जन्नत, जहन्नम
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۱
वह हाल हो गया, जिसका हदीस में इन अल्फ़ाज़ में बयान किया गया है: प्यास चली गई और रगें तर हो गईं। ऊपर वाली हदीस से मालूम होता है कि हालात के बग़ैर कैफियत (अनुभूतियाँ) पैदा नहीं होतीं। रोज़ा इसी क़िस्म के हालात पैदा करने की एक सालाना तदबीर है। रोज़े के ज़रिए आदमी को भूख और तृप्ति दोनों का तजुर्बा कराया जाता है, ताकि वह ख़ुदा के आगे आजिज़ी करने वाला, विनम्रता दिखाने वाला और गिड़गिड़ाने वाला भी बने और इसी के साथ उसका शुक्र करने वाला भी। कुरआन में रोज़े का हुक्म देते हुए कहा गया है कि ईमान वालो, तुम पर रोज़ा फ़र्ज़ किया गया जिस तरह तुमसे पहले के लोगों पर फ़र्ज़ किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार बनो... रमज़ान का महीना जिसमें कुरआन उतारा गया... पस तुम में से जो शख़्स इस महीने को पाए, वह इसके रोज़े रखे... और अल्लाह की बड़ाई करे। इस पर कि उसने तुमको राह बताई, और ताकि तुम उसके शुक्रगुज़ार बनो (अल- बकरः 183-85)। इन आयतों में रोज़े के दो ख़ास फ़ायदे बताए गए हैं। एक यह कि रोज़ा आदमी के अन्दर तक्वा (संयम) पैदा करने का ज़रीआ है। दूसरे यह कि इससे आदमी के अन्दर यह सलाहियत पैदा होती है कि वह अपने रब का शुक्र करने वाला बने। कुरआन में जिस दीनी कैफियत के लिए तक्वा और शुक्र का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है, उसी को हदीस में 'तज़र्रु' (मिन्नत) और शुक्र कहा गया है। यही दोनों कैफियतें बन्दगी की जान हैं। अल्लाह के मुक़ाबले अपने इज़्ज़ और छोटेपन का एहसास आदमी के अन्दर तज़र्रु और तक्वा का एहसास उभारता है। और अल्लाह की दी हुई चीज़ों का