Al-Risala (English) · ME AND MAULANA: A PERSONAL RECOLLECTION OF WAHIDUDDIN KHAN - John M. Butt

ME AND MAULANA: A PERSONAL RECOLLECTION OF WAHIDUDDIN KHAN - John M. Butt

Al-Risala (English), August-September 2021, p. 184

By Maulana Wahiduddin Khan

Maulana Wahiduddin Khan is named as the default author of the periodical; a piece that carries another writer’s byline is credited to that writer.

मौलाना साहब से सीखा मोहममद ख़ालिद, जोधपुर आख़िरततरुख़ी ज़िंदगी ही वह हक़ीक़तत है, जिससे रूहानियतत के चशमे फूटतते हैं। ख़ुदा की मारिफ़तत और क़ुरबतत और इबादातत को उनकी स्पिरिट के साथ अदा करना, ययह सब इसी हक़ीक़तत का नततीजा है। अपने शुरुआतती दौर में मैं ऐसा समझतता था कि ख़ुदा की मारिफ़तत और ख़ुदा की क़ुरबतत का मिलना और इन कैफ़िययातत को पाना और इसमें जीना आम इंसान के लिए बहुतत मुश्किल काम है। इसके लिए बहुतत ज़्यादा इलम और दीन का आलिम होना ज़रूरी है। कैसे हम अपनी आम ज़िंदगी में इन आला कैफ़िययातत को पाने वाले बनें? लेकिन ‘अलरिसाला’ और मौलाना साहब की कितताबों के मुसलसल मुतताले और मौलाना के संडे (रविवार) लेकचर को बार-बार सुनना और आपस में मौलाना साहब की बाततों का ज़िक्र करना, ख़ययालातत का ततबादला करना और दुआ करना, जिसके लिए मैं ययह कहूँगा कि हमने ययह मौलाना से ही सीखा है। इनहीं सबसे हमने ययह सीखा कि ज़िंदगी की रोज़मर्रा रूटीन को रेफ़रेंस बनाकर कैसे ख़ुदा से मग़फ़िरतत लब करनी चाहिए, कैसे इसमे-आज़म वाली दुआ की ततौफ़ीक़ हासिल करनी चाहिए। ययहाँ मैं अपने आम रूटीन का एक वाक़यये को बययान करना चाहूँगा। मैं एक मैकेनिक हूँ और मैं टैकसटाइल इंडस्ट्ीज से जुड़ी मशीनों की रिपेययरिंग का काम करतता हूँ। मशीन को रिपेययर करके चैक करके वापस लौटातते वक़्त उसकी फ़िटिंग चैक करतता हूँ। एक दिन मुझे ख्याल आयया कि मशीन को चेक करके मैं फिर से क्यों उसकी फ़िटिंग चैक करतता हूँ, क्या मुझे अपने आप पर ययक़ीन नहीं है। मैंने ख़ुद से ययह सवाल कियया। मैंने अपने आपसे ययह कहा कि मशीन को चलाकर मैं दोबारा चैक इसलिए करतता हूँ कि मशीन उसी टाइमिंग पर चलतती रहे, जिस पर उसे फ़िकस कियया गयया है। ययह जुमला जब मैंने अपने आपसे कहा ो मैं अचानक बेइख़्तिययार रोने लगा। मैंने कहा— “ख़ुदायया! मैं इस मशीन

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