ME AND MAULANA: A PERSONAL RECOLLECTION OF WAHIDUDDIN KHAN - John M. Butt
Al-Risala (English), August-September 2021, p. 190
By Maulana Wahiduddin Khan
Maulana Wahiduddin Khan is named as the default author of the periodical; a piece that carries another writer’s byline is credited to that writer.
मौलाना वहीदुद्ीन ख़ान : दौर-ए-जदीद के अमन के बड़े रहनुमा मोहममद आरिफ़ , नई दिलली मेरे लिए सबसे बड़ी बातत ययह रही कि मेरा वास्ता मौलाना के लिटरेचर से पड़ा और ययह वास्ता भी ऐसे पड़ा कि बततौर हिंदी ज़बान संपादक मैं एक कंपनी में काम कर रहा था कि मुझसे मौलाना की हिंदी ज़बान में छपने वाली कितताबों की एडिटिंग के लिए राब्ता कियया गयया। मौलाना की पहली कितताब, जिस पर न सिर्फ़ मैंने काम कियया, बल्कि उसे ब-ग़ौर पढ़ा भी, वह है— ‘इंसान अपने आपको पहचान’। मौलाना ने जिस अंदाज़ में इस कितताब में अपने ख़ययालातत का इज़हार कियया, उससे मैं बड़ा ही मुततास्सिर हुआ। इसके बाद ततो साल-दरसाल गुज़रतते चले गए और मुझे मौलाना के लिटरेचर से एक ज़बरदस्त लगाव हो गयया। मौलाना का जो समझाने-बतताने का अंदाज़ रहा, वह दिल की गहराइययों में पैवस्त होतता चला गयया। उनके लेक्चर्स को अटेंड करना हो यया फिर घर यया सफ़र में उनके लाइव प्रोग्ामस को देखना, एक ज़रूरी-सा सिलसिला बन गयया। मेरा ययह मानना है कि मौलाना दौर-ए-जदीद के अमन के बड़े रहनुमाओं में से एक थे। हक़ीक़ी माययनों में वे ‘पीसमेकर’ थे, जिनहोंने अपनी पूरी ज़िंदगी ‘पीस’ के रास्ते पर चलतते हुए गुज़ार दी। उनके अंदर ‘दावतत इलललाह’ की जो ततड़प थी, उसे मैंने उनके लिटरेचर और उनके बययानातत में बख़ूबी महसूस कियया। वे एक ऐसी शख़्सियतत के मालिक थे, जिसे पूरी इंसानियतत की फ़िक्र थी और ययह फ़िक्र भी ऐसी थी कि वे दुनियया के हर शख़्स ततक ‘दावतत-ए-दीन’ पहुँचाने की कोशिशों मे लगे रहे।

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