ते हुए देख कर इस्लाम कुबूल कर लिया। आदमी के अन्दर जो फ़ितरत (प्रकृति) है वह इबादत की फितरत है। आदमी का पूरा वजूद इबादत का तलबगार है। दूसरे लफ़्ज़ों में कहा जा सकता है कि हर आदमी पैदाइशी तौर पर नमाज़ पढ़ने का जज़्बा लिए हुए है। आदमी का पूरा जिस्म और उसके तमाम हिस्से नमाज़ की सूरत में ढल जाने की ख़ामोश आकांक्षा (desire) लिए हुए हैं।