Al-Risala · July 2023 · page 1

ख़ुदा का सबूत

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۳، صفحہ ۱

सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए। आपन पूछा कि ऐ मुआज़, तुम्रन कैसे सुबह की? उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह पर ईमान के साथ सुबह की। आपने फ़रमाया कि हर बात का एक मिस्दाक़ (चरितार्थ) होता है और हर बात की एक हक़ीक़त होती है। फिर जो कुछ तुम कहते हो उसका मिस्दाक़ क्या है। उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने कभी कोई ऐसी सुबह नहीं की जिसमें मुझे यह ख़्याल न लगा हुआ हो कि अब मैं शाम न कर सकूंगा। और मैंने कोई क़दम ऐसा नहीं उठाया जिसमें मुझे यह ख़्याल न हो कि मैं दूसरा क़दम न उठा सकूंगा। और जैसे कि मैं घुटनों के बल गिरी हुई उन तमाम उम्मतों को देख रहा हूं, जिनको अपने आमालनामे (कर्मपत्र) की तरफ़ बुलाया जा रहा है और उनके साथ उनका पैग़म्बर है। और उनके साथ वे बुत भी हैं जिनको वे ख़ुदा के सिवा पूजती थीं। और जैसे मैं दोज़ख़ वालों की सज़ा को और जन्नत वालों के सवाब को देख रहा हूं। यह सुन कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः तुम मग़फ़िरत को पहुंच गए। अब इसी पर जमे रहो।

ख़ुदा का सबूत

अगर एक इन्सान का वजूद है तो ख़ुदा का वजूद क्यों नहीं? अगर हवा और पानी, दरख़्त और पत्थर, चांद और सितारे मौजूद हैं तो उनको वजूद देने वाले का वजूद संदिग्ध क्यों? हक़ीक़त यह है कि रचना की मौजूदगी रचना-प्रक्रिया का सबूत है।

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