एक बेहतर भविष्य की ओर
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۶، صفحہ ۶۱
गया हा अमरार लोग सोच कि उनके हज म तक़वा का भावना है या सिफ़्र सर-तफ़्राह (outing) की भावना। आम लोग यह सोचें कि वे दीनी फ़ायदे के लिए हज करने जाते हैं या व्यापारिक फ़ायदे के लिए। आलिम यह सोचें कि वे अब्दियत (बंदगी) का सबक़ लेने के लिए बैतुल्लाह (काबा) जाते हैं, या अपनी पेशवाई (नेतृत्व) को ऊँचा करने के लिए। इसी तरह ग़रीब लोग यह सोचें कि हज को उन्होंने अल्लाह से माँगने का ज़रिया बनाया है, या इंसानों से माँगने का। इस हदीस-ए-रसूल में भविष्यवाणी के अंदाज़ में बताया गया है कि जब उम्मत पर ज़वाल (पतन) आएगा, तो उस समय लोगों की स्थिति कैसी होगी। दौर-ए-उरूज (विकास के दौर) में उम्मत की हालत यह होती है कि दीन का अध्यात्मिक पहलू प्रमुख रहता है और उसका मादी (भौतिक) पहलू दबा हुआ रहता है। पतन के दौर में इसके विपरीत स्थिति हो जाती है कि लोगों के बीच दीन का अध्यात्मिक पहलू दब जाता है और भौतिक पहलू प्रमुख हो जाता है। पहले दौर में तक़वा (अल्लाह का भय) को मूल स्थान प्राप्त होता है और भौतिक चीजें केवल आवश्यकता के स्तर पर रहती हैं। इसके उलट, दौर-ए-ज़वाल में भौतिक चीजें ही मूल बन जाती हैं और कुछ ज़ाहिरी व दिखावटी बातों को तक़वा का नाम दे दिया जाता है। यही स्थिति हज और उमरा के साथ भी पेश आती है और इस्लाम की दूसरी इबादतों के साथ भी। जीवन के उस पार
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