विनम्रता - एक महान इबादत
الرسالہ، مئی ۲۰۲۵، صفحہ ۳
कि उसकी ज़िंदगी हालात के भवँर में फँसकर रह जाए और वह अपनी आख़िरी मंज़िल तक न पहुँचे।
विनम्रता - एक महान इबादत
हदीस में आया है: “आदम की हर औलाद गलती करती है, और गलती करने वालों में सबसे अच्छे वो हैं जो तौबा करते हैं।” (सुनन अल- तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2499)। इसका मतलब है कि हर इंसान गलती कर सकता है, और उनमें से सबसे अच्छा वो है जो गलती के बाद तौबा करता है। अपनी गलतियों को स्वीकारना एक महान इबादत का कार्य है। यह स्वीकारना खुदा के सामने भी होता है और दूसरों के सामने भी। जब कोई अपनी गलती खुदा के सामने स्वीकार करता है, तो उसे तौबा कहा जाता है। और जब यही काम इंसानों के सामने किया जाता है, तो उसे गलती मानना या स्वीकार करना कहा जाता है। सहाबा की ज़िंदगी का अध्ययन यह बताता है कि वे बहुत अधिक तौबा करने वाले और अपनी गलतियों को मानने वाले थे। कई मौके ऐसे आते हैं जब किसी सहाबी ने कहा कि मुझसे गलती हुई, मुझे माफ़ कर दो, हालाँकि कानूनी दृष्टि से वहाँ कोई गलती नहीं थी। ऐसा क्यों था? इसका कारण यह है कि यह कहना कि “मैं गलती पर था” दरअसल अपनी विनम्रता को स्थापित करना है। इस्लाम के अनुसार, हर व्यक्ति के पास हर समय खुदा के मौजूद रहते हैं, जो उसके हर कहे गए शब्द और किए गए कर्मों का रिकॉर्ड रखते हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि एक सच्चा