आह इन्सान
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۳، صفحہ ۵۳
चेतना और बोध का मालिक न हो तो इन्सान के पास न चेतना होगी और न ही वह किसी चीज़ का बोध कर सकेगा। ख़ुदा सब कुछ है। ख़ुदा उन विशेषताओं का मालिक भी है, जिनको हम जानते हैं और उन गुणों का मालिक भी जिनको हम नहीं जानते। मौजूदा दुनिया में ख़ुदा का सृजन प्रकट हुआ है, आख़िरत में ख़ुदा शासकत्व अपने खुले हुए रूप में प्रकट हो जाएगा।
आह इन्सान
इन्सान ख़ुदा को नाराज़ करने वाले अल्फ़ाज़ बोलता है। वह भूल जाता है कि उसका ख़ुदा उसको देख रहा है। इन्सान जहन्नमी कर्म करता है, हालांकि जहन्नम की एक आंच सहने की ताक़त भी उसके अन्दर नहीं। आह, कितना ज़्यादा कमज़ोर है इन्सान, इसके बावजूद वह कितना ज़्यादा ढीट बना हुआ है! इन्सान के सामने एक सच्चाई आती है, जिसका वह इन्कार न कर सके। इसके बावजूद वह उसको हिक़ारत के साथ नज़र अन्दाज़ कर देता है। इन्सान की ग़लती दिन की रोशनी की तरह उस पर खोल दी जाती है, फिर भी वह अपनी ग़लती को नहीं मानता। इन्सान के पास अपने नासेह (नसीहत करने वाला) की बात को ठुकराने के लिए कोई दलील नहीं होती, लेकिन वह ऐब निकाल कर और इल्ज़ाम लगा कर ज़ाहिर करता है कि नासेह (नसीहत करने वाले) इस क़ाबिल ही नहीं कि उसकी बात मानी जाए। इन्सान ख़ुद ज़ालिम होता है और वह दूसरे के ज़ुल्म का एलान करता है। इन्सान अपने क़दमों के नीचे फ़साद बरपा किए हुए होता है और दूसरों को फ़सादी कह
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