याद दिलाने वाली मौत
الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۵، صفحہ ۵۹
इसका व्यावहारिक व्यवस्था इस प्रकार निर्धारित का गई ह कि यह इंसान के पूर जीवन को सकारात्मक रूप से संवारने का ज़रिया बन जाती है। एक दृष्टिकोण से, नमाज़ रब्बानी (ईश्वरीय) प्रशिक्षण है, और दूसरे दृष्टिकोण से यह दुनिया में एक संपूर्ण मानसिक विकास का कोर्स है। नमाज़ की शुरुआत वुज़ू से होती है, जो एक प्रकार से छोटा स्नान (गुस्ल-ए- ज़गीर) है। यह इंसान की पवित्रता (ततहीर) का एक स्थायी साधन है। इसके बाद नमाज़ का पहला कलिमा अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) होता है। अज़ान और नमाज़ मिलाकर यह वाक्य प्रतिदिन लगभग तीन सौ बार दोहराया जाता है। अल्लाहु अकबर का एक और अर्थ यह है कि मैं बड़ा नहीं हूँ। इस प्रकार, नमाज़ इंसान के अंदर विनम्रता (तवाज़ु`) को विकसित करती है, जो निस्संदेह वर्तमान दुनिया में सबसे अधिक मूल्यवान गुणों में से एक है। नमाज़ को दिन और रात में पाँच निश्चित समयों पर अदा करने का आदेश दिया गया है। यह समय प्रबंधन (टाइम मैनेजमेंट) की शिक्षा देता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि इंसान के पास सबसे मूल्यवान चीज़ समय है। समय का सुनियोजित उपयोग हर प्रकार की उन्नति के लिए एक अनिवार्य शर्त है, और नमाज़ इंसान को इसी समय अनुशासन के लिए तैयार करती है। नमाज़ को जमाअत (समूह) में अदा करने का आदेश दिया गया है, जो एकता (इत्तेहाद) की बेहतरीन तालीम है। जमाअत के दौरान एक व्यक्ति इमाम के रूप में आगे खड़ा होता है और बाक़ी सभी लोग पंक्ति बनाकर उसके पीछे खड़े
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