इबादत
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۷
उसका फितरत का यह तड़प उसका मजबूर करता है और वह नमाज़िया के साथ नमाज़ में झुक जाता है। इस्लाम के अरकान (स्तंभ)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: इस्लाम की बुनियाद पांच चीज़ों पर रखी गई है। इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पूज्य) नहीं और यह कि मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं। और नमाज़ क़ायम करना और ज़कात देना और हज करना और रमज़ान के रोज़े रखना। इस हदीस के मुताबिक़ इस्लाम में पांच चीजें स्तंभ (pillars) की हैसियत रखती हैं। जिस तरह इमारत कुछ स्तंभों पर खड़ी होती है, उसी तरह इस्लामी ज़िंदगी पांच अरकान पर क़ायम होती है। ये पांच अरकान वैसे तो पांच शक्ली चीज़ों के नाम हैं। यानी ईमान के कलिमे के लफ़्ज़ों को दोहराना। नमाज़ के ढांचे को कायम करना, ज़कात की तयशुदा रक्म निकालना, हज के मरासिम/रस्मों को अदा करना, रमज़ान के रोज़े रखना। यानी इन शक्ली अहकाम का एक अर्थ है और उनकी वही अदायगी विश्वसनीय है, जिसमें उसका मर्म (हक़ीक़त) पाया जाए। इस दुनिया में हर चीज़ का मामला यही है। मसलन टेलीफोन को लीजिए। जैसा कि मालूम है, टेलीफोन का एक ऊपरी रूप होता है। पर यही ऊपरी रूप वह चीज़ नहीं है, जो टेलीफोन से वांछित (desirable) है। टेलीफोन के लिए टेलीफोन वांछित नहीं होता, बल्कि ‘संपर्क के लिए टेलीफोन वांछित होता है। अगर आप कहें कि मेरे पास टेलीफोन है तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि टेलीफोन की आकृति की एक चीज़ आपके पास मौजूद है। इसका मतलब यह होगा कि ‘टेलीफोन की