चेतना का निर्माण
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۶، صفحہ ۱
कि वह क्या कर और क्या न करे। ऐसे मौकों पर फ़सला लेने के दो आधार होते हैं:
1. What is right (क्या सही है)
2. What is possible (क्या संभव है)
हिकमत भरा तरीका यह है कि व्यक्तिगत मामलों में इंसान यह देखे कि क्या सही है, और जो तरीका सही हो, उसे अपनाए। लेकिन सामूहिक मामलों में यह देखना सही होता है कि क्या संभव है, और जो चीज़ संभव हो, उसे अपना लिया जाए। इस फ़र्क की वजह यह है कि व्यक्तिगत मामलों में पूरा मसला सिर्फ अपनी ज़ात का होता है। आपको अपनी ज़िंदगी पर पूरा अधिकार है। आप अपनी ज़िंदगी को जिस दिशा में चाहें, मोड़ सकते हैं और अपने साथ जैसा चाहें व्यवहार कर सकते हैं। इसलिए व्यक्तिगत मामलों में आपको आदर्शवादी होना चाहिए और जितना हो सके, वही रवैया अपनाना चाहिए जो धर्म और नैतिकता की दृष्टि से उचित हो। लेकिन सामूहिक मामलों में आपकी ज़िंदगी के साथ एक दूसरा पक्ष भी जुड़ जाता है। उस बाहरी पक्ष पर आपका कोई अधिकार नहीं होता। आप उससे अनुरोध कर सकते हैं, लेकिन उसे मजबूर नहीं कर सकते। ऐसे हालात में समझदारी की बात यह है कि सामूहिक मामलों में "संभव" (possible) को
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