ME AND MAULANA: A PERSONAL RECOLLECTION OF WAHIDUDDIN KHAN - John M. Butt
Al-Risala (English), August-September 2021, p. 191
By Maulana Wahiduddin Khan
Maulana Wahiduddin Khan is named as the default author of the periodical; a piece that carries another writer’s byline is credited to that writer.
मौलाना से मेरी पहली मुलाक़ातत ख़ुर्रम साहब के ज़रियये हुई और इस मुलाक़ातत के दौरान मेरी मौलाना से कुछ मामलातत पर गुफ़्तगू हुई। बाततचीतत के दौरान मौलाना ने मुझसे एक जुमला कहा था, जो मेरे ज़हन में अभी ततक है— An undisturbed fish in a disturb water. असल में मौलाना ने ययह जुमला मुझसे इसलिए कहा था कि मैं कुछ दुनिययावी मामलातत को लेकर बहुतत परेशान था। इसके बाद मैंने मौलाना के इस जुमले पर ग़ौर कियया और मुझे काफ़ी हद क कामययाबी भी मिली। हालाँकि मैं कई मर्तबा ‘डिरेल’ भी हुआ, लेकिन इस जुमले को ययाद कर फिर से चीज़ें ठीक हो गईं। मौलाना का इलम बड़ा ही वसीअ इलम था। उनके इलम में ‘रिसर्च’ की धमक साफ़ दिखाई देतती है। अरबी, उर्दू, फ़ारसी, अंग्ेज़ी और हिंदी ज़बान पर उनकी पकड़ थी। उनकी ख़ुसूसिययातत में से एक बड़ी ख़ासियतत ययह थी कि वे किसी भी ‘हेडलाइन’ को पढ़कर एक क़ाबिल-ए-ग़ौर मज़मून ततैययार कर दियया करतते थे। अब वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फ़िक्र उनके लिटरेचर में साफ़ दिखाई देतती है। ययह बड़ी ही अहम बातत है कि अललाह ने मौलाना को एक बड़ी उम्र बख़्शीशी और उनहोंने अपनी उम्र के आख़िर ततक ‘दावतत इलललाह’ का काम बड़ी संजीदगी से अंजाम दियया। अललाह मौलाना की मग़फ़िरतत फ़ारमाए, आमीन!

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