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الرسالہ، جولائی ۲۰۲۶

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۶

पर उठाकर क़ब्र तक ले जाया गया। जब शव को क़ब्र में सम्मानपूर्वक लिटा दिया गया, तो मैंने सोचा, इस मृत शरीर के साथ इस तरह का ध्यान और सम्मान क्यों दिया गया है? यह सत्य है कि मृत्यु के बाद इंसान का शरीर सिर्फ मिट्टी के अलावा कुछ नहीं होता, फिर भी उसे सामान्य मिट्टी की तरह इधर-उधर नहीं फेंका जाता, बल्कि उसके साथ एक इंसान जैसा व्यवहार किया जाता है। "मिट्टी" के साथ "इंसान" जैसा व्यवहार करने का आदेश मृतक के लिए नहीं है, बल्कि जीवित रहने वालों के लिए है। मृतक के माध्यम से जीवित लोगों को यह पाठ दिया जाता है कि आखिरकार उनका परिणाम क्या होने वाला है। इस्लाम यह चाहता है कि जीवित लोग मृतक के रूप में स्वयं को देखें। वे मृत्यु से पहले मृत्यु का अनुभव करें। यह अनुभव इस प्रकार भी संभव था कि एक निर्धारित दिन काग़ज़ से एक मानव पुतला बनाया जाए और उसके साथ सभी रस्में निभाकर उसे मिट्टी के गड़ढ़े में डाल दिया जाए। लेकिन इस्लाम ने इस अनुभव को वास्तविक बनाने के लिए एक वास्तविक इंसान के मृत शरीर का उपयोग किया। यह व्यक्ति हमारे जैसा एक जीवित इंसान था। चलते-चलते उसके कदम थम गए। बोलते-बोलते उसकी ज़ुबान चुप हो गई। देखते-देखते उसकी आँखें बेनूर हो गईं। लोगों के लिए जिसकी जो क़ीमत थी, वह अचानक ख़त्म हो गई। अब, ख़ुदा इस घटना का उपयोग करता है ताकि एक इंसान के माध्यम से वह लोगों को जीवन का पाठ याद दिलाए। लोग उसे सम्मान से तैयार करते हैं,

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