سادہ حل
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۶
सबस बड़ा अमल सत्य से सामंजस्य स्थापित करना हो और रसूल के सहाबा बेशक उन दुर्लभ इन्सानों में से थे जो इन्सानियत के इस पैमाने पर आख़िरी हद तक खरे उतरे। यह वह पूर्ण इन्सान है, जिसकी इन्सानियत पूरी तरह सुरक्षित होती है, जो अपने रचनात्मक स्वभाव पर क़ायम रहता है। यही वह ज़िन्दा प्रकृति वाला इन्सान है जो अरब के रेगिस्तानी माहौल में ढाई हज़ार साल तक चली प्रक्रिया में तैयार किया गया। और सहाबियों का गिरोह वह चुना हुआ इन्सानी गिरोह है, जिसको इस ख़ास इन्सानी नस्ल से चुन कर निकाला गया। सहाबा वे लोग थे जो दूसरों की भलाई के लिए जिए, जिनकी सारी कोशिश यह थी कि वे लोगों को जहन्नम से बचा कर जन्नत में पहुंचा दें। इसीलिए वे बेहतरीन गिरोह ठहराए गए। दाई लोगों का ख़ैरख्वाह होता है, चाहे वे सरकशी करें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 20 दिन से ज़्यादा मुद्दत तक तायफ़ का मुहासिरा (घेराबंदी) किया। जब मुसलमानों के लिए वह मुश्किल हो गया तो आपने वापसी का हुक्म दिया। एक शख़्स ने आपसे कहा: ऐ ख़ुदा के रसूल, सक़ीफ़ (क़बीले) को बदुआ कीजिए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने दोनों हाथ उठाए और कहा: ऐ अल्लाह सक़ीफ़ को हिदायत दे और उनको मुसलमान कर के वापस ला। इसी तरह आप से कहा गया कि क़बीला दौस सरकश और मुन्नर (निरंकुश और इंकार करने वाला) हो गया है। उसके ख़िलाफ़ बददुआ