जन्नत, जहन्नम
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۸
बाद शक्ल का माजूद होना ऐसा हा है जस उसका माजूद न होना। ईमान स्पिरिट: यह इस्लाम का सबसे पहला रुक्न है। इसका ज़ाहिरी रूप इस्लाम के कलिमे को जुबान से कहना है। और इसकी अस्ल स्पिरिट इसे मानना है। इस कलिमे के जरिए एक इन्सान ख़ुदा को उसकी तमाम विशेषताओं और शक्तियों के साथ मानता है। वह मुहम्मद (सल्ल.) की इस हैसियत को स्वीकार करता है कि ख़ुदा ने उनको मेरे लिए और तमाम इन्सानों के लिए रहती दुनिया तक रहनुमा बनाया। यह हक़ीक़त जिसके दिल में उतर जाए वह उसकी पूरी मानसिकता में शामिल हो जाती है। ऐसे आदमी का सीना सच्चाई को स्वीकार करने के लिए खुल जाता है। वह एक ऐसा इन्सान बन जाता है, जिसके लिए कोई भी चीज़ कभी सच्चाई को मानने में रुकावट न बन सके। नमाज़ स्पिरिट: नमाज़ की ऊपरी सूरत पांच वक़्त की इबादत है और उसकी असली स्पिरिट विनम्रता और समर्पण है। नमाज़ पढ़ने वाला आदमी अपने रब के आगे झुकता है। इस तरह वह अपने अंदर विनम्रता और समर्पण की मनःस्थिति पैदा करता है। जिस आदमी के अंदर नमाज़ स्पिरिट पैदा हो जाए वह घमंड और अहंकार जैसी चीज़ों से खाली हो जाएगा। उसका रवैया हर मामले में विनम्रता का रवैया बन जाएगा न कि गर्व और बड़ाई का रवैया। ज़कात स्पिरिट: ज़कात की ज़ाहिरी सूरत हर साल एक ख़ास रक्म अदा करना है। और इसकी अस्ल स्पिरिट ख़िदमत है। जो आदमी ज़कात का अमल करे उसके अंदर लोगों के लिए ख़िदमत और ख़ैरख़्वाही की सामान्य भावना पैदा हो जाएगी। वह चाहेगा कि वह दुनिया में इस तरह रहे कि वह दूसरों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा फायदेमंद बन सके।