Al-Risala · November 2025 · page 57

जनता और शासक के बीच क़ानूनी बराबरी

الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۵۷

का हो उन्होंने मेरा हथेली और मेरा उंगलियां से खून निकाल दिया। आर तुम उल्टा मुझको मुजरिम ठहरा रहे हो। उसका साथी बोला, मेरे दोस्त, यह पौधे के कांटों का मामला नहीं, यह कुदरत की प्रबंधन व्यवस्था का मामला है। कुदरत ने दुनिया की व्यवस्था इसी तरह बनाई है कि यहां फूल के साथ कांटे हों। मेरी और तुम्हारी चीख और पुकार ऐसा नहीं कर सकती कि इस व्यवस्था को बदल दे। फूल के साथ कांटे की यह व्यवस्था तो बहरहाल इसी तरह दुनिया में रहेगी। अब मेरी और तुम्हारी कामयाबी इसमें है कि हम इस सच्चाई को मानते हुए इससे बचने की तदबीर तलाश करें। और वह तदबीर यह है कि कांटों से बच कर फूल को हासिल करें। कांटों में न उलझते हुए फूल तक पहुंचने की कोशिश करें। फूल के साथ कांटे का होना कोई सादा बात नहीं। यह फ़ितरत और कुदरत की जुबान में इंसान के लिए सबक़ है। यह प्रकृति की भाषा में इन्सानी हक़ीक़त का ऐलान है। यह उस फ़ितरी मनसूबे का परिचय है, जिसके मुताबिक़ ख़ुदा ने मौजूदा दुनिया को बनाया है। इसका मतलब यह है कि इस दुनिया में वही क़दम कामयाब होता है जो बच कर चलने के उसूलों के मुताबिक़ हो। जहां बचने की ज़रूरत हो वहां उलझना, जहां तदबीर की ज़रूरत हो वहां एजीटेशन करना सिर्फ़ अपनी अयोग्यता का ऐलान करना है। ख़ुदा ने जिस मौक़े पर बच कर चलने का तरीक़ा इख़्तियार करने का हुक्म दिया हो, वहां उलझने का तरीक़ा इख़्तियार करना ख़ुद अपने आपको मुजरिम बनाना है। चाहे आदमी

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