ME AND MAULANA: A PERSONAL RECOLLECTION OF WAHIDUDDIN KHAN - John M. Butt
Al-Risala (English), August-September 2021, p. 185
By Maulana Wahiduddin Khan
Maulana Wahiduddin Khan is named as the default author of the periodical; a piece that carries another writer’s byline is credited to that writer.
जैसा भी नहीं हूँ, ययह मशीन जिस टाइमिंग पर सेट है, कुछ दिनों ततक चलेगी, मुझे अपने बारे में घंटों का भी ययक़ीन नहीं है। मैं कैसे आख़िरतत के दिन को फ़ेस करूँगा, मैं इस टेसट के बिलकुल भी क़ाबिल नहीं हूँ। ततू मुझे उस दिन के आने से पहले बख़्श दे।” मैं आज भी इन लफ़ज़ों को लिखतते हुए वही कैफ़ियतत महसूस कर रहा हूँ। अपनी इस बातत का ज़िक्र अपने बेटे वक़ास से करतते हुए मैंने कहा कि ऐसी कैफ़ियतत का मिलना ययह उस दिन का एक मर्तबा का इस्तिग़फ़ार है, कैसे हम दिन में सत्तर मर्तबा इस ततरह इस्तिग़फ़ार करने वाले बनें। –CPS इंटरनेशनल मेम्बर वे आपादमस्तक मनुष्य थे कुमार प्रशांतत मौलाना वहीदुद्ीन ख़ान की मौतत उस नेक इंसान की मौतत है, जिनकी संख्या दिन-पर-दिन घटतती जा रही है। संख्या घटतती जा रही है ततो इसलिए नहीं कि ख़ुदा ने इंसान बनाने बंद कर दिए हैं, बल्कि इसलिए कि हमने इंसान बनना बंद कर दियया है। हम सभी आदमी की शकल-ओ-सूरतत लेकर ही पैदा होतते हैं। सो कह सकतते हैं कि हम सब पैदाइशी आदमी हैं, लेकिन आदमी को इंसान बनने के लिए भारी मशक़्क़तत करनी पड़तती है। वैसी मशक़्क़तत के बाद जब आदमी इंसान बन जातता है, ततब हमें लगतता है कि ययह ततो पैदा ही ऐसा हुआ था! मौलाना वहीदुद्ीन के साथ भी ऐसा ही था। उनहें देख-सुन व जानकर लगतता ही नहीं था कि इनहें इंसान बनने की कोशिश भी करनी पड़ी होगी। न कहीं शबद फिसलतते थे, न शख़्सियतत कमज़ोर पड़तती थी। उनकी शख़्सियतत का एक-एक तताना-बाना कसा हुआ था और मन हमेशा विनयय भाव से झुका हुआ। भूल रहा हूँ कि किसने लिखा है, पर क्या खूब लिखा है— नहीं देखतते किततनी है रिययाज़तत किसकी, लोग आसान समझ लेतते हैं आसानी को।

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